Thursday, December 18, 2014

फ़र्क तो पड़ता है

मैं घर जाने के लिए रेल्वे स्टेशन पर  था। ट्रेन आने के इंतज़ार में प्लेटफार्म पर चहलकदमी कर रहा था। इतने में सामने से धीरज आते दिखाई दी। साथ में उनका बेटा भी था। धीरज आईसीआईसीआई फाउंडेशन में काम करती हैं व जयपुर शहर के स्कूलों में क्वालिटी एजुकेशन के लिए प्रयासरत हैं।

संक्षिप्त अभिवादन के बाद धीरज तुरंत बोली, "आपको याद है वो लड़की? जो समर कैंप में तुम्हारे ग्रुप में थी।" इस बार गर्मियों की छुट्टियों में जयपुर शहर के 8 सरकारी स्कूलों के बच्चों के साथ समर कैम्प का आयोजन किया गया था। जिसमें बच्चों के साथ संगीत, नृत्य, नाटक, चित्रकला व कंप्यूटर जैसे विषयों पर काम किया गया था। इसके पीछे संस्था का सोच यह था कि प्राइवेट स्कूल तो बच्चों के साथ छुट्टियों में तरह-तरह की गतिविधियाँ आयोजित करते है लेकिन सरकारी स्कूलों के साथ कोई गतिविधि नहीं हो पाती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए इन समर कैम्पस  का आयोजन किया गया था।
धीरज के सवाल के साथ ही मेरे मानस पटल पर उन बीस लड़कियों के चहरे एक के बाद एक आने लगे। इससे पहले कि सारे चेहरे आँखों के सामने आयें और उसके बाद उनके नाम भी, मुझे लगा धीरज जल्दी से उस लड़की के बारे में बता देना चाहती है। धीरज मेरे याद कर लेने तक धीरज नहीं रख पायी। यह अधैर्य ट्रेन पकड़ने की वजह से था या लड़की के बारे में जल्दी से बता देने की वजह से था, क्या पता। वह बोली, "अरे वही सबसे छोटी, दुबली व सांवली सी लड़की" इतना सुनते ही मैंने कहा, "नाजिश?" धीरज बोली, "हाँ, नाजिश!" मैंने तुरंत पूछा, "क्या हुआ उसे?" धीरज ने कहा, "वह बिलकुल बदल गई है।" "ऐसा क्या बदलाव आया उसमें?" मेरी जिज्ञासा बढ़ी। "सीमा मै'म कह रहीं थी की थियेटर कार्यशाला ने इस लड़की को बिलकुल चेंज कर दिया है। अब यह आत्मविश्वास से बात करती है। सभी गतिविधियों में भाग लेती है। मन लगाकर पढ़ने लगी है।" नाजिश की टीचर सीमा मैम के शब्दों को धीरज बयां कर रही थी।
दृश्य को फ्लेश बैक में ले चलते हैं। वहां भी सीमा मैम के चंद शब्द मुझे सुनाई दे रहे हैं। जिन्हें सुनने के बाद यह आसानी से समझ आएगा कि बदलाव अकेले नाजिश में नहीं आया बल्कि उसकी सहयात्री सीमाजी भी हैं।
मेरी थियेटर की क्लास के बाद लड़कियों के पास एक घंटे का समय होता था। इस एक घंटे में तय यह हुआ कि लड़कियां कंप्यूटर क्लास में जाकर कंप्यूटर सीखेंगी। एक दिन क्लास ख़त्म होने पर सभी लड़कियां कंप्यूटर  सीखने जा चुकी थीं। अगले दिन की योजना पर काम करने के बाद मैं जब क्लासरूम से बाहर आया तो देखा कि नाजिश रो रही थी। मैंने नाजिश से पूछा कि क्या हुआ। वह कुछ नहीं बोली, बस रोती रही। उसके पास बैठी एक लड़की ने बताया, "मैडम ने इसे कम्प्यूटर क्लास से निकाल दिया है।" मैंने सोचा कि इसने कोई गलती की होगी इसलिए इसे क्लास से बाहर कर दिया होगा। "चलो, मैं बात करता हूँ मैडम से।" मैं जाकर सीमा जी से मुखातिब हुआ, "मै' म आपने नाजिस को कंप्यूटर क्लास से क्यूँ निकाल दिया?"
"हाँ सर, मैंने निकाल दिया है... ये क्या सीखेगी कंप्यूटर.... इसे तो हिंदी पढनी नहीं आती और कंप्यूटर का सब काम अंग्रेजी में होता है।"
मैंने अपने अनुभव के उदाहरणों से समझाने की कोशिश की' "आप इसे बैठने दीजिये हो सकता है यह कंप्यूटर की वजह से ही पढना लिखना सीख जाए।"
मैडम ने कहा, "रहने दें सर, यह कुछ नहीं कर सकती... वो तो पता नहीं क्यों मैंने इसे आपके थियेटर वाले समूह में रख दिया।"
मैंने ज्यादा बहस नहीं की और नाजिश के बारे में सोचने लगा। खैर नाजिश मेरे ग्रुप में अभी है। मेरे पास अवसर भी है और समय भी इस किवदंती को झूठा साबित करने के लिए कि नाजिश कुछ नहीं कर सकती। अभी तक मैंने अपनी कक्षा में नाजिश को लेकर खोई खास आकलन शुरू नहीं किया था। लेकिन अब नाजिश मेरी रोज़ की नियोजन प्रक्रिया का आवश्यक बिंदु बन गई। यह सही था कि नाजिश पर स्कूल में एक लेबल चस्पा था की वह कुछ नहीं कर सकती। उस लेबल ने उसके पूरे वजूद को भी ढांप रखा था। उसकी वजह से नाजिश की हर मामले में एक स्थाई अरुचि झलकती थी। यहाँ थियेटर वाले समूह में भी वह खुद से कोई पहल नहीं करती थी। उसकी दो बड़ी बहनें भी इसी समूह में थी। एक और जहाँ दोनों बहने साफ सुथरे तरीके से इस्तरी किये कपडे पहन कर आती थी वहीँ नाजिश के कपड़े  सफाई में लापरवाही स्पष्ट दृष्टिगत होती थी। मैंने नाजिश को कई बार आगे लाने कोई कोशिश की लेकिन नाकाम रहा। फिर मैंने उसे सामूहिक गतिविधियों में शामिल करना शुरू किया। ताकि समूह का हाथ थाम कर ही सही वह अपने सन्नाटे को तोड़े तो सही। मैंने उसे कोरस गायन का हिस्सा बना दिया। अब वह रोज कोरस में धीरे-धीरे सहज होने लगी। एक दिन मुझे लगा कि वह कोरस गायन को बेहतर तरीके से समझ रही है व उसका स्वर भी ठीक लग रहा है। मैंने दो अंतरे गायन में और जोड़ कर उसे स्वतंत्र रूप से कोरस के आलावा गाने को दिया। अब उसका अत्म्विश्वास बनने लगा। कुछ दिन बाद जब कोई लड़की अनुपस्थित हो जाती तो नाजिश कहती, "आज रुखसार के डायलोग मैं बोलू?" और जब कभी कोई लड़की संवाद सही नहीं बोलती तो नाजिश की कोशिश रहती कि उसे बोलने दिया जाए। इस तरह की कवायद में नाजिश नाटक के बनने व मंचन तक पहुँचने में तीन चार संवाद अपने नाम कर चुकी थी। एक बात जो नाजिश में देखने को मिली की उसने पूरी कार्यशाला में एक भी दिन छुट्टी नहीं की।

 इस समर कैम्प की थियेटर वर्कशॉप ने इस लड़की को थोड़ा बदला और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की इस बदलाव के साक्ष्य उस शिक्षिका के पास हैं जो बहुत पहले ही उम्मीद छोड़ चुकी थी। एक छोटी सी अवधि की रंगमंच की गतिविधि भी इस सिस्टम से उम्मीद के निशान छोड़ जाती है। कैसा हो अगर रंगमंचीय गतिविधियाँ अगर नैरन्तर्य के साथ स्कूल में हों। और केवल एक गतिविधि या प्रस्तुति बनकर न रह जाएं बल्कि इसकी प्रक्रिया पर भी गौर किया जाए। निसंदेह फ़र्क तो पड़ता है।

Thursday, October 2, 2014

नेपथ्य की तस्वीरें

दो अक्टूबर गांधी जयंती को “स्वच्छ भारत” अभियान के रूप में मनाया जा रहा है। सरकार का स्पष्ट आदेश है कि 2 अक्तूबर को गाँधी जयंती के अवसर छुट्टी नहीं रहेगी, बल्कि सरकारी दफ्तर खुलेंगे और अधिकारी व कर्मचारी अपने कार्यालय परिसर की सफाई करेंगे। इसका पालन जैसा भी हो लेकिन इससे थोड़ी ख़ुशी हुई  कि सफाई का मुद्दा सरकार के एजेंडा में शामिल तो है।
सुबह से इसका पालन भी होता दिख रहा है। फेसबुक व वाट्सअप पर सुबह से ही तस्वीरे शाया  होने लग पड़ी थीं सरकारी स्कूलों में मास्टर जी  झाड़ू लेकर आँगन बुहारते हुए दिखाई दे रहे हैं। बच्चे भी साथ ही दिखाई दे रहे हैं, मय झाड़ू। मास्टर जी के चेहरे पर एक विजेता भाव है कि उसने सरकार के फरमान को निभा दिया और फोटो इसका प्रमाण है। बच्चों के चेहरे पर एक अजीब मुस्कान है, ख़ुशी व अचरज मिश्रित। उन्हें शायद मोदी जी के अच्छे दिन का मतलब आज सबसे पहले समझ में आया है। बच्चे यह भी जानते हैं की यह अच्छा दिन आज के लिए ही है जो कलेंडर की तिथि के साथ कल बदल जाना है। 
मेरी दिलचस्पी चूँकि स्कूलों में ज्यादा है, इसलिए आँखों के सामने स्कूलों के दृश्य तैर जाते हैं। मेरी आँखे वह देखने की कोशिश कर रही हैं जो तस्वीरों में नहीं आ पा रहा है। तस्वीरों में वही प्रेयर का मैदान व क्लासरूम आ रहे हैं, जो रोज़ बुहारे जाते हैं। चूँकि मैं रंगमंच से भी वास्ता रखता हूँ इसलिए ऑन स्टेज गतिविधि से थोड़ा अंदाजा ऑफ़ स्टेज का भी लगाने की आदत सी है। इस लिए मेरी आँखें इस प्रस्तुति का नेपथ्य विधान  चाह रही है, जो शायद किसी न किसी स्कूल में यूं भी रहा हो-  चलो अपने कैमरे को थोडा पैन करते हैं
दृश्य 1
मैदान में झाड़ू लग जाने के बाद गुरूजी ने एक बार पूरे स्कूल का जायजा लिया होगा। अरे यह क्या! स्कूल का शौचालय तो साफ हुआ ही नहीं। इसे कौन साफ करेगा? फिर मास्टर जी ने इस स्थिति को देख कर ज्ञान का निर्माण किया होगा कि झाड़ू सभी तरह की सफाई का प्रतीक नहीं हो सकता। झाड़ू का प्रतीक वैसे भी अब राजनैतिक चिह्न हो गया है। मास्टर जी ने तुरंत झाड़ू के प्रतीक को विस्तार देते हुए इसमें टॉयलेट ब्रश, बाल्टी मग्गे को भी जोड़ दिया होगा। जब झाड़ू के प्रयोग में मास्टर जी ने अगुआई की है, तो इस नए का श्रेय भी उन्हें ही लेना चाहिए। अत: गुरूजी ने ब्रश उठाया साथ में बच्चों ने भी बाल्टी वगैरह उठा लिए हैं। मास्टर जी टॉयलेट साफ कर रहे है, साथ में यह भी बता रहे हैं कि इस टॉयलेट को रोज़ कैसे साफ रखा जाता है। अफ़सोस इस वक्त कोई तस्वीर लेने वाला नहीं है। भला इस तरह की तस्वीरे फेसबुक पर डाली जा सकती हैं !

