Thursday, January 28, 2016

अलवर रंग महोत्सव: एक खूबसूरत नाट्यानुभव

यह समीक्षा देर से आ रही है। इसके लिए पूर्णतः मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ। इसके पीछे की वजह व्यस्तताएं ही हैं, जिन्हें चाहते हुए भी दूसरी प्राथमिकता पर नहीं डाला जा सका था। अभी दो दिन पहले एक मित्र ने मुझे याद दिलाया कि इस कार्यक्रम की समीक्षा अभी तक क्यों नहीं की गयी है। कार्यक्रम के दौरान भी अलवर व बाहर के कुछ अभिनेताओं ने ऐसी ही अपेक्षा की थी।
इस बात ने एक विस्मय मिश्रित आनंद की अनुभूति दी। खैर, समीक्षक होने का मुगालता तो नहीं पाला है, मगर आश्चर्य यह हुआ कि  सहसा यह अपेक्षा यदा कदा ब्लॉगिंग से ही उपज आई है, और इसने एक विस्मृत अभिनेता व निर्देशक को नयी भूमिका में रूपांतरण के साथ जीवित कर दिया।
अलवर रंग महोत्सव के बारे में अगर एक वाक्य में कहा जाए, तो यह अलवर के मेरे ज्ञात इतिहास में भव्य व सफलतम् नाट्यानुभूति है। आगे के पूरे लेख में इस वाक्य का पल्लवन भर है। अलवर के दर्शक लम्बे समय तक इसे याद रखेंगे,इसमें कोई दोराय नहीं है।
निःसंदेह यह अनुभव रचने में रंग संस्कार थियेटर ग्रुप व कारवां फाउंडेशन ने अथक परिश्रम किया है। किन्तु इसका प्रस्थान बिंदु देशराज मीणा ही है। देशराज मीणा की प्रशंसा इसलिए की जानी चाहिए कि उन्होंने  पिछले साल नवम्बर में आयोजित “हास्य नाट्य” उत्सव की प्रतिध्वनि के विलीन होने से पहले रंगमंच के दूसरे तार को झंकृत कर दिया। रंगमंच को लेकर देशराज के जूनून व जज़्बे को पहले हम रंगकर्मी तो जानते थे किन्तु आज पूरा शहर उसका साक्षी है।  
बात उस समय की है, जब देशराज और हम साथ में रंगकर्म कर रहे थे, तब हम यह अक्सर चर्चा किया करते थे कि रंगकर्मी नाटक के कला पक्ष के लिए तो असीम ऊर्जा लगाकर काम कर लेते हैं लेकिन इसे पेशेवराना रूप देने की तमीज नहीं है। इसलिए रंगकर्मी थियेटर के स्कूल में चाहे न जाए लेकिन उसे एमबीए जरूर करना चाहिए। तब हमें इस बात का इल्म भी नहीं था कि देशराज ने एक नहीं दोनों काम किए। पहले राजस्थान विश्विद्यालय से नाट्यकला में डिप्लोमा, फिर नाट्यकला में एमए तथा उसके बाद अजमेर से एमबीए किया।
इसलिए इस बार देशराज ने नब्ज को दोनों तरफ से पकड़ा, और परिणाम सबके सामने है।
...और कारवां बनता गया