दृश्य 2  
गुरूजी ने जब झाड़ू रख कर पसीना पोंछा होगा, साफ आँगन को निहार रहे होंगे और बैठने की इच्छा जाहिर की होगी, तब गुरूजी के लिए कुर्सी लेने भागे चार-पांच लड़कों को रोक दिया होगा और खुद ही कुर्सी उठाकर बैठ गए होंगे साथ ही खुद ही उन्होंने दरी पट्टी को तह लगाकर कुर्सी पर रखा होगा। 

दृश्य 3
गुरूजी विद्यालय के दफ्तर में बैठे होंगे, साथ में स्टाफ के साथी। बच्चे कपों में चाय डालते हैं। चाय की चुस्कियों के साथ ही अभियान की सफलता की चर्चा हो रही होगी। गुरुजी ने चाय के प्याले में बचे दो घूंट को एक लम्बे घूंट में समाप्त करके कप को जमीन पर रखना चाहा। इससे पहले कप जमीन को स्पर्श करे, किसी क्रिकेट खिलाडी की सी फुर्ती दिखाते हुए एक विद्यार्थी ने कप को लपक लिया। जैसे स्लिप पे कैच पकड़ा हो। और सरपट दौड़ पड़ा उसे धोकर लाने के लिए। लेकिन आज गुरूजी ने उसे एक जोर की आवाज़ देकर रोक लिया होगा। बेवकूफ, इधर आओ, हम अपना कप खुद धोकर लाएँगे। सबको अपने कप की सफाई खुद करनी चाहिए। ये क्या ! गुरूजी अपना कप लेकर धोने निकल पड़ते हैं। उनके पीछे पूरा स्टाफ कदमताल करते हुए चल पड़ता होगा। बच्चे इस पहेली के कई मायने निकाल सकते हैं

दृश्य 4
मिड दे मील बन कर तैयार है। बच्चे खा रहे हैं। कुछ बच्चे परोस रहे है। परोसने वाले बच्चे टीचर के सामने भी तस्तरी रखते हैं। गुरूजी जैसे ही तस्तरी में हाथ डालते हैं गर्म भात से उनकी ऊँगली जल जाती। गुरूजी को आज यह ज्ञान हुआ कि अगर गर्म भात में हाथ डालो तो ऊँगली जल जाती है। तुरंत गुरूजी ने इस ज्ञान का जनरलाईजेशन किया कि अगर उनकी ऊँगली जलती है तो बच्चों की भी जलती है। गुरूजी ने अपने अगले दिन की टू डू लिस्ट में यह काम जोड़ा कि बच्चों के लिए चम्मच खरीद कर लाने हैं।

दृश्य 5
गुरूजी लगभग खाना समाप्त करने वाले है। बच्चों की फील्डिंग तैनात है कि कौन सबसे पहले भाग कर तस्तरी धो लाने का सौभाग्य प्राप्त करता है। पर गुरूजी को ज्ञान प्राप्ति हो चुकी है, उन्होने कप वाले ज्ञान के साथ इसे भी जोड़ कर देख लिया है। इन्होने बच्चों की आशा के विपरीत अपनी तस्तरी धोने के लिए नल की और चले गए। गुरुजी को तस्तरी धोने के वक़्त, धोने में काम आने वाली अपरिहार्य चीज़ें याद आई। हालांकि उन्हें मिट्टी में अपने प्लेट रगड़ते बच्चे दिखाई दे रहे थे। लेकिन गुरुजी के मुंह से अचानक निकला कि धोने का साबुन कहाँ है? पोषाहार वाली बाई ने तुरंत बताया कि गुरुजी आप ही याद करके बताइये कि आखिरी बार साबुन किस तारीख को लाए थे। गुरुजी स्मृतियों में जाने को उत्सुक नहीं थे। उन्होंने अपनी टु डू लिस्ट को विस्तार देते हुए उसमे साबुन भी जोड़ दिया। गुरुजी आगे बढ़ जाते हैं। नल के नीचे प्लेटें धो रहा बच्चों का झुंड पीछे हट जाता है। गुरुजी सर्र सर्र बहते नल की धार के नीचे अपनी तस्तरी धो रहे हैं। तस्तरी से टकरा कर सारा पानी जमीन पर नहीं गिरता है कुछ पानी गुरुजी की पतलून को सराबोर कर लेता है। यहाँ गुरुजी को एक और ज्ञान की प्राप्ति होती है जो न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम के विरोधी-सा  जान पड़ता है। इस नियम के मुताबिक सारा पानी जमीन पर ही गिरना चाहिए था, फिर पतलून पे कैसे गिरा। न्यूटन की  हाइपोथीसिस को पलटने के लिए उनके पास पर्याप्त सबूत है, और वो सबूत है गीली पतलून के साथ खड़े उनके जैसे लगभग सौ सवा सौ बच्चे। जो भी हो गुरुजी ने नवीन ज्ञान ने भावनात्मक परिष्कार किया और उसे कर्म में तब्दील करने के लिए अपनी टु डू लिस्ट को एक और आयाम दिया। मेंटीनेंस की मद से गुरुजी बर्तन धोने के लिए सिंक बनवाने के ख्यालों के साथ अपनी धुली सी तस्तरी बच्चों को सोंप देते हैं।

दोस्तो ये वे दृश्य हैं जो आज के दिन हर स्कूल में घटित होने चाहिए। गांधी जी सफाई को इसी रूप में देखते थे और शुरुआत स्वयं से करते थे। लेकिन, अफसोस है कि इन दृश्यों की एक भी तस्वीर न फेसबूक पर  है न वाट्स अप पर। कल के अखबार का बेसबरी से इंतज़ार है। शायद उसमे इन दृश्यों की कोई झलक दिख जाए। अगर एक भी तस्वीर ऐसी मिल जाए तो समझेंगे कि सबके अच्छे दिन आ गए। 