कारवाँ 
सही मददगार तलाशना बेशक एक बुनियादी जीवन कौशल है। देशराज के विचार को सतरंगी स्वरूप देना कारवां फाउंडेशन के बिना असंभव था। यूँ तो कारवां में अलग-अलग फील्ड के विशेषज्ञ लोगों की एक फेहरिश्त है, किन्तु प्रमुख सूत्रधार के रूप में अमित गोयल व जुगल गांधी नज़र आ रहे थे। जुगल गांधी का सुचित्रा फ़ोटो स्टूडियो से एस-टीवी चैनल तक का शानदार सफ़र हम सबके सामने है। जुगल जी, एक वक्त था जब हम उनसे अपना फोटो खिंचवाने जाते थे, तो वे अपने जबरदस्त हुनर से हमारे मन के कोनो में दबे छिपे भावों को चेहरे लाकर साकार कर देते थे। शायद ऐसा कोई व्यक्ति ही नव निर्मित प्रताप ऑडिटोरियम की लबालब भरी हुई बालकनी की कल्पना कर सकता  था।
अमित गोयल का रंगकर्म, साहित्य व संस्कृति के माहौल से गहरा रिश्ता है। साहित्य व संस्कृति से उनकी निकटता उन्हें अपने पिता श्री हरिशंकर गोयल से जेबख़र्ची सरीखा मिलती रही है। अमित गोयल के प्रकाशन व प्रिंटिंग के काम से आज कौन परिचित नहीं है। उनकासनप्रिंट्सजब चर्चरोड पर नया-नया आज से लगभग 15 साल पहले खुला था। तब हमने भी शिवरंजनी थियेटर ग्रुप की शुरुआत की थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि अमित गोयल के साथ बैठ कर ही वहाँ हमारे नाटकों के कार्ड, ब्रोशर, पोस्टर व लोगो डिजाइन होते थे। शुरूआती तीन-चार नाटकों की सामग्री उन्होंने ने बिना कोई पैसा लिए छापी थी। रंग महोत्सव में भी सनप्रिन्ट द्वारा प्रकाशित कलात्मक प्रचार सामग्री का अहम् योगदान है।
यह देशराज की बुद्धिमानी है कि उसने पुरानी इन कड़ियों को मिलाकर कारवां के लिए भूमि तैयार कर दी और साथ हीअलवर रंग महोत्सवकी सफलता की बुनियाद भी रख दी। इसके बाद कारवां के अलग अलग क्षमताओ के लोग जुडने लगे जिनमें, डॉ जीडी मेहंदीरत्ता, अनिल कौशिक, अमित छाबड़ा, नीरज जैन, देवेंद्र विजय, अनिल खंडेलवाल,दिनेश शर्मा, अभिषेक तनेजा व अरुण जैन प्रमुख हैं। इनके जुड़ने से कार्यक्रम में प्रशासनिक अधिकारी, राजनेता, समाजसेवी व साहित्य के लोगों के जुड़ने का मार्ग प्रशस्त हो सका।
शुरुआत सेलिब्रिटीज़ से
दिनांक 14 जनवरी 2016 को अलवर रंगमहोत्सव का पहला दिन था। इस दिन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दो स्नातकों के नाटक खेले गए। मशहूर फ़िल्म अभिनेत्री सीमा बिस्वास अभिनीत एकल नाटकस्त्रीर पत्र का मंचन हुआ। पहले दिन ही हॉल खचाखच भरा हुआ था। बालकोनी की सीटें भी भरी हुई थीं। सीमा बिस्वास ने अपने जबरदस्त अभिनय से लोगों को पलक तक झपकने नहीं दी। जैसा उनका अभिनय है,  उसी के अनुरूप उन्होंने विषय उठाया, जो कि ज्वलंत मुद्दा है, और स्त्री की जेंडर आधारित भूमिकाओं पर सवाल उठता है। इस नाटक में महिला की दोहरी वंचितता को बखूबी उठाया है। एक तो वह समाज में स्त्री होने की वजह से वंचित है चाहे वह किसी संपन्न घर कीमझली बहु हो या फिर कोई और। एक स्त्री के लिए  यह वंचितता और भी नारकीय तब हो जाती है जब वह सुंदरता व रंगरूप के परंपरागत मापदंडों में फिट नहीं होती है। सीमा बिस्वास एक छोटी लड़की की त्रासद कहानी से पूरे प्रेक्षागृह को झकझोर के रख देतीं हैं।
दूसरा नाटक दौलत वैद्य द्वारा निर्देशितदिवाकर की गाथा शिल्प व कथ्य के स्तर पर नवीनता लिए हुए था। एक मछुआरे की कहानी है, जो प्यार करता है - नदी से, लोगों से भी... परिस्थितियाँ किस प्रकार उसे जल्लाद बनने पर मजबूर कर देती हैं। दो अभिनेताओं की जुगलबंदी ने क्षीण कथा को भी प्रभावी तरीके से रखा। असमियां खुशबू में डूबा हुआ संगीत इस नाटक के प्राण हैं। दौलत वैद्य ने प्रकाश व प्रोजेक्टर तकनीक के ताने-बाने में बुना अभिनव प्रयोग करके मंच पर त्रिआयामी चाक्षुस बिम्ब रच कर नदी की प्रचंडता का जीवंत अनुभव दर्शकों को करवाया। हालाँकि कभी-कभी पूरी स्क्रीन पर कंप्यूटर की कमांड्स भी नज़र आ जाती तो रसास्वादन में कंकड़ स्वरूप भी लगतीं। लेकिन इस तरीके की तकनीक में कलाकारों को कई बार स्थानीय उपकरणों पर भी निर्भर रहना पड़ता है। एक वजह यह भी हो सकती है।
गोष्ठियों जैसी एक और गोष्ठी
रंग महोत्सव के दूसरे दिन, यानी 15 जनवरी को गतिविधियों का सिलसिला सुबह से ही प्रारम्भ हो गया था। इसकी पहली कड़ी में एक संवाद का आयोजन किया गया, जिसका विषय था- अलवर रंगमंच की वर्तमान चुनौतियां। इस गोष्टी में दलीप वैरागी ने विषय प्रवेश किया। मुख्य वक्ता के रूप में डॉ वीरेंद्र विद्रोही ने रंगमंच की समस्याओं के हल के एक विकल्प के रूप में सुझाया कि इसे शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाकर पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। इतिहासकार हरिशंकर गोयल ने इसे गांवों तक पहुँचाने की जरुरत पर बात की। दूसरी और युवा रंगकर्मियों का आक्रोश भी दिखाई दिया। युवा रंगकर्मी अविनाश ने ऑडिटोरियम की अतार्किक ऊँची दरों पर व संस्थाओं के मध्य मतभेदों पर गुस्से का इज़हार किया। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार जीवन सिंह मानवी ने की। अधिकतर होने वाली गोष्ठियों की तरह यह गोष्ठी भी ज्यादा लोगों को नहीं जुटा पाई। दूसरा जल्दी समाप्त करने के आग्रह के कारण  सभी रंगकर्मी खुल कर बात नहीं रख पाए।
नए दर्शकों की तलाश में
गोष्ठी के तुरंत पश्चात् जबलपुर के नाट्यदल ने नाटक एक और दुर्घटना का मंचन किया। इस नाटक को देखने के लिए नए दर्शकों की तलाश की गयी, जो इस आयोजन को एक नया आयाम देती है। दर्शक स्वरुप स्थानीय बीएड कॉलेज की छात्राओं व एक सैनिक टुकड़ी को नाटक देखने के लिए आमंत्रित किया गया था। निःसंदेह शिक्षक प्रशिक्षुओं के लिए इस नाटक से बेहतर एक्सपोजर नहीं हो सकता था। आद्यंत कसावट में बुने हुए इस नाटक को युवा अभिनेताओं ने पूरी ऊर्जा के साथ अभिनीत किया। एक सनकी द्वारा जांच अधिकारी बनकर पुलिस द्वारा आम आदमी को अपराधी साबित करने की थ्योरियों पर से प्याज के छिलकों की मानिंद परतें उघाड़ने का अभिनय दुर्गेश सोनी ने बखूबी किया। युवा निर्देशक प्रिया साहू  की टीम (रोहित सिंह, अंशुल ठाकुर, सुहाली वारिस, सरस, अक्षय ठाकुर व पारुल जैन) में कोई कड़ी ऐसी नहीं थी जो दर्शकों के मानसपटल पर छाप न छोड़ गई हो। बहुत ही सार्थक, संतुलित व सौद्देश्य मरोरञ्जन इस नाटक ने प्रदान किया।
अंकुश शर्मा के निर्देशन में नाटकटैक्स फ़्रीके सभी पात्र अंधे है और एक अंधों के क्लब में रहते हैं। ये सभी अपनी विकलांगता को अभिशाप या दिव्य वरदान (दिव्यांग) मानने से आगे जाकर इंसानी संवेदना के रेशों को स्पंदित करते हैं। वे जिंदगी को उसी प्रकार रसमय बनाते हैं जैसे कोई भी व्यक्ति कर सकता है। वे एक दूसरे की जिंदगी की परिस्थितियों को (जो विकलांगता जनित स्थितियां नहीं) इस प्रकार रखते हैं उसमे स्वयं जोड़कर खुद भी आह्लादित होते हैं और दर्शकों पर भी रस की फुहार  छोड़ते हैं। चार दृष्टिबाधित व्यक्ति अनायास ही दार्शनिक महत्व के प्रश्नों को छोटे-छोटे कहकहों में सुलझाते नज़र आते हैं। वे खूबसूरती की पहेली को सहसा ही सुलझा देते हैं कि सुंदरता अंततः देखने वाले के मन में ही स्थित होती है। वे सभी पड़ौस में नहाने वाली युवती को, पड़ौस से आने वाले नल की आवाज से सुनते हैं और कल्पनाएँ करते हैं। यहाँ सब कुछ कल्पनाओं में है। यहाँ तक कि युवती भी और नहाना भी...  बहुत बारीक़ भावों की अभिव्यक्ति को अपनी देह पर धारण करना  और फिर उसे फैलाकर प्रेक्षागृह के दर्शकों पर जाल की तरह डाल कर पकडे रखना बहुत कुशल अभिनेता की कसौटी है। इसे अंकुश शर्मा व उसकी टीम ने बखूबी निभाया।
अंकुश से अलवर के दर्शकों का परिचय अब नया नहीं पिछले साल नवम्बर में उनके दो हास्य व्यंग्य नाटक निठल्ला बिच्छु का मंचन हो चुका है। अंकुश के सामने चुनौती यह भी थी कि वह हास्य में क्या विविधता दे पाएंगे। इस कसौटी पर वे सफल रहे हैं। उनकी टीम में क्रिश सारेश्वर, मोहम्मद हसन, मदन मोहन व धीरेंद्रपाल सिंह ने अपनी भूमिकाओं को शानदार तरीके से निभाया।
16 जनवरी 2016 की दोपहर को अलवर के रंगकर्मी प्रदीप प्रसन्न लिखित व निर्देशित नाटकचार कंधेखेला गया। प्रदीप अलवर के निवासी हैं अभी गुजरात में रहकर शोध कर रहे हैं। वहां पर उन्होंने विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से मिलकर टीम बनाई है। वे दो महीने पहले  भी स्वलिखित नाटक लेकर इसी टीम के साथ अलवर आए थे। इतनी कम अवधि में ही एक और स्वलिखित व निर्देशित नाटक से गुदगुदाने के लिए प्रदीप का साधुवाद। ज्ञातव्य है कि प्रदीप के दो नाटक जवाहर कला केंद्र की नाट्यलेखन प्रतियोगिता में पुरुस्कृत हो चुके हैं। शोध में व्यस्तता के बावजूद प्रदीप की मंच पर यह सक्रियता अचंभित व प्रेरित करती है।
हास्य का विधा से ध्येय में तब्दील हो जाना  
इसी दिन शाम का नाटक था तपन भट्ट लिखित व निर्देशित नाटकहरिलाल एन्ड संस । अंतिम दिन भी दो प्रस्तुतियाँ थीं - फ्लर्ट और रॉन्ग नंबररोंग नंबर भी तपन भट्ट द्वारा लिखित व निर्देशित नाटक है। फ्लर्ट नरेंद्र कोहली द्वारा लिखित व गगन मिश्रा द्वारा निर्देशित है। तीनों नाटकों में समानता यह है कि अभीनेता कमोबेश वही हैं, यथा- विशाल भट्ट, तपन भट्ट, अभिषेक झाँकल, हिमांशु झाँकल, कपिल शर्मा व सौरभ भट्ट इत्यादि। ये सभी जयपुर रंगमंच के जबरदस्त प्रशिक्षित अभिनेता हैं। तीनों नाटकों में इन अभिनेताओं ने अपने अभिनय, गति व तारतम्य से भरे ऑडिटोरियम को बांधे रखा। विशाल भट्ट व अभिषेक झाँकल बहुत प्रतिभाशाली अभिनेता हैं लेकिन तीनों नाटकों में उन्हें एक ही शेड के रोल देना अचंभित करता है। इन दोनों अभिनेताओं के अभिनय के वैविध्य से अलवर के दर्शकों को परिचित करवाया जा सकता था। फ्लर्ट नाटक में गगन मिश्रा शिल्प के स्तर  पर वैविध्यपूर्ण पर प्रयोग करके जो रंगभाषा रचते हैं तो उनके ये प्रयोग काव्यात्मक नजर आते हैं।