Monday, September 23, 2013

मेरी डायरी : कविता शिक्षण का एक अनुभव

“यह सबसे कठिन समय नहीं है”
यह उस पाठ का नाम है जो अगले दिन कक्षा आठ में पढ़ाया जाना था। मैंने शिक्षिका से कहा, “कल हम इसी पाठ पर मिल कर काम करेंगे।” आठवीं कक्षा की हिन्दी की किताब साथ लेकर केजीबीवी से बाहर आ गया। अपने कमरे में आकर देर तक जया जादवानी की इस कविता के बारे में सोचता रहा। कविता की पहली लाइन कहती है “नहीं, यह सबसे कठिन समय नहीं ...” क्या सचमुच यह कठिन समय नहीं जबकि मेरा यह कविता शिक्षण का पहला मौका है। कहानियाँ सुनाई भी बहुत और सिखाई भी ... और कविता? सुनाने का अनुभव तो है लेकिन क्या सुनाना भर काफी रहेगा? इस समय को कठिन जान अब फिर कविता को देखता हूँ तो वह अब और भी कठिन जान पड़ती है। कविता को पढ़ जाता हूँ पूरा एक बार... दुबारा फिर पढ़ता हूँ तो मन में अर्थ तैरने लगते हैं और धीरे से भावनाओं की उंगली थामने लगते हैं। बावजूद इसके रह जाते हैं कुछ धुंधलके भी। जो अर्थ मैंने पकड़ा है क्या लड़कियों का भी वही अर्थ होगा। अर्थों का कुहासा अभी भी मेरे मन में है जो मुझे बर्दाश्त नहीं हो रहा, क्या लड़कियां भी उसे बर्दाश्त कर पाएँगी? जो मैं समझ रहा हूँ क्या वही कवयित्री का अभीष्ट है? खैर, कल देखा जाएगा। एक आश्वस्ति मन में थी कि पहली बॉल तो टीचर को ही डालनी है। शायद इसी आश्वस्ति की वजह से नींद भी आ गई।
यह सबसे कठिन समय नहीं है
नहीं, यह सबसे कठिन समय नहीं!
अभी भी दबा है चिड़िया की चोंच में तिनका
वह उड़ने की तैयारी में है !
अभी भी झरती हुई पत्ती
थामने को बैठा है हाथ एक
अभी भी भीड़ है स्टेशन पर
अभी भी एक रेलगाड़ी जाती है
गंतव्य तक
जहां कोई कर रहा होगा प्रतीक्षा
अभी भी कहता है कोई किसी को
जल्दी आ जाओ कि अब
सूरज डूबने का वक़्त हो गया
अभी कहा जाता है
उस कथा का आखिरी हिस्सा
जो बूढ़ी नानी सुना रही सदियों से
दुनिया के तमाम बच्चों को
अभी आती है एक बस
अन्तरिक्ष के पार की दुनिया से
लाएगी बचे हुए लोगों की खबर!
नहीं, यह सबसे कठिन समय है।
कविता – जया जादवानी
कक्षा 8 (एनसीईआरटी)
इस बार दिल में बहुत चाह थी, केजीबीवी की उन लड़कियों के साथ काम करने की जिनके साथ उनकी कक्षा की द्क्षताओं पर कार्य किया जाना है। अभी तक उन लड़कियों के साथ ही काम किया जा रहा था जो अभी पढ़ने लिखने की बुनियादी दक्षताओं पर है। पिछले साल भर से हम बीकानेर के कस्तूरबा विद्यालयों के साथ कार्य कर रहे हैं। मन में कहीं उन लड़कियों के उपेक्षित रह जाने का मलाल रह जाता था जो पढ़ना लिखना सीख चुकी हैं और उनके साथ उच्चतर दक्षताओं पर काम किया जा सकता है।
बहरहाल हम अगले दिन केजीबीवी की आठवीं कक्षा में थे। लड़कियां फर्श पर चार कतारों में बैठी थीं। पहले एक फिर दूसरी, तीसरी व उसके पीछे चौथी कतार... इधर हमारे लिए दो कुर्सियाँ व दीवार के सहारे टेबल पर रखा हुआ ब्लैक बोर्ड था। मन में बैठक व्यवस्था को बदलने का ख्याल आया लेकिन अभी के लिए निकाल दिया। ज़रूरत पड़ने पर बदल देंगे। शिक्षिका ने शुरू किया, “आज हम पाठ – ‘ये सबसे कठिन समय नहीं है’ पढ़ेंगे... पाठ का वाचन शुरू किया... अगले तीन मिनट में वाचन समाप्त हो गया। फिर टीचर ने अर्थ बताना शुरू किया, “इस कविता में कवयित्री ने यह संदेश दिया है कि...।” अगले पाँच - सात मिनट में टीचर ने अपना अर्थ लड़कियों की तरफ उछाल दिया। सामने लड़कियां बैठी थीं एकदम चुप! खुली हुई आँखें, खुली हुई किताबें लगभग शून्य की ओर ...
मेरा मन दखल देने को हुआ। क्या यह महज एक पाठ है? जिसका वाचन हो और उसके बाद बच्चों के हाथ में एक व्याख्या टीचर द्वारा पकड़ा दी जाए। नहीं यह तो एक कविता है। इसका इस्तकबाल कविता की तरह ही होना चाहिए। इस्तकबाल तभी कर पाएंगे जब हम समझेंगे कि कोई कविता दरअसल चाहती क्या है?
कविता जब लिखी जाती है तो उसकी प्रत्येक लाइन के पीछे कवि का एक अटूट विश्वास होता है कि जब इसे कोई पढ़ेगा या सुनेगा तो उसके अपने मतलब भी निकलेंगे। चाहे पाठक कोई भी हो। और जब पाठक कोई 15 – 16 साल की किशोर उम्र का हो तो मतलबों में कल्पनाओं के और गाढ़े – उजले रंगों की उम्मीद की जा सकती है। फिर जब हम किसी कक्षा में कविता के साथ पेश आते हैं तो क्यों कवि के उस भरोसे को तोड़ देते हैं। मुझे अब समझ में आ गया कि करना क्या है। जो भी हो मुझे कवि के भरोसे को अंत तक कायम रखना है कि अर्थ निर्माण की प्रक्रिया आखिर लड़कियों के स्तर पर ही होनी है। फिर हमारी क्या भूमिका है ? शायद हम माहौल कायम कर सकते हैं, स्वाधीनता, संवाद, परस्परता व सहयोग का।
मैंने लड़कियों से बात शुरू की –
“आपने कहानी व निबंध पढे हैं?”
“हाँ”
“अच्छा ये बताओ कि इनमे व कविता में आपको क्या फर्क लगता है? ”
थोड़ी देर के लिए सन्नाटा रहा फिर एक लड़की ने बताया –
“कहानी सरल होती है। सुनते ही सीधे समझ आती है लेकिन कविता को समझने में दिमाग पर ज़ोर पड़ता है। ”
मुझे लगता है कि कविता में जो कठिनाई लड़कियों की है वह कहीं टीचर की व्याख्या व लड़कियों की खुद की समझ में टकराव तो नहीं। मैंने लड़कियों से कहा, “क्या आपने कबीर का यह दोहा सुन रखा है?”
“माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंदे मोए।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूंगी तोए॥ ”
सभी लड़कियों ने हाँ में जवाब दिया। मैंने कहा, “क्या इस दोहे का मतलब यही है कि मिट्टी कुम्हार से बातें कर रही है?”
“नहीं सर, इसका मतलब यह नहीं बल्कि कुछ और है।”
“आपके अनुसार क्या मतलब है?”
“इसमे कमजोर व्यक्ति यह कह रहा है कि उसका भी एक दिन वक़्त आएगा।”
मैंने बात को पकड़ते हुए लड़कियों से कहा कि जिस प्रकार इस दोहे में लिखी हुई लाइनों के अलावा एक मतलब निकल रहा है वैसे ही जो कविता हम आज पढ़ने जा रहे हैं उसके भी अलग मतलब निकल सकते हैं जो हमें खुद को ही समझ आएंगे।”
मैंने ‘जया जदवानी’ की इस कविता के शीर्षक को रखा –
यह सबसे कठिन समय नहीं है
मुझे अचानक एक बात सूझी कि एक बार लड़कियों से बात करके यह तो पता किया जाए कि ये कठिन समय को किस रूप में समझती हैं? कठिन समय की क्या अवधारणा है? लड़कियों को थोड़ी देर आंखे बंद कर के बैठने के लिए कहा कि वे अपनी ज़िंदगी में किस वक़्त को बहुत मुश्किल समय मानती हैं? लड़कियों ने आँखें बंद की और दो तीन मिनट तक सोचती रहीं फिर आंखे खोल कर अपनी कॉपी में लिखना शुरू कर दिया। लिख लेने के बाद बारी थी सबके साथ शेयर करने की। लड़कियों ने बताना शुरू किया –
“कॉपी का काम पूरा नहीं है।”
“आँखें कमजोर है।”
“गणित की कॉपी गुम हो गई।”
इस तरह से शुरुआत हुई। धीरे – धीरे बात गहरी व गंभीर होती चली गई।
एक लड़की ने कहा, “मेरी दो बहने ससुराल चली गई हैं और मेरी भाभी बीमार रहती है। मेरी मम्मी को ही घर के सारे काम करने पड़ते हैं। मुझे लगता है यह बहुत कठिन समय है।”
प्रियंका – “मुझे यह कविता थोड़ी सी कम समझ में आई, ये मेरा कठिन समय है।”
सुनीता - “कुछ दिन से मेरी तबीयत खराब है। मैं बहुत कठिन समय महसूस कर रही हूँ।”
भाग्यश्री – “मेरी नज़र कमजोर है। मुझे कम दिखाई देता है। मेरे लिए यह बहुत कठिन समय है।”
जैसे ही हस्तु बोलने के लिए खड़ी हुई उसने बोलते ही माहौल को गमगीन कर दिया, “मेरा एक बीस वर्ष का भाई था जिसकी कुछ समय पहले मौत हो गई। यह मेरे लिए बहुत ही कठिन समय है।” यह कहते ही हस्तु रोने लग गई। उसके रोने का असर यह हुआ कि उसके आसपास की चार पाँच लड़कियां भी उसके साथ रोने लग गईं। जो नहीं रो रही थीं वो उन्हे चुप कराने में लग गईं। 5-7 मिनट तक यूँ ही गमगीन माहौल बना रहा।
लड़कियों को रुलाना बिलकुल उद्देश्य नहीं था। फिर भी इस गतिविधि से दो महत्वपूर्ण बाते हुईं। पहली यह कि इससे हम व शिक्षिका लड़कियों की वास्तविकता से परिचित हो रहे थे। दूसरा यह हुआ कि आगे जिस कविता पर काम किया जाना है उसकी भावभूमि तैयार लग रही थी। बिना देरी किए फिर से कविता का वाचन किया। वाचन के बाद मतलब पर बात नहीं की गई। इसे यह सोच कर छोड़ दिया कि अर्थ निर्माण का काम लड़कियों के स्तर पे हो। कविता के वाचन के पश्चात लड़कियों के चार समूह बनाकर कविता को पढ़ने व उस पर चर्चा करने को कहा गया। प्रत्येक समूह में एक – एक सवाल भी दिया गया।
समूहों के काम के प्रस्तुतीकरण की बानगी इस प्रकार है -
समूह 1 – यह कठिन समय नहीं है यह बताने के लिए कविता में कौन- कौनसे तर्क प्रस्तुत किए गए हैं?
लड़कियों के उत्तर इस प्रकार थे –
यह कठिन समय नहीं है यह बताने के लिए कविता में निम्नलिखित तर्क दिये हैं-
1. चिड़िया अपनी चोंच में तिनका दबाए उड़ने को तैयार है। क्योंकि वह नीड़ का निर्माण करना चाहती है।
2. डाली से गिरती पत्ती को थामने के लिए एक हाथ तैयार है जो उसे सहारा देना चाहता है।
3. एक रेलगाड़ी अब भी गंतव्य अर्थात पहुँचने के स्थान तक जाती है
4. अभी भी घर पर कोई किसी की प्रतीक्षा कर रहा है।
5. अभी भी नानी की कहानी का अंतिम महत्वपूर्ण हिस्सा बाकी है।