तपन भट्ट के नाटकों में अभिनय व निर्देशन का काम बेहद उम्दा है, किन्तु उनके नाटककार से कुछ मुद्दों पर सवाल किए जा सकतेहैं। तपन भट्ट के दोनों नाटकों के संवादों में ऐसे बहुत से संवाद थे जो जेंडर, जेनरेशन, एवं संस्कृतियों के पूर्वाग्रहों से भरे हुए थे। रंगमहोत्सव की शुरुआत सीमा बिस्वास के स्त्रीर पत्र नाटक से होती है जो स्त्री को उसकी परमपरगत भूमिका से निकाल एक व्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करने का आह्वान करती हैं, और दर्शकों को एक विचार के बादलों पर सवार करती हैं, वहीं नाटक 'हरीलाल एंड संस ' में  नौकरानी के लिए एक पात्र का यह संवाद,"मालिक, यह प्लॉट मेरे नाम कर दो" सरीखे संवाद, उस विचार प्रक्रिया को महोत्सव के आखिर तक आते-आते तार-तार कर देते हैं। उनके नाटक में इस तरह के संवादों की भरमार थी जो पाश्चात्य संगीत, सभ्यता व नई पीढ़ी को लेकर एकांगी दृष्टिकोण प्रस्तुत करतेहैं। इस तरह का हास्य प्रेक्षागृह के दर्शकों को विभाजित कर जाता है -  एक दर्शक वह जो इनके मार्फत परंपरा से अपने दृष्टिकोण और पुष्ट होते हुए पाता है, वह कहकहे लगता है। दूसरा दर्शक वह, जो  इस विडम्बना पर नहीं हंस सकता। यह विद्रूपता तब जन्म लेती है जब हास्य एक विधा से ध्येय में तब्दील हो जाता है। फिर कहानी का मुख्य कथ्य पीछे छूट जाता है, और कुछ भी कह के हँसाने की विवशता को  कलाकार ढोता है। हास्य एक रस है।  रसानुभूति एक दशा है ध्येय नहीं, सम्प्रेषण तो उन मूल्यों का होता जो लेखक का अभिप्रेत है। रस उसके सम्प्रेषण की गारंटी प्रदान करता है। लेकिन जब हास्य ही ध्येय हो जाता है तो वह विद्रूपता को जन्म दे सकता है। यह एक बहुत ही महीन धागा है जिसे पकड़ने की जरूरत है। आजकल टीवी पर छाए इस तरह के हास्य से ऊबकर जो दर्शक नाट्यशाला में आया होगा जरूर उसे निराशा हाथ लगी होगी। इसमे कोई दो राय नहीं की भट्ट जी के दोनों नाटको में दर्शकों की व ठहाकों की संख्या अनगिनत थी। तपन भट्ट अनुभवी व बहुमुखी प्रतिभा के कलाकार हैं। उन्हे अपने कथ्य में इस दृष्टि से भी नवाचार करने चाहिए। वे कर सकते हैं।
आखिर में कुछ सीखें व बातें जिन्हें कहा जाना चाहिए इस प्रकार हैं
  • पिछले दो महीने पहले जब पहला नाटक प्रताप ऑडिटोरियम में हुआ था तो आस-पास के लोग इस कंगूरेनुमा बिल्डिंग को बहुत विस्मय से देखते थे कि यह सरकार ने क्या बना कर रख दिया। इस बार जब यह इमारत चार दिन तक रोशनी में नहाई तो एक माहौल बना है। आस-पास  दुकान वालों को भी उम्मीद बंधी है कि इस इमारत की गतिविधियों की सातत्य उनकी दिहाड़ी में भी इजाफा करेगी।
  • दिन में एक कार्यक्रम संगीत व नृत्य का रखने के प्रयोग ने आयोजन को अलग आयाम दिया। स्वरांजलि संगीत क्लब अलवर में परिचित नाम है। संगीत के बेहतरीन जानकार इस क्लब से जुड़े हुए हैं। स्वरांजलि के साथ बहुत बड़ा दर्शक वर्ग भी जुड़ा हुआ है, जो इस जुगालबंदी से नाटक की ओर डायवर्ट हुआ है।
  • पिछले कार्यक्रम में जो कमी थी कि मीडिया ने, या मीडिया से परहेज किया गया था। इस बार मीडिया कवरेज अच्छा होने से दर्शक जोड़ने से फायदा मिला। व्हाट्स एप्प व फेसबुक पर जम कर प्रचार किया गया। स्थानी टीवी चैनल की शिरकत से इसमें इजाफा हुआ। नि:संदेह कारवां ने इस प्रचार-प्रसार में खूब भूमिका निभाई।
  • रंग संस्कार थियेटरकारवां ने इस कार्यक्रम को जिस भव्यता से किया है, यह अब इसकी आवृत्तियों की अपेक्षा भी करता है। किसी भी समूह की सार्थकता सही मायने में उसकी अगली गतिविधि में ही होती है। कारवां ने खुद ही बेंचमार्क इतना ऊंचा स्थापित कर दिया है। अब उनकी खुद से ही स्पर्धा है।
  • इस आयोजन में देशराज का दो बिन्दुओं से विचलन अलवर के रंगकर्मियों को साफ नज़र आया। पहला - बिना टिकट से नाटक दिखाना। दूसरा - नाटकों का समय पर शुरू न कर पाना। हालांकि मुफ्त में देखने से नया दर्शक भरी मात्रा में जुड़ा है, लेकिन यहाँ ज़िक्र इसलिए है कि देशराज का इस मूल्य पर ज़बरदस्त आग्रह रहा है। वीआईपी मेहमानों को बुलाना नाटक में देरी की प्रसिद्ध वजह है, जिसे न चाहते हुए भी आवश्यक बुराई के तौर पर स्वीकार किया जाता है।
इस लेख का आकार जरूरत से ज्यादा लंबा हो गया है। अंत में रंग संस्कार थियेटर ग्रुप व कारवां फाउंडेशन व अलवर के नागरिकों को एक सफल आयोजन के लिए बधाई।

दलीप वैरागी  








Friday, January 1, 2016

नए साल में तुकबंदी

गए का गीत छोड़ कर नए की तलाश कर।
सुर्ख पलाश महकेंगे वसंत की तलाश कर ।
माज़ी तेरा श्वेत है तो श्याम भी होगा कहीं,
व्यतीत के व्यामोह में न मुस्तकबिल की तलाश कर। 
चूल्हा जले हर सिम्त उठे रोटी की महक,
बुझी हुई राख में चिंगारियां तलाश कर।
कारवां में रहजनी हुक्काम ही कर जाते हैं,
प्रजातंत्र में सोच कर रहबर की तलाश कर।
चंचल, लोभी, आशिक औ बावला 'बैरागी' मन
इस नए साल में किसी रहगुज़र की तलाश कर।
नए साल की शुभकामनाओं के साथ
दलीप वैरागी

Saturday, October 31, 2015

अभिव्यक्ति अपना व्याकरण खुद रच लेती है।

राजस्थान के पाली ज़िले के फालना में किशोरियों के आवासीय शिक्षण शिविर में अकादमिक सम्बलन हेतु आया था। चार महीने के इस शिविर में गरासिया जनजाति की पचास किशोरियाँ आवासीय रूप शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। अभी इस शिविर को शुरू हुए लगभग सप्ताह का समय हुआ था। जब मैंने शिक्षिकाओं से पूछा कि किस तरह के सपोर्ट की जरुरत है। सबने एक ही बात कही कि इन लड़कियों के साथ अभिव्यक्ति पर काम करने की जरुरत है।
मैंने लड़कियों से बातचीत शुरू की। लड़कियां मुखर नहीं थीं। वे बातचीत में नहीं जुड़ रही थीं। मैंने कुछ ऐसी गतिविधियाँ शुरू की जिससे लड़कियाँ बोलचाल में शामिल हों, सहज हों। पर इस सहजता के माने क्या हैं कई बार हमें खुद नहीं पता होते और अभिव्यक्ति के भी... लड़कियां हिंदी समझती हैं लेकिन ज्यादातर बातचीत मारवाड़ी में ही करती हैं। हिंदी वे बोलती नहीं तो फिर क्या किया जाए? सोचा जहाँ से वे मुखर हैं वहीँ से ही उन्हें सुना जाए। अभिव्यक्ति का भी एक जबरदस्त राजनैतिक रिश्ता होता है शिक्षक और विद्यार्थी के दरम्यान - जब उन्हें उनकी मातृ भाषा से अलग शिक्षक की भाषा या अन्य भाषा में सिखाया जाता है तो अनायास ही शिक्षक सत्ता के और भी ऊँचे शिखर पर जा बैठता है तथा विद्यार्थी हीनताबोध की गहरी खाई में। फलस्वरूप शिक्षक इस मुगालते को जुमले की तरह उछलता है कि विद्यार्थी अभिव्यक्ति में कमज़ोर है। यह मुगालता चेतन व अवचेतन दोनों में पलता है।
नाट्यकला ऐसी स्थिति में बहुत मदद करती है। नाट्याभिव्यक्ति का बहुत बड़ा हिस्सा शारीरिक भाषा का होता है। शारीरिक अभिव्यक्ति की भाषा कमोबेश सार्वभौमिक-सी होती है। उन लड़कियों से संवाद बनने की शुरुआत हो और वे बराबरी की हैसियत में आकर, होंसले से प्रक्रिया में शामिल हों, इन लड़कियों के साथ “शूज शफल” गतिविधि करवाई। शूज शफल एक बहुप्रचलित थियेटर एक्सर्साइज़ है। इसमें कोई वस्तु मंच पर रखी जाती है जिसे अभिनेता को अपनी कला से उसे अन्य वस्तु मान कर अभिनय करना होता है।
मैंने ऑब्जेक्ट के रूप में ढपली को रखा और लड़कियों से आकर अभिनय करने के लिए कहा। सन्नाटा। एक बार को मैंने मान ही लिया था कि यह गतिविधि भी अब तक आजमाई गई गतिविधियों में एक बन कर रह गई। फिर मैंने सोचा शायद यह मेरी हिंदी की सम्प्रेषणीयता का ही नतीजा तो नहीं। तो क्या मारवाड़ी में बोला जाए? या अनुवादक की भूमिका तय की जाए। अचानक मैंने शारीरिक अभिव्यक्ति के विकल्प को बेहतर माना और गतिविधि को एक बार डेमोन्सट्रेट कर दिया। इससे जैसे ठहरे पानी में लहरें उठीं और लड़कियां बारी-बारी से उठ कर आने लगीं। फेरी वाले की टोकरी, आरती का थाल, भिखारी का कटोरा, आटे की परात, चकला, बैठने की चौकी, आइना,आटा छलनी और जाने कौन-कौनसे रूपों में ढपली ढलने लगी।