6. अभी भी एक बस अन्तरिक्ष के पार की दुनिया में जाने वाले लोगों में से बचे हुए लोगों की खबर लेकर आएगी।
इन सभी तर्कों से कवयित्री जया जादवानी यही कहना चाहती है कि अभी कठिन समय है लेकिन सबसे कठिन समय नहीं है, आगे पढ़ो और बढ़ो।”
हो सकता है लड़कियां इन तर्कों को धारदार तरीके से न रख पा रही हों लेकिन इतना पक्का है कि वे कविता को पढ़ कर समझने की जद्दोजहद में लगी हैं।
समूह 2 – चिड़िया चोंच मे तिनका दबाकर उड़ने की तैयारी में क्यों है? वह तिनकों का क्या करती होगी?
यह सवाल जरूरत से ज्यादा साधारण है लेकिन लड़कियों ने जिस तरह से इसका जवाब रखा उस से यही समझ आता है कि लड़कियों ने कविता को समझा जरूर है।
लड़कियों का जवाब इस तरह से था –
“चिड़िया चोंच में तिनका दबाकर पेड़ व घरों तक ले जाती है और अपना घोंसला बनाती है। उसका घोंसला हवा व बरसात के साथ बह जाता है। वह फिर से तिनके – तिनके लाकर बना लेती है। यह कठिन समय नहीं है कवयित्री हमें यह संदेश देती है कि हारना नहीं चाहिए, संघर्ष करना चाहिए।”
समूह 3 - कविता में कई बार ‘अभी भी’ का प्रयोग करके बात की गई है। “अभी भी” का प्रयोग करते हुए तीन वाक्य बनाइये और देखिए उसमे लगातार, निरंतर, बिना रुके चलनेवाले किसी कार्य का भाव निकलता है या नहीं ?
1. हमारे विद्यालय में सर अभी भी हैं।
2. अभी भी कक्षा आठ को सर हिन्दी के शब्द सिखा रहे हैं।
3. हम अभी भी कविता के बारे में लिख रहे हैं
इसमें प्रक्रिया यह रखी थी कि लड़कियों ने जो वाक्य बनाए उनमे कुछ अनगढ़ता थी। शिक्षिका लड़कियों के बोलने के बाद वाक्यों को ठीक करवाकर बोर्ड पर लिख देती।
समूह 4 – “नहीं” व “अभी नहीं” को एक साथ करके तीन वाक्य लिखिए और देखिए इनके पीछे क्या भाव छुपे हैं?
लड़कियों की प्रतिक्रियाएँ इस प्रकार थीं –
1. मेरी मम्मी कह रही है कि तुझे पढ़ाई छोड़नी है। नहीं, मुझे अभी पढ़ाई नहीं छोड़नी है।
2. मेरे पापा जी कह रहे हैं कि मुझे खेत का काम करना है। नहीं, मुझे अभी खेत का काम नहीं करना है।
3. मेरी बहन कह रही है कि देखो टीवी में कितनी अच्छी फिल्म चल रही है। नहीं, मुझे अभी फिल्म नहीं देखनी है।
इस सवाल में रोचक बात यह रही कि लड़कियों को “नहीं” व “अभी भी” के साथ वाक्य बनाने थे लेकिन वे इतनी जल्दबाज़ी में थी कि “अभी भी” की जगह “अभी नहीं” का प्रयोग कर गईं।
कविता पर काम करते हुए यह समझ आया कि इस कार्यवाही में ज़्यादातर समय लड़कियां ही सक्रिय दिखाई दे रही थी। टीचर की व्यस्तता इतनी ही थी कि जहां उसे लगता था कि यहाँ दखल की जरूरत है वहीं दखल दिया ।
अब लड़कियों को होम वर्क देने का वक़्त था। होम वर्क स्कूली व्यवस्था का जरूरी हिस्सा है। हम सोच रहे थे कि यह किस तरह का हो? लड़कियां कविता के अर्थ की और गहरी परतों को समझें, कविता की समझ को पाठ से आगे ले जाकर कल्पनाशीलता का प्रयोग करते हुए कुछ नया सृजन करें इस हेतु लड़कियों को समूह में ही काम दिया गया। यह काम उन्हें आवासीय समय में करना था। इस बार नए सिरे से चार समूह बनाए गए। तीन समूह ऐसे थे जिनमें ऐसी लड़कियां थी जो अच्छे से लिख सकती थीं। इन लड़कियों को कहा गया कि आप घर के बड़ों द्वारा सुनाई, पढ़ी हुई या स्वरचित कहानी लिखें जिसमें कवयित्री द्वारा दिया हुआ संदेश हो। एक समूह को कहा गया कि इस कविता में कहीं आया है, “अभी भी आती है एक बस अन्तरिक्ष की पार की दुनिया से” कल्पना से चित्र बनाइये कि वह बस कैसी दिखती होगी?
कहानी 1
दामोलाई नामक गाँव में एक लड़की रहती थी। वह बहुत सुंदर थी व उसके लंबे - लंबे बाल थे। वह पढ़ना चाहती थी लेकिन उसके मम्मी – पापा उसको पढ़ाना नहीं चाहते थे। वह पाँच भाई- बहन थे। उसके चारों भाई स्कूल जाते थे। वह अपने मम्मी – पापा से रोज कहती कि मुझे स्कूल भेज दो लेकिन उसके मम्मी – पापा नहीं माने। लड़की के चारों भाई उसे स्कूल ले जाना चाहते थे, उन्होने भी अपने मम्मी – पापा को खूब समझाया लेकिन वे नहीं माने। उन्होने सारी बात अपनी टीचर को बताई। टीचर ने उसे सलाह दी – हम तुम्हारी बहन का दाखिला करा लेंगे तुम अपनी बहन को घर पर ही पढ़ा लेना। पेपर के वक़्त यहाँ ले आना। उसके भाइयों ने यह बात मान ली। उन्होने यह खुशखबरी अपनी बहन को बताई। इससे वह बहुत खुश हुई। उसने घर पर बहुत पढ़ाई की और सहेली के घर जाने के बहाने से पेपर दिये। वह अपनी कक्षा में प्रथम स्थान पर आई। टीचरों ने खुश होकर पार्टी की तो वहाँ पर मुख्यमंत्री ने उस लड़की को इनाम में लैपटाप दिया। उसके मम्मी पापा ने मिलकर अपने बच्चों को आशीर्वाद दिया।
कहानी 2
एक बार शूरसेन नाम का एक राजा था। उसके तीन बेटियाँ थी। उनका नाम चारुलता, चंद्रलता और स्वर्णलता था। एक बार तीनों बहने जंगल में घूमने निकलीं तभी अचानक तूफान आ गया। तीनों बहने जंगल में भटक गई। हिम्मत से आगे बढ़ीं उनको सामने एक महल दिखाई दिया। वे उस महल में चली गईं। तीनों ने रात उसी महल में बिताई। सुबह तीनों बाग में घूमने चली गईं। चारुलता ने उस बाग से एक फूल तोड़ लिया। फूल तोड़ते ही एक राक्षस प्रकट हुआ। राक्षस ने कहा, “मैं तीनों को मार डालूँगा तुमने मेरा फूल तोड़कर अच्छा नहीं किया।” चारु राक्षस से माफी मांगने लगी लेकिन राक्षस नहीं माना। राक्षस ने कहा तुम्हें मेरी एक शर्त माननी होगी। राक्षस ने कहा तुमको यहीं रुकना होगा। चारु मान गई और दोनों बहनों को वापस भेज दिया। कई दिन बीतने पर चारु एक दिन पिता की याद में रोने लगी। राक्षस को दया आ गई। चारुलता को पिता के पास वापस भेज दिया। वह अपने पिता के पास प्रसन्न होकर रहने लगी। एक दिन चारुलता को सपना आया कि राक्षस बहुत बीमार है। चारु ने पिता से कहा कि मुझे राक्षस के पास छोड़ दो। उसके पिताजी मान गए। चारु राक्षस के पास गई और चारु ने देखा राक्षस वास्तव में बीमार है। चारु ने कहा उठो मैं आपको बहुत चाहती हूँ और आपके साथ शादी करना चाहती हूँ। इतना कहते ही राक्षस एक राजकुमार बन गया। राजकुमार ने कहा कि मैं भी एक दिन जंगल में भटक गया था। मैंने एक जादूगरनी का कहना नहीं माना तो उसने मुझे शाप दे दिया कि तुम्हें जब भी चाहने वाली लड़की मिलेगी तभी तुम असली रूप में आओगे। चारु उस राजकुमार को अपने राज्य में ले गई। चारु के पिताजी ने दोनों की शादी कर दी। वे दोनों सुखपूर्वक रहने लगे।
थैंक यू , गमले में मिट्टी हो तो साफ करना, लिखने में गलती हो तो माफ करना।
कहानी 3
एक बार मीना नाम की लड़की थी। उसके माता – पिता उसको पढ़ना नहीं चाहते थे। वह जंगल से लकड़ियों का गट्ठर लेकर आती तो बीच में स्कूल पड़ता था। वह लकड़ियों का गट्ठर रखकर स्कूल चली गई। उसने देखा बहन जी कक्षा में पढ़ा रही थी। वह खड़ी होकर सुनने लगी। बहन जी दो का पहाड़ा सुना रही थी। दो एकम दो, दो दूनी चार, दो तिया छ: । मीना और मिट्ठू ने ध्यान से सुना। पहाड़ा खत्म होने पर जल्दी जल्दी घर के लिए रवाना हो गए। घर जाने पर वह हर चीज़ को गिनती रहती। वह अपने पापा से पढ़ाने को कहती तो उसकी मम्मी पहले ही कह देती कि लड़कियां पढ़ती नहीं हैं, घर का काम करती हैं। एक दिन वह मिट्ठू से बोली कि तुम पहले स्कूल जाओगे बाद में मुझे पढ़ाओगे। मिट्ठू स्कूल गया। वह पढ़ कर मीना को सिखाता। एक दिन मीना पढ़ रही थी तभी एक चोर दबे पाँव आया और एक मुर्गी को लेकर भाग गया। मीना ने मुर्गियों को गिना तो एक मुर्गी नहीं मिली। उसने नज़र इधर उधर दौड़ाई तभी उसने आदमी को देखा। उसने शोर मचाया। गाँव के लोग इकट्ठा हो गए। उस चोर को पकड़ कर खूब धुनाई की। सभी गाँव वालों ने मीना के पापा से कहा कि आपकी बेटी बहुत होशियार है, आप उसे पढ़ाते हैं? तभी उसके पापा ने पूछा कि किससे सीखा? उसने कहा मिट्ठू से। अब वह भी स्कूल जाने लगी।
clip_image003
लड़कियों ने जो कहानियाँ लिखी हैं और जो जो चित्र बनाए हैं वह अभी एक शुरुआत है जो लेखन की उस जड़ता को तोड़ती है जिसे हमने एक दिन पहले लड़कियों की कॉपी में देखा था। जब हम लड़कियों की कॉपी देख रहे थे तो एक बात सामने आई कि सभी लड़कियों के कॉपी में लिखे जवाब अक्षरश: एक जैसे थे। गणित, विज्ञान, सामाजिक या भाषा विषय कोई भी हो कोई फर्क नहीं पड़ता। जब सबके जवाब ऐसे हूबहू ही होने हैं तो फिर जाँचने व न जाँचने में क्या फर्क पड़ता है। ऐसा इसलिए हो रहा था क्योंकि सभी लड़कियां जवाब पास बुक्स में से कॉपी करके लिख रहीं थी या फिर टीचर द्वारा जवाब बोर्ड पर लिख दिये जाते थे जिन्हें लड़कियां अपनी कॉपी में उतार लेती थीं। पूरी प्रक्रिया में लड़कियों की मौलिक उद्भावनाओं के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। आज लड़कियों के साथ जो काम हुआ उससे चाहे शुरुआत ही हुई लेकिन लड़कियों की मौलिक सोच को स्थान मिला है। भले ही आखिर की दो कहानियाँ उन्होने खुद नहीं रची हैं लेकिन उनके प्रस्तुतीकरण का सोच मौलिक है इससे उनमे एक भरोसे की भी उम्मीद जागी है कि वे खुद सोच सकती हैं, कर सकती हैं।