एक तरफ ढपली है, दूसरे छोर पर लड़कियाँ और उनका शारीर इन दोनों को जोड़ते हुए एक विचार प्रवाहित हो रहा है दरम्यान। और यह विचार कल्पना को जन्म दे रहा है। और वह कल्पना अवचेतन की अँधेरी गलियों में से एक चरित्र को खोज लाई और उस चरित्र का जामा ओढ़कर लड़की खड़ी होती है और एक झीना पर्दा डाल देती है दर्शक की चेतना पर। उसी विचार की सरिता में  दर्शक भी डुबकी लगता है। अभिनेता की कल्पना दर्शक की छवि से एकाकार हो जाती है। जिससे चीजें जड़ होते हुए भी अलग-अलग रूपाकारों में नमूदार होने लगती हैं। शायद इसी कवायद को हम अभिनय कह देते हैं। छोटे बच्चे इस फन के उतने ही बड़े उस्ताद होते हैं। वे अपने नाटकीय खेलों में घंटो तक लकड़ी के चौकोर टुकड़े से हाथी के संवाद बुलवा  देते हैं और कोट के पुराने बटन की कश्ती बना सागर की लहरों पर छोड़ दें। मज़ाल है कोई चीज़ उनकी हुक्मउदूली कर दे। यहाँ दर्शक और अभिनेता वही होता है।
खैर, शूज शफल की गतिविधि चल निकली। अब वे लड़कियां भी सामने आने लगीं जो अब तक अपेक्षकृत कम सक्रीय थीं। कई तो दो तीन बार भी आ गईं। गतिविधि लंबी खिंच गई। मैं इसे समाप्त करना चाहता था या कोई नया मोड़ देना चाहता था। ऊब कही से भी प्रवेश कर जाती है।
इससे पहले मैं कोई तरीका सोचूं लड़कियों ने स्वयं ही एक बदलाव कर दिया। अचानक दो लड़कियाँ एक साथ उठकर आईं और रखे हुए ऑब्जेक्ट के साथ एक्ट करने लगीं। इसके साथ एक नया आयाम जुड़ गया जो विचार की नितांत आंतरिक निःशब्द यात्रा थी अब वह दो में साझा प्रक्रिया बन गया। फलस्वरूप इस साझा तैयारी ने शब्दों का ताना बाना भी बुनना शुरू कर दिया। विचार शब्दों के समुच्चय में उतरने लगा। इधर मैंने भी एक नया आयाम जोड़ दिया और ढपली के आलावा एक झाड़ू को भी रख दिया। अब झाड़ू भी उनकी साझा अभिनय यात्रा में शामिल हो गई। मैंने एक और वस्तु को शामिल कर दिया। पास रखी ढोलक को मंच पर सरका दिया। वस्तुएं बढ़ी तो चुनौती भी। पहले विचार में दो ही सहयात्री थे अब अन्य सिर भी आपस में जुड़ने लगे। धीरे-धीरे चीजें इस्तेमाल होने लगीं, अपने से जुदा रूपों में। धीरे-धीरे एक्ट में भाग लेने वाली लड़कियों की संख्या बढ़ने लगी। अपने आप जरुरत के अनुसार अन्य वस्तुएं भी जुड़ने लगीं और लोग भी। अब चौकोर (प्रोसिनीयम) रंगमंच गोल दायरे (एरिना) में बदलने लगा। गोल रूपाकार शायद लोगों के जुड़ने के लिए ही होता है। परिधि में कोई भी जुड़ जाए तो केंद्र नहीं बदलता। और चौखटे में केंद्र की कोई स्थिति कहाँ? किसी एक बाजु का घट बढ़त दूसरी तरफ का गणित गड़बड़ कर जाता है। शायद इसी लिए आदिवासी नृत्यों का फॉर्म वृत्ताकार परिधि में ही होता है। जबकि शास्त्रीय नृत्यों की कसावट एक चौखटे में कसी होती है। यहाँ आपके लिए दर्शक दीर्घा से मंच तक का फासला मीलों लंबा हो सकता है। लोक कलाओं में महज वृत्त की लकीर भर लाँघनी है।
गतिविधि में शामिल लड़कियों की संख्या इतनी बढ़ गई कि दर्शक और अभिनेता के बीच की रेखा धूमिल हो गई। अब गोल दायरे के बीच में विचार और बड़ा आकार ले चुका था एक क्षीण कथासूत्र के रूप में। प्रॉप्स भी यूज हो रहे थे अलहदा रूप में और अपने वास्तविक रूप में भी। खेल के नियम पीछे छूट गए। प्रारूप की जकड़न छूट गई। खेल अब खेला बन गया। सहज अभिव्यक्ति अपनी प्रकृति में ही विद्रोही होती है शायद। वह बाँध में नहीं बाँधी जा सकती।  वह अपने व्याकरण खुद रच लेती है। हॉल में अब अभिनय था, ऊर्जा थी और थी सरापा अभिव्यक्ति और सब उसमें सराबोर। मैं(निर्देशक) वहां होते हुए भी ओझल हो चुका था शायद अप्रासंगिक भी। कुछ था तो पूरे कमरे में तैर रहा था एक नाटक। अपने आप मिटटी में ऊगा हुआ सा। पूरे कमरे में अभिनय और ऊर्जा का सागर हिलोरें ले रहा था।उसने निर्देशक को नेपथ्य पर ला पटका।

Thursday, October 22, 2015

नाट्यकला पर एक प्रश्नावली

यूं तो हिन्दी रंग मंच की स्थिति किसी से छुपी हुई नहीं है, फिर भी इसकी वास्तविक स्थिति को जानना उन लोगों के लिए जरूरी होता है जो हिन्दी रंगकर्म को आगे ले जाने के लिए व्यवस्थित प्रयास करना चाहते हैं। यहा सवाल दर सवाल एक प्रश्नावली तैयार की है जिससे यह जानने का प्रयास किया गया है कि रंगकर्मियों, दर्शकों व अन्य जो नाट्यकला से अभी नहीं जुड़े हैं उनके मानस में नाटक को लेकर क्या छवि है। इस अध्ययन में यही जानने का प्रयास किया गया है। यह तभी हो सकता है जब ज्यादा से ज्यादा लोग इस फॉर्म को भरें। और इसे शेयर करें ताकि अधिक लोग इस अध्ययन का हिस्सा बन सकें।
इस प्रश्नावली को ऑनलाइन भरा जाना है। 
इसका लिंक नीचे दिया जा रहा है। 
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Monday, October 12, 2015

स्वरांजलि संगीत क्लब की एक सुरमयी शाम

यूँ तो हर तरह का संगीत जबरदस्त अनुशासन का उदहारण है। जब कोई गान किसी पहले से तैयार म्यूजिकल म्यूजिकल ट्रैक पर करना हो तो वह और भी ज्यादा अनुशासन की मांग करता है। साजिंदों की संगत में लाइव वाद्य यंत्रों के साथ गाना गायक को शायद थोड़ी छूट देता है। वह छूट होती है फ्रेम से थोडा बाहर जाकर कोई नवाचार करने की यहाँ गायक और संगत दोनों जीवंत माध्यम हैं, दोनों एक दूसरे का सहयोग करके आगे बढ़ते हैं। दोनों के लिए ही उत्कृष्टता का आग्रह मोटिवेशन का उत्स है। यहाँ उत्कृष्टता के मापदंड परिभाषित नहीं, दोनों ही, गायक और संगत प्रत्यक्ष प्रस्तुति के वक़्त खुद उत्कृष्टता के मापदंड रचते हैं। म्यूज़िक ट्रैक पर गायन में फ्रेम से बहार जाने की छूट नहीं है। यहाँ आपको यन्त्र के साथ दौड़ना है। और किसी ने  पहले से उत्कृष्टता के मापदंड तय कर रखे हैं, उनके साथ न्याय करना ज़रूरी होता है, इससे कम पर काम नहीं चलेगा। बहरहाल कोई भी तरीका हो दोनों का आउटकम संगीत का लुत्फ़ ही होता है, श्रोता के लिए और गायक के लिए भी।
पिछले लगभग डेढ़ साल से म्यूजिकल ट्रैक पर इस तरह की गायकी से अलवर के संगीत प्रेमी रूबरू हो रहे हैं "स्वरांजलि संगीत क्लब की मार्फ़त।
गत 10 अक्टूबर 2015 को स्वरांजलि संगीत क्लब ने "गाता रहे मेरा दिल..." एक संगीतमय शाम आयोजित की। इस संगीत संध्या के बहाने से अलवर के गायक कलाकारों ने किशोर कुमार की यादों को ताज़ा किया। इसी कार्यक्रम में जानेमाने संगीतकार रवीन्द्र जैन के निधन पर सबने मौन धारण करके श्रद्धांजलि दी। इस संगीत संध्या में अलवर के कलाकारों ने किशोर कुमार के गानों को अपनी आवाज में गाकर शाम को सुरमयी बना दिया। कार्यक्रम को फरमाइशी स्वरुप भी दिया गया था। श्रोताओं के अनुरोध पर कलाकारों ने गीत सुनाकर अपनी गायकी की परिपक्वता का परिचय दिया। नए पुराने सभी कलाकारों ने एकल, युगल, सामूहिक व मेंडली विधाओं में अपनी प्रस्तुतियाँ दी। इसी के समान्तर सञ्चालन भी बहुत सधा हुआ था। सरला जैन व महिपाल सिंह जी की उद्घोषक जुगलबंदी लगातार कार्यक्रम को रोचक बनाते हुए चल रही थी। दर्शकों के साथ सीधे संवाद बनाना व संगीत के गुरुओं चीनू जी व विनीत जी से किशोर कुमार जी के जीवन के विभिन्न रोचक प्रसंगों को सुनना जहाँ नयी पीढ़ी के लिए ज्ञानवर्द्धक रहा वहीं इन उस्तादों के लिए सम्मान स्वरुप भी था। विनीत जी व चीनू जी ने पिछले 10-15 वर्षों में एक पीढ़ी को तराशा है जिसके नतीजे दिखाई देते हैं।