Tuesday, July 2, 2013

कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय: लड़कियों की क्षमताओं पर भरोसा करना

फरवरी का महीनाDSC00127 राजस्थान के कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में शैक्षणिक मेलों के माहौल का होता है। इन मेलों मे लड़कियां तरह – तरह की स्टॉल लगाती हैं जो उनके विषय की भी होती हैं और मस्ती की भी। इसमें वे खुद सीखती हैं और अपना मूल्यांकन भी करती हैं। ऐसे ही एक केजीबीवी (कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय) में मैं मेले की तैयारियों मे शरीक होने गया था। कहीं पंडाल बनने की जगह की पैमाइश चल रही है, कहीं कोई मस्तूल गाड़ रहा है, कोई बंदनवार बना रही हैं, कोई माँड़ने तो कोई सीखने सिखाने की सामग्री। यहाँ लड़कियां, शिक्षिकाएँ, रिसोर्स पर्सन व शिक्षा से जुड़े सभी व्यक्ति मेले की तैयारियों में व्यस्त थे। जो व्यस्त नहीं थे वे व्यस्त दिखना चाहते थे। जो व्यस्त दिख रहे थे वे और व्यस्त होना चाहते थे। एक अधिकारी नुमा व्यक्ति जयपुर विभाग से आए थे। मेले मे सपोर्टDSC00110 के लिए या फिर... देर तक व्यस्त होने की कोई तरकीब खोजते रहे कि कैसे व्यस्त हुआ जाए। आखिर उन्होने भी व्यस्त होने का एक माकूल सबब तलाश लिया, अपने रुतबे के हिसाब से। तुरंत हाजरी रजिस्टर तलब किया, पहले स्टाफ का फिर लड़कियों का। रजिस्टर दर रजिस्टर ये महाशय अपने को व्यस्त से व्यस्ततम बनाते रहे और स्टॉक, एसएमसी, कैश बुक इत्यादि मँगवाते रहे। साहब की व्यस्तता ने अब प्रधानाध्यापिका की व्यस्तता को एक नया आयाम दे दिया। जो पहले जरूरी समान की सूची लेकर बाजार के चक्कर लगा रही थी अब वह अलमारी से टेबल, टेबल से स्टोर रूम, स्टोर रूम से ऑफिस रूम का चक्कर लगा रही DSC00163थी।
व्यस्तता के इस दृश्य के परे सभी लोग वास्तव में ही मेले की तैयारियों में व्यस्त थे। और जैसा कि होता है कि सब रुकावटों के बावजूद भी शुभ काम हो ही जाते हैं, वैसे ही मेले की तैयारियां भी ज़ोरों से चल रहीं थीं। चलो अपने कैमरे को थोड़ा पैन करके विद्यालय के मैदान की और ले जाकर फोकस करते हैं। यहाँ रिसोर्स पर्सन व शिक्षिकाएँ किसी जरूरी चर्चा में व्यस्त हैं।
शिक्षिका 1 “सर, मेले का उदघाटन उदघाटन किससे करवाएँ ?”
रिसोर्स पर्सन “ लड़कियों का मेला है, लड़कियों को ही करना चाहिए। ऐसा गाइड लाइन में भी लिखा है।”
शिक्षिका 2 “किस लड़की से करवाएँ?”
शिक्षिका 1 “सबसे छोटी लड़की से करवा लेते हैं।”
शिक्षिका 3 “बड़ी से कटवाते हैं।”
रिसोर्स पर्सन “किसी भी एक लड़की को बोल दो।”
शिक्षिका 2 “सर, ऐसा करते हैं कि सभी लड़कियों के नाम की पर्चियाँ बना लेते हैं, जिसके नाम की पर्ची निकलेगी वही लड़की कल फीता काट लेगी।”
शिक्षिका 1 “भाई सौ – सौ परचियाँ लिखेगा कौन?”
रिसोर्स पर्सन “दो तीन लड़कियों को बोल दो वे लिख देंगी।”
इससे पहले लड़कियांDSC00156 जो कि पहले से ही मेले की तैयारियों में व्यस्त हैं, उन्हें अतिरिक्त व्यस्त किया जाए या उनकी व्यस्तता में कोई नीरस आयाम जुड़े या वे निरानंद की स्थिति में आएँ, मुझे लगा कि इस दृश्य में दखल देकर इसे बदलना चाहिए।
मैंने कहा, “जब मेले का उदघाटन लड़कियों को ही करना है तो क्यों न ये बात हम लड़कियों पे ही छोड़ दें कि वे किसे इसके लिए पात्र चुनती हैं।”
बात उन्हें अच्छी लगी लेकिन पूरी तरह न जाँचने का भाव उनके चेहरे पर था। शायद उन्हे लड़कियों की क्षमता पर पूरा भरोसा नहीं था। उन्होने कहा चलो लड़कियों को बोल देते हैं और वे शाम तक हमें नाम दे देंगी। मैंने फिर उन्हें रोका, “अभी लड़कियां तैयारी में लगी हैं। आप शाम को ही बोल दीजिएगा। विश्वास कीजिए वे इस मसले को 5 मिनट में निपटा देंगी।”
शाम को जब मेले का पंडाल सज गया। स्टॉल लग गईं और लड़कियों ने एक बार पूरी रिहर्सल करके देख ली तो वे कल के लिए आश्वस्त दिखीं। हमने लड़कियों को वहीं थोड़ी देर पंडाल में बैठने के लिए कहा। उनके बीच मे मुद्दा रखा। यहाँ तीन कक्षाएँ हैं छ:, सात व आठ। लड़कियों ने तीन समूहों में जाकर तुरंत तीन नाम तीनों कक्षाओं से चुन कर हमारे सामने रख दिए। अब तीन में से एक का फैसला कौन करे? यह ज़िम्मेदारी उन तीनों पर ही थी कि वे अपने में सेDSC00161 किसे चुनती हैं। वे तीनों एक तरफ गईं और 4-5 मिनट में एक का चयन करके वापस आ गईं। जिस लड़की कंचन को चुना वह आठवीं की लड़की थी। यह लड़की केजीबीवी में लीडरशिप के रोल में रहती है। हमें एक बार को लगा कि कहीं इस लड़की ने निर्णय को प्रभावित तो नहीं कर दिया। हमने उन तीनों से पूछा कि आपका निर्णय सहमति का है या फिर किसी तरह की दादागिरी से हुआ है।
कक्षा 6 की लड़की जो की दिखने में सबसे छोटी लग रही थी ने कहा, “हमने मिलकर फैसला किया है। कंचन दीदी आठवीं में है। इस साल स्कूल से पास होकर चली जाएंगी। इनके पास यह एक ही मौका है। हमारे पास अगले साल भी अवसर हैं। इसलिए हम दोनों ने यह अवसर कंचन दीदी को दिया है।”
वहाँ बैठे सब लोगों के के चेहरे खिल गए। लड़कियों ने सबको संवेदनशीलता, नागरिकता व लोकतंत्रिकता का जो पाठ पढ़ाया वह शायद सबको याद रहे। हम जो बच्चों के बीच काम करते हैं। रोज़ दिन के शिक्षण में हमारे पास ऐसे दसियों मौके आते रहते हैं जब हम उनकी क्षमताओं पर भरोसा कर सकते हैं। उनको करके सीखते हुए हम खुद भी सीख सकते हैं। लेकिन खुद का सीखना हमे रास आता नहीं है। हमेशा ऐसे मौकों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। हम सारा ज्ञान, सारी जिम्मेवारी खुद पर ही औढ़ लेते हैं। और दोनों के बोझ से दुहरे हुए जाते हैं। थक कर टूट जाते हैं। फिर शिक्षण से भी मुह फेर लेते हैं।

Saturday, May 18, 2013

मेरी डायरी का एक पन्ना : योगी चौराहे

मैं कल अपने पाँच साल के बेटे काव्य को टीका लगवाने के लिए डॉक्टर के यहाँ जा रहा था। हम दोनों बाइक पे थे। आदतन वह पूरे रास्ते सवाल पूछता रहता है। आज वह सवाल imagesनहीं पूछ रहा था। क्योंकि जाने कैसे उसे यह भान हो गया था कि जो रास्ता हमने चुना है वह डॉक्टर की तरफ जाता है। डॉक्टर के यहा जाने का मतलब उसके लिए टीका लगना ही होता है। इसलिए वह अपनी सहज जिज्ञासाओं को दबा या स्थगित कर के उन युक्तियों को सोच रहा था और एक-एक करके आजमा भी रहा था, जिससे डॉक्टर से छुटकारा मिल जाए। हम भी बाप ठहरे और लगातार आश्वासन दिए जा रहे थे कि आपको टीका तो बिलकुल नहीं लगेगा। हमने अपनी मुश्किल डॉक्टर पे डाल दी।
खैर, डॉक्टर के गए, टीका भी लगा, रोना – चिल्लाना, प्यारना – पुचकारना भी हुआ। बहरहाल हम वापस लौट रहे थे। चौराहे की बत्ती जो दूर से उल्टी गिनती गिनते हुए दिखाई दे रही थी, 3... 2... 1... तक पहुँचते - पहुँचते लाल हुई। हमने ब्रेक दबाए और रुक गए। बत्ती का दुबारा से हरे होने का इंतज़ार करने लगे, फिर से एक उल्टी गिनती के साथ। दूसरी तरफ के यतायात का हाल कुछ ऐसा था - मानो किसी ने सांस को प्राणायाम की तरह प्रयास से रोक रखा था और अगर अब न भी छोड़ते तो अपने आप छूट जाता। लगभग कपालभांति की तरह झटके से चौराहे ने ट्राफिक को फूँक दिया। कई बार ये चौराहे मुझे किसी योगी की तरह लगते हैं जो एक नाक से सांस को भर कर रोक रहे हैं और दूसरी तरफ से छोड़ रहे हैं। लेकिन लाख प्रयास से योग साधता नहीं।
टीके से उपजी नाराजगी की वजह से बाप बेटे में अभी तक अस्थाई रूप से बातचीत बंद थी। आखिर जिज्ञासा ने अबोले को तोड़ा और उसने सवाल किया, “पापा, हम यहाँ रुक क्यो गए हैं?”
इस सावल ने अब पिता के अंदर एक शिक्षक को जागा दिया। और शिक्षक ने मौका ताड़ लिया ट्राफिक रूल सिखाने का। मैंने कहा, “जब सिग्नल लाल होता है तो हम रुक जाते हैं”
“हम क्यों रुक जाते हैं?”
“ताकि दूसरी तरफ के लोग आसानी से निकाल सकें।”
“अब हम कब चलेंगे?”
“जब सिग्नल ग्रीन होगा तब...”
“ग्रीन कब होगा?”
“जब बैकवर्ड काउंटिंग खत्म होगी।”
मेरी ज्ञान - गीता चल रही थी। उल्टी घड़ी ने लगभग आधा ही फासला तय किया होगा। पीछे से एक फर्राटा बाइक आकर थोड़ी धीमी हुई। हॉर्न से पार निकल जाने के इरादे साफ जाहिर किए। हॉर्न की आवृति और उतार चढ़ाव की तत्परता में देश की तरक्की के ग्राफ के साथ आगे बढ़ जाने के इरादे साफ दिखाई दे रहे थे। आगे आकार बाइक पर आरूढ़ नौजवान ने दाएँ देखा यह इतमीनान करने के लिए कि कोई पुलिस वाला तो नहीं खड़ा है। दायीं ओर से तसल्ली हो गई कि इधर तरक्की में रुकावट नहीं खड़ी है। फिर बायीं ओर देखना जरूरी था, तरक्की में बाधाएँ दूसरी तरफ भी हो सकती हैं। बाईं और एक स्कूटी खड़ी थी और स्कूटी पर दो लड़कियां। बाइक सवार ने विकास के पहले मॉडल में तुरंत अपना अविश्वास सा प्रकट करते हुए अपनी बाइक को एक तरफ विराम दिया। देश की तरक्की की नई परिभाषा गढ़ी। इंजन को बंद करके नियम पालन में आस्था प्रकट की और अपनी बाइक के मिरर को स्कूटी पर फोकस करके संवैधानिक तौर तरीकों को अपनाना उचित समझा।
तरक्कीपसंदों की कमी कहीं भी नहीं होती है। पीछे से ‘धूम’ टाइप की दो – चार फटफटिया और आईं, आते ही सर्र से निकल गईं। निकलते ही लोगों को जागा गई कि कुछ भी हो तरक्की की असली पहचान जल्दी से आगे निकल जाना ही है। बाकी के वाहनों ने भी तरक्की के इसी मॉडल में ही अपनी बेहतरी समझी, उनमें जुंबिश हुई। काफिला आगे निकाल पड़ा। लाल बत्ती अभी भी सांस थामे हुए खड़ी थी। तभी बेटे सवाल किया –
“अभी तो ग्रीन लाइट भी नहीं हुई फिर सब क्यूँ जा रहे हैं।”
मेरे ज्ञान की गठरी में छेड़ हो चुका था। चौराहे पे जो मैंने पाठशाला खड़ी की थी वह ताश के पत्तों की मानिंद ढह गई थी। मेरे भीतर का अध्यापक छुट्टी ले चुका था। पिता का अक्स फिर उभर आया था। वाहनों के समुंदर का हिस्सा बनना ही बुद्धिमानी समझ पिता आगे बढ़ा। बेटा इस बार लगभग चिल्ला के बोला-
“हम आगे क्यूँ जा रहे है, सिग्नल अभी ग्रीन नहीं हुआ है?”
कुछ कहने सुनने को बाकी नहीं था। कहता भी क्या, कोई भी शब्द अब असरदार नहीं लग रहा था, वजनदार नहीं लग रहा था। जो मैंने सिखाना चाहा वह तो मालूम नहीं लेकिन इतना तो जरूर है कि कुछ न कुछ सीखना तो जरूर हुआ है। क्योंकि हर घटना से बच्चे कोई सीख तो गढ़ ही लेते हैं। वह क्या है – नियम पालन के लिए नागरिकता का कोरा किताबी पाठ, तेज़ रफ्तार का पागलपन, एक पिता की कथनी और करनी का दोहरापन? या कुछ और ?
इन ट्राफिक सिगनल्स पर यूं तो मिनट आधा-एक मिनट का विराम होता है लेकिन इन वकफ़ों में ही बहुत से मासूमों के मन में बहुत सारी अवधारणाएँ बनती मिटती हैं। और कुछ पत्थर पे स्थायी इबारत की तरह भी लिख जाती हैं।

Monday, April 29, 2013

कहानी : पाठ्यक्रम के साथ और पाठ्यक्रम के आगे *

 
 
clip_image002यह एक अमेरिकी लोक कथा है।
अजमेर ज़िले के कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय (केजीबीवी), तस्वारिया, केकड़ी,  में ‘प्रथम बुक्स की किताबों को उलटते-पलटते यह किताब हाथ में आ
गई। खूबसूरत चित्रों वाली इस किताब को मैं एक बार ही में पढ़ गया। दुबारा भी पढ़ा और दुबारा पढ़ने के साथ ही एक योजना मन में आकार लेने लगी कि इसे केजीबीवी की लड़कियों को कैसे सुनाना है। शिक्षिकाओं के साथ मिल कर सभी लड़कियों को आँगन में इकट्ठा किया और बातचीत शुरू की।
‘‘यह कहानी अमेरिका की है। ...आपने अमेरिका के बारे में सुन रखा है?” मैंने पूर्व
जानकारी को जाँचना चाहा,
‘‘हाँ...”
लड़कियों का लगभग समवेत स्वर उभरा।
‘‘कहाँ है अमेरिका?”
लड़कियों ने जवाब दिया - ‘‘नक्शे में, ग्लोब में, किताब में, टीवी में, अखबार में...”
मैं बोला - ‘‘सच ! कहाँ नहीं है अमेरिका !”
कहानी शुरू हुई। मुख्तसर में कहानी कुछ यूं हैं -
चतुर खरगोश ने आग चुराई
एक वक्त था जब इंसान व जानवर हिलमिल कर रहते थे। सर्दियों में खाना खत्म होने पर इंसान जानवरों को खाना दे देते थे लेकिन जानवरों को यह अच्छा नहीं लगclip_image004ता था कि इंसानों को जब ठण्ड लगती है तो वे उनकी कोई मदद नहीं कर पाते थे। उस वक्त लोगों के पास आग नहीं थी। आग तब राक्षसों के पास थी मगर वे उस पर पहरा रखते थे। जानवरों ने इस बारे में कुछ करना चाहा। खरगोश ने नेतृत्व किया और पंखों का एक मुकुट बनाया। फिर उसने राक्षसों के यहाँ जाकर उन्हें बेहद मज़ेदार लतीफ़े सुनाए, जिन्हें सुनकर हँसी के मारे उनके पेट में पड़ गए। जब हँसते-हँसते उनकी आँखों में पानी आने लगा तो खरगोश मुकुट में आग लेकर भागा। सब जानवरों ने बारी-बारी से मुकुट को थाम कर आग इंसानों तक पहुँचाई। इस जद्दोजहद में किसी की पूँछ जल गई, किसी की गर्दन और किसी का सारा शरीर काला पड़ गया...।

कहानी की शुरूआत से ही चर्चा शुरू हो चुकी थी। क्या अब भी जानवर हमसे हिलमिल कर रहते हैं? कौन-कौन से जानवर हमसे आज भी हिलमिल कर रहते हैं? हिलमिल के रहना किसे कहेंगे? वही जो हमारे साथclip_image006 रहते हैं... साथ तो गाय रहती है, भैंस, बकरी और कुत्ते भी रहते हैं... तो क्या छिपकली भी? नहीं वह नहीं... इसमें वही जानवर आएँगे जो हमारे साथ रहते हैं और हमारे काम भी आते हैं। पालतू जानवर हमसे मिल कर रहते हैं।
बहरहाल, कहानी आगे बढ़ी , कहानी में जानवरों के नाम भी आते रहे। कुछ देशी और कुछ खाँटी अमेरिकी। चित्र भी देखे गए, रेकून तो अपने बन्दर जैसा दिखाई देता है ! कोयोटी तो भेड़िए जैसा है... पीरू तो बिलकुल मुर्गे जैसा है।
कहानी खत्म होने पर लड़कियों से बात की कि इस किताब के आखीर में कहानी में आए उन जीवों के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी हुई है जो अमेरिका में रहते हैं; क्या आप अमेरिका के बारे में और कुछ जानकारियाँ लेना चाहती हैं? जैसे वहाँ की जनसंख्या कितनी है, फसलें कौनसी होती हैं, मौसम कैसे होते हैं, इत्यादि। लड़कियों ने एक स्वर में हाँ कहा। मैंने पूछा कि आप यह सब कहाँ से पता करेंगी? उन्होंने कहा यह सब एटलस में clip_image008मिल जाएगा। इस तरह १०-१२ लड़कियों का एक समूह बन गया जिसे एटलस से उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के बारे में जानकारियाँ एकत्र कर अगले दिन सभी लड़कियों के समक्ष रखना था। लड़कियों का एक और समूह भी इसी काम को करने में उत्साहित दिखाई दिया। इस समूह के पास काम तो वैसा ही था लेकिन चुनौती अलग तरह की थी। उसे एटलस के साथ काम करने के अलावा इकट्ठी की गई जानकारियों पर आधारित सवाल भी पूछने थे। ये सवाल पहले वाले समूह से पूछे जाने वाले थे। इस तरह अब एक चुनौती पहले वाले समूह के सामने भी थी।
कहानी में खरगोश दानवों से आग चुराने के लिए एक तरकीब सोचता है। क्या इस कहानी में आग हासिल करने में नेगोसिएशन यानी बातचीत द्वारा आदान-प्रदान के और भी तरीके हो सकते थे? इस काम को करने के लिए लड़कियों का एक समूह बना जिसे अपना कोई तरीका शामिल करते हुए कहानी को आगे बढ़ाना तय हुआ कि –
एक समूह इस कहानी पर नाटक तैयार करेगा।
एक समूह इस कहानी पर कठपुतली प्रदर्शन करेगा।
एक समूह कहानी को चित्रों में प्रदर्शित करेगा।
तब तक छुट्टी का वक्त हो चला था। सभी समूहों को रात को आवासीय समय के दौरान कार्य करना था। समूह आपस में मदद कर सकते थे और ज़रूरत पड़ने पर वार्डन व शिक्षिकाओं की मदद ली जा सकती थी। छुट्टी की घंटी बजी लेकिन किसी को आज उसकी परवाह नहीं थी। सब अपने-अपने काम में लगे हुए थे।
अगले दिन सभी लड़कियाँ तैयार थीं। अपने-अपने काम के प्रदर्शन के लिए पूरे आत्मविश्वास से लबरेज। सभी शिक्षिकाएँ व लड़कियाँ एक हॉल में इकट्ठे हुए। पहला और दूसरा समूह अलग-अलग खड़े हो गए। एक समूह को सवाल पूछने थे और दूसरे को जवाब देने थे। सवाल इस तरह थे –
- अमेरिका के सबसे बड़े बैंक का नाम?
-  डाक टिकट संग्रह करने का शौकीन राष्ट्रपति?
-  दास प्रथा का अन्त करने वाला राष्ट्रपति?
-  विश्व की सबसे बड़ी बस कहाँ है व इसकी लम्बाई क्या है?
-  अमेरिका के वन, फसलें, घरेलू पशु?
-  अमेरिका की आज़ादी... ओलम्पिक खेलों का बहिष्कार।
-  सबसे ज्यादा सल्फर डॉइ ऑक्साइड छो‹डने वाला देश... सबसे ज्यादा प्रदूषण
फैलाने वाला देश... इत्यादि।
धाराप्रवाह सवाल-जवाब सुन कर ऐसा लग रहा था मानों वे इसकी तैयारी में अमेरिका का कोना-कोना झांक आई हैं। सवालों की शुरूआत में ही लग गया था कि उनकी खोजबीन सिर्फ एटलस तक ही सीमित नहीं रही थी। पूछने पर उन्होंने बताया - ‘‘हमने एटलस के अलावा अपनी सामाजिक विज्ञान, भूगोल की किताब व मैडम की जी.के. (जनरल नॉलेज यानी सामान्य ज्ञान) की किताब को भी देखा है।” इसके अलावा उन्होंने कहा - ‘‘दो-तीन बार शिक्षिका से भी मदद ली।” अचानक मेरी समझ में आया कि प्राय: नीरस सी लगने वाली ये पाठ्य पुस्तकें अनायास ही इस गतिविधि से जीवन्त हो उठी थी और उनकी ज़रूरत का हिस्सा बन गर्इं थी। इस दौरान एक बात जो उल्लेखनीय रूप से नज़र आई वह थी कि जब दूसरा समूह जवाब देने में थोड़ी सी देर करता तो शेष बड़े समूह की लड़कियाँ झट से जवाब देतीं। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने कहा - ‘‘आपको यह तैयारी करने को तो नहीं कहा गया था। फिर आप कैसे इतना कुछ बता रही हैं?”
‘‘सर, आपने यह काम तो हमें नहीं दिया था लेकिन कहा था कि हम समूहों की मदद कर सकते हैं, सो हमने मदद करने के लिए ही जानकारियाँ हासिल की।”
वह समूह जिसे कहानी में कुछ और मोड़ सुझाने थे भी तैयार था। इस समूह ने कहानी को लेकर कुछ इस तरह की परिकल्पनाएँ की –
‘‘खरगोश दानवों के पास जाता और कहता कि जंगल के लोग मुझे बहुत अपमानित करते हैं इसलिए मैं उनसे बदला लेना चाहता हूँ। ...इसलिए तु मुझे थोड़ी सी आग दे दो, जिससे मैं उस जंगल को जला दूंगा। इस तरह मेरे और तुम्हारे दुश्मन मर जाएँगे और हम राज करेंगे... इस तरह दानव खरगोश की बातों में आकर आग दे देते।”
‘‘खरगोश जानवरों से कहता - ‘‘मैं जंगल के अच्छे से अच्छे फूलों के ताज बनाकर तुम्हें पहनाऊँगा लेकिन फूलों को तोड़ने के लिए थोड़ी रोशनी दे दो...” दानव खुश होकर रोशनी दे देते।”
‘‘खरगोश उन्हें मांस-मदिरा का लालच देता। वह उनसे कहता ‘‘मैं तुम्हें बेहतरीन मदिरा पिलाऊँगा,” दानव खरगोश की बातों में आ जाते... खरगोश व रेकून की पहले से ही योजना थी कि बारी-बारी से आग को जंगल तक कैसे पहुँचाना है।”
लड़कियों ने इस कहानी में जो विकल्प सुझाए, उस प्रक्रिया में वे जहाँ अपनी कल्पनाशीलता को परवाज़ दे रही थीं वहीं वे सब मिल कर किसी समस्या के हल के विकल्पों पर भी गौर करने के अभ्यासों की शुरूआत कर रही थीं।
एक लड़की ने जब अपने समूह के काम के प्रस्तुतिकरण में जानवरों के साथ जुड़े उनके स्वभाव के बारे में बताना शुरू किया तो वहाँ भी खुली बहस शुरू हो गई।
‘‘कौआ चालाक कैसे होता है ?”
‘‘क्योंकि वह बच्चों से रोटी छीन कर ले जाता है।”
‘‘चालाक नहीं, वह तो क्रूर है...।”
‘‘गधा कैसे मूर्ख है ?”
‘‘उस पर कितना ही लाद दो, वह तो कैसे भी ले जाता है।”
‘‘इस हिसाब से तो वह मेहनती हुआ न....”
‘‘कबूतर चालाक नहीं होता... उसको चबूतरे पर दाना डाल दो, चुपचाप चुग कर उड़ जाता है।”
‘‘ये तो कोई बात नहीं कबूतर तो किसी ज़माने में चिट्ठियाँ ले जाने का काम करते थे।”
लड़कियों की चर्चा में जो तर्क थे, हो सकता है उतने धारदार न हों। लेकिन एक बात पक्की है कि वे पहली बार उन कहानियों पर सवाल उठा रही थीं जिनमें जानवरों पर कुछ विशेष स्वभाव चस्पा कर दिए गए हैं। निस्सन्देह उनकी यह पहल आगे जाकर खुद पर समाज द्वारा थोपी गई पहचानों के मुलम्मे को उतार फेंकने में मदद करेगी। चित्र बनाने वाले समूह ने कहानी पर आधारित बेहद खूबसूरत चित्र बनाए। इसमें किसी ने लाइनें खींच कर स्केच बनाए तो किसी ने रंग भरने शुरू कर दिए। इस प्रकार धीरे-धीरे सामूहिक प्रयास से तस्वीरें अपने रंग में आने लगीं।
नाटक समूह की प्रस्तुति ढीली रह जाने पर लड़कियों ने उसकी अभिव्यक्ति में कमियाँ गिनवानी शुरू कर दीं। ‘‘आपका नाटक पता ही नहीं चला की कब खत्म हो गया।” ‘‘खरगोश द्वारा राक्षसों को बातों में उलझाने वाला सीन साफ़ समझ में नहीं आ रहा था...।” ‘‘आग को लेकर भागने व उसे एक-दूसरे को देने का काम इतनी जल्दी हो गया कि कुछ समझ में ही नहीं आया।”
हम लड़कियों द्वारा नाटक पर की गई समीक्षात्मक टिप्पणियों से हैरान थे। अगर अवसर दिया जाए तो लड़कियाँ किसी भी मुद्दे पर निर्भीकता से अपनी समीक्षात्मक राय दे सकती हैं।
अन्त में, कठपुतली वाले समूह की बारी थी। ये लोग पूरी तरह तैयार थे और तैयारी उनके चेहरे से बेसब्री बन कर झलक रही थी। शुरूआत होने से पहले मैंने उस समूह से माफी मांगी कि आपको थोड़ा कठिन काम दे दिया है, क्योंकि आपके पास जो
पहले से तैयार पपेट्स हैं उनमें जानवरों का एक भी चेहरा नहीं है और इसमें अधिकतर पात्र इंसानों के हैं।
इसके जवाब में लड़कियों ने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा –
‘‘सर, आप चिन्ता मत करो।”
यह वाक्य किसी भी शिक्षक के लिए पुरस्कार स्वरूप ही हो सकता था।

*कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में कहानी शिक्षण के अनुभवों को “खोलती हैं दरवाज़े कहानियाँ” के नाम से संकलित किया है, जिसे संधान ने सेव द चिल्ड्रन के सहयोग से प्रकाशित किया है। यह लेख इस संकलन में “पाठ्यक्रम के साथ व पाठ्यक्रम के आगे ”के शीर्षक से छपा है। इस पुस्तक के लिए चित्रांकन वाग्मी रांगेयराघव ने किया है। उनका बहुत आभार।
- दलीप वैरागी

Tuesday, April 23, 2013

खोलती हैं दरवाज़े कहानियाँ

कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में कहानी शिक्षण के अनुभवों को “खोलती हैं दरवाज़े कहानियाँ” के नाम से संकलित किया है, जिसे संधान ने सेव द चिल्ड्रन के सहयोग से प्रकाशित किया है। यह लेख इस संकलन में संपादकीय के रूप में छपा है। इस पुस्तक के लिए चित्रांकन वाग्मी रांगेयराघव ने किया है। उनका बहुत आभार।
कहानी का नाम आते ही मन में कई किरदार जीवन्त आकार लेने लगते हैं। इन किरदारों में सुनी हुई कहानियों के वे शख्स जिनमें जादूगर, परियाँ, प्रेत, जिन्नात, राक्षस, उड़ने वाले घोड़े व कालीन और इन घोड़ों व कालीनों पर सवार कहानी के नायक-नायिका शामिल होते हैं, cover-1जो हमेशा परिस्थितियों व समस्याओं से जूझते हैं। कहानी को सुनते वक्त अनेक बार हमने भी इन पात्रों के साथ खुद को समस्याओं से दो-चार होते पाया है; किसी तिलिस्मी दरवाजे के अचानक बन्द होने पर और अलीबाबा द्वारा पासवर्ड यानी गुप्त शब्द भूलने पर उसे याद दिलाने के लिए ‘खुल जा सिम सिम’ जोर-जोर से चिल्लाया है। रामायण में कभी खुद को राम के साथ रखा। कभी महाभारत में किसी एक पक्ष के साथ न रह पाने पर खुद को ‘जीव की जेवड़ी’ होते पाया। इन कहानियों के उड़ान खटोलों पर बैठ कर हम बचपन में ही समुद्रों, पहाड़ों, कन्दराओं, बीहड़ों, राजनीति के अखाड़ों और युद्ध के मैदानों का एक-एक कोना झाँक आए हैं। किस्सों के इन पात्रों ने छुटपन से ही हमारे ज़ेहन में डर, हर्ष, विषाद, वीरता और सचाई जैसी भावनाओं व अवधारणाओं को गढ़ने में हमारी मदद की है। न केवल मदद की है बल्कि, आज भी इन भावनाओं की डोर थामे वे हमारे अवचेतन में बैठे हुए हैं। इन कहानियों ने हमें हमारी ज़िंदगी की शुरुआत में ही उन अनुभवों से परिचित कराया है जिनसे हमें अपनी ज़िंदगी में अभी साबका करना है। दरअसल यह ज़िंदगी की तैयारी है।
कहानी की दर्ज़ीगिरी
कहानी के ज़िक्र के साथ सबसे पहले अपना बचपन याद आना लाज़िमी है। बचपन के साथ ही नानी, दादी या किसी ऐसे अज़ीज़ का चेहरा याद आता है जिससे खूब ज़िद व मनुहार करके कहानियाँ सुनी हों। ऐसे में अपने पड़ोस के ताऊ जी का चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता है। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद तहमद व सिर पर वैसा ही तुर्रेदार सफ़ेद साफ़ा, चेहरे पर हुक्के के धुएँ से पीली पड़ गई सफ़ेद और तिरछी मूँछें। यही मूँछे न जाने ताऊ जी की कितनी कहानियों में राजा, दरोगा, डाकू व मुखियाओं के किरदारों के चेहरों पर, कल्पना के रंग बदल-बदल कर हमने चस्पाँ की हैं। उनकी आँख के नीचे का बड़ा मस्सा कहानी सुनते-सुनते न जाने कब चुपके से राक्षस के चेहरे पर जाकर टंग जाता।
खैर, ताऊ जी का किस्सागोई यानी कहानी कहने में जवाब नहीं था। उनके पास सब तरह के किस्से थे, छोटे से छोटे, बड़े से बड़े। बड़ों के लिए और छोटों के लिए भी। सबके लिए। जब बड़ों की महफ़िल में सुनाना शुरू करते तो किस्सा मीलों लम्बा हो जाता और खत्म होने का नाम न लेता। जाने कहाँ से बीच में गीत और चौपाईयाँ आ जातीं। बात ही बात में ‘बात’ बुझा लेते। कब सवाल और पहेली सरका देते और क्या से क्या बीच में लाकर रख देते - रिश्तेदारियाँ, अय्यारियाँ, समझदारियाँ और देश-दुनिया की मिसालें व मसले। जब कभी ताऊ जी बच्चों की टोली से घिर जाते जो उसी किस्से को दुबारा सुनाने की जिद करती तो ताऊ जी उसी किस्से को गज भर का करके तहा देते। वे ऐसा कैसे करते हैं यह जानने के लिए कई बार कहानी सुनने के दौरान, हम उनकी गोद में बैठ कर उनकी जेबों की तलाशी भी ले डालते कि उनके पास ऐसा कौनसा टेप या फीता है जिससे वे माप-जोख करके किस्से को घटा-ब‹ढा कर लेते हैं?
जब कभी वे बच्चों की विस्मय से फैली आँखों में से झाँकती जिज्ञासा को भाँप लेते तो जम कर किस्सा सुनाते और उनके किस्सों के अन्दर से किस्से निकलते जाते। यूँ लगता मानो उनके किस्सों में जेबें लगी हुई हैं जिसमें से वे सिक्के की तरह खनखनाती कहानियाँ निकालते हैं और बच्चों की हथेलियों पर रखते जाते हैं।
खैर, एक बात पक्की है ताऊ जी कहानी की दर्ज़ीगिरी के उस्ताद थे। खुदा जाने वे नाप कैसे लेते थे - बच्चों की कौतूहल में फैलती आँखों की पुतलियों से या फिर बड़ों के हुंकारा भरने के आरोह-अवरोह से, लेकिन वे सबकी ज़रूरत व रूचि के हिसाब से किस्सों की काटछाँट कर नाप का सील देते। यहाँ तक आकर ताऊ जी कोई एक व्यक्ति नहीं रह जाते, बल्कि यह एक रूपक बन जाता है। वह रूपक है दास्तानगोई का जिसमें दादी, नानी, मामा कोई भी शामिल है या वे जिनका बच्चों के साथ रिश्ता कहानी की मार्फ़त है।
स्कूल और चौखटे में जड़ी कहानी
ताऊ जी पढ़े-लिखे नहीं थे। हम पढ़ गए हैं। आज हमारे इर्द-गिर्द बच्चे भी हैं और उनके सरोकारों से जुड़ने के बहाने व अवसर भी। आज हममें किस्सागो भी है और अध्यापक (ज्ञानी) भी हैं। दोनों हैं एक में ही, लेकिन वजूद अलग-अलग, एक-दूसरे से तन्हा-तन्हा। दोनों का एक खांचें में फ़िट बैठना हो नहीं पा रहा है। एक बरसों से चली आ रही परम्परा से पोषित हुआ है, तो वहीं दूसरे को पोथियों को रटने की अनवरत कवायद के बाद बड़े जतन से पाया है। एक जहाँ अपने होने के साथ ही बच्चों को सहज सवालों और कल्पनाओं में ले जाता है वहीं दूसरा अपेक्षा में रहता है कि सब सीधी लाइन में चलें, अनुशासन में रहें, सपाट सवाल हों, सीधे जवाब हों। ये द्वन्द्व हमारे अन्दर बना रहता है। जब हम पहले दिन स्कूल जाते हैं तो किस्सागो हमारे कंधे पर सवार स्कूल तक जाता तो है लेकिन हम उसे कक्षा के बाहर जूतों की तरह खोल देते हैं। जूते तो जूते हैं, आखिर घिस ही जाते हैं। स्कूल का काम किसी तरह पूरा कर अपने शिक्षक को दफ्तर की किसी कुर्सी पर टांग कर वापस घर लौटते हैं। और फिर से मां, पिता, नानी या ताऊ बन कर किस्सागो के चोले को रफ़ू करने बैठ जाते हैं। मेरा मानना यह कदापि नहीं कि कहानी स्कूली अन्त:क्रिया से पूरी तरह बहिष्कृत है। अक्सर स्कूल बच्चे के हाथ में कहानी पकड़ाता है लेकिन कहानी को चौखटे (फ्रेम) में कस के। स्कूल से लौटे बच्चे को एक बार स्कूल में सिखाई कहानी की एक-दो पंक्ति या शब्द के हेर-फेर से अपनी तरह से सुना कर तो देखिए। बच्चा तत्काल कहता है ‘‘यह गलत है, सही कहानी सुनाओ...” सही कहानी मतलब वह कहानी जिसमें पहले शब्दों व पंक्तियों का व्यवस्थित नपा-तुला क्रम और इस सब पर पालथी मार कर बैठा एक शिक्षा रूपी सूत्र वाक्य, ‘‘इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि...” और शिक्षा भी न सूत भर कम, न सूत भर ज़्यादा।
एक थे विष्णु शर्मा
हमारे समय की विडम्बना यही है कि ‘ताऊ’ टीचर नहीं है और टीचर से किस्सागो छूटा हुआ है। कहानी कहने वाला हर इंसान में होता है। निस्संदेह शिक्षक में भी। याद कीजिए अपने किसी खुशनुमा अनुभव को, जिसे आपने मित्र मंडली में बड़े उत्साह से दसियों बार सुनाया है। उस वक्त आँखों में जो चमक आ जाती है वह सुनने वालों को भी उसी में रंग लेती है। यह इसलिए होता है कि उस अनुभव से गहन अपनापा होता है और वह भावनाओं से इस कदर जुड़ा होता है कि स्मृति में खच से बैठ गया होता है। कहानी में वह ताकत होती है कि वह जल्दी ही अपनी बन जाती है, भावनाओं से जुड़ जाती है। कहानियाँ किताबों में आराम फ़रमाती हैं लेकिन खेलती किस्सागो की ज़ुबान पर हैं। किस्सागो की ज़ुबान पर आने के बाद कहानी लेखक की नहीं रह जाती और कान तक पहुँचते-पहुँचते जन-जन की हो जाती है।
शिक्षा में कहानी की क्या भूमिका है, इसे विष्णु शर्मा के संदर्भ में समझा जा सकता है। कहते हैं, किसी राजा की संतान उद्दण्ड व नालायक निकलीं। जब राजा को लगाकि राजकुमारों के हाथ से पढ़ने का वक्त छूट जाने के बाद अब कैसे इन्हें शिक्षित किया जाए, तब विष्णु शर्मा नामक शिक्षक ने उन राजकुमारों को शिक्षित करने के लिए पंचतंत्र की कहानियों का ऐसा ताना-बाना बुना कि महज़ छह माह में राजकुमारों को अर्थशास्त्र व राजनीति में निष्णात कर दिया। दरअसल विष्णु शर्मा ने ताऊ जी (किस्सा गो) व शिक्षक को एक कर दिया।
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालयों यानी केजीबीवी में जो लड़कियाँ हैं वे न तो हूबहू राजकुमारों जैसी हैं और न यह वक्त विष्णु शर्मा वाला है लेकिन एक बात जो आज भी समान है वह यह कि इन लड़कियों के हाथ से भी प‹ढने का मौका छूटा हुआ था। और उम्र के जिस पड़ाव पर वे हैं वहाँ उन्हें तेज़ गति से सीखने-सिखाने की प्रक्रियाएँ अपनाने की ज़रूरत है।
इसी सोच को लेकर संधान के साथियों ने अजमेर के छह केजीबीवी में कहानी विधा को लेकर प्रयोग किए हैं। उन प्रयोगों के अनुभव यहाँ दिए जा रहे हैं, इस आशा के साथ कि आप भी कहानी से ज़रा नज़दीकी बनाएँ, उसे अपना बनाएँ और विद्यार्थियों के नज़दीक ले जाएं।
कहानी के अनुभव अगली किस्त में...
धन्यवाद
- दलीप वैरागी