स्वरांजलि संगीत क्लब अब तक सात ऐसी संध्याएं आयोजित कर चुका है। यह अब संगीतप्रेमियों का इतना बड़ा कुनबा बन गया है कि आदिनाथ कॉलेज का सभागार खचाखच भरने के लिए काफी है। इस संगीत क्लब ने अलवर के गायकों को एक माला में तो पिरोया ही है वहीं एक रसिक दर्शकों का एक समुदाय भी खड़ा किया है। यह क्लब आज एक बड़ी टीम है लेकिन निःसंदेह इसके प्रणेता गायत्री म्यूजिक के सचिन जी हैं। पिछले डेढ़ दशक से सचिन इस तरह के कार्यक्रम की पृष्ठभूमि रच रहे थे। उन्होंने एक-एक करके बरसों से म्यूजिक ट्रेक्स का संग्रह किया है। इसके साथ ही वे हमेशा लोगों को इन ट्रेक्स के साथ गाने की तालीम भी देते रहे हैं। जब भी कभी अलवर में इस शैली के गायन का मूल्याङ्कन होगा तो सचिन जी इसके प्रारम्भ में अकेले खड़े दिखाई देंगे। आज उन्होंने अपने सतत प्रयासों व इस तरह के कार्यक्रमों की बारंबारता से गायकों के समूह को एक मंच प्रदान किया है।
इस कार्यक्रम से जुडी कुछ उल्लेखनीय बाते है -
  • यहाँ कोई वीआईपी कल्चर नहीं हैं। खास और आम मेहमानों वाला फर्क नज़र नहीं आता।
  • कर्यक्रम में बच्चों से दीप प्रज्ज्वलन करवाना एक एक नयी पहल है।
  • एक ही जगह पर कार्यक्रम की बारंबारता से इवेंट व स्थान दोनों को पहचान मिलती है। निःसंदेह स्वरांजलि ने ही रंगकर्मियों के सामने यहाँ गतिविधियाँ करने का एक विकल्प दर्शाया। आज रंगकर्मी आदिनाथ सभागार को एक विकल्प के तौर पर देख रहे हैं।
पिछले दिनों स्वरांजलि की तरफ से यह आवाज आ रही थी कि वे अपने साथ नाट्य गतिविधियों को भी जोड़ने जा रहे हैं। अभी उसकी कोई रूपरेखा उभर कर सामने नहीं आई है। यदि ऐसा संभव होता है तो दोनों को फायदा होगा। संगीत और नाट्यकर्म में
बहुत कुछ है जो साझा हो सकता है।
स्वरांजलि परिवार को सफल प्रस्तुति के लिए बधाई।
दलीप वैरागी 
9928986983 
(कृपया अपनी टिप्पणी अवश्य दें। यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।  इससे इन्टरनेट पर हिन्दी को बढ़ावा मिलेगा तथा  मेरी नाट्यकला व  लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा। ) 

Sunday, October 11, 2015

कहाँ है चौथी कक्षा के निबंध वाली गाय

गाय पर शायद दूसरी बार लिख रहा हूँ। एक बार तब लिखा था जब चौथी क्लास में था। या फिर आज लिख रहा हूँ। गाय पर लिखना मेरे लिए उस वक़्त भी मुश्किल था और अब भी है। तब गाय इतनी सरल थी और हमारी लेखनी बहुत ऊबड़खाबड़ " गाय के चार पैर,दो सींग होते हैं... गाय घास खाती है और हमें दूध देती..." ये चार पंक्तियों का निबंन्ध तब भी न सधता था। जरा सा हेर-फेर और मास्टर की छड़ी। आज जब लेखनी कुछ सधी है तो गाय पहले जैसी नहीं रही है।
बहरहाल गाय जब आज राजनैतिक चर्चा का मुद्दा बन गया है, अचानक मुझे तीन साल पुराना एक अनुभव याद आ गया।
बात राजस्थान की ही है। शिक्षा में काम कर रही एक संस्था के कार्मिकों के प्रशिक्षण चल रहा था। प्रशिक्षक दल में मैं भी था। उसी शहर के नजदीक एक बहुत बड़ी गौशाला है और उसका बहुत नाम भी। लोगों ने कहा कि आए हो तो एक बार गौशाला को भी देखो। एक शाम को हम पांच साथी गौशाला देखने निकल पड़े। सच में बहुत बड़ी गौशाला थी। वहां हजारों गाय थीं। बहुत व्यवस्थित रूप से प्रबंधन था। प्रबंधन के एक व्यक्ति ने हमें गौशाला का बड़े उत्साह से एक गाइड के रूप में भ्रमण कराया। उसने गौशाला की परिधि से बताना शुरू किया। जहाँ पर हजारों गाय थीं। गायों का अस्पताल, गायों का आइसीयू वार्ड, गायों का ऑपरेशन थियेटर व गायों का एम्बुलेंस। एक तरफ गायों के चारे का भंडार। बीमार गायों की सेवा में लगे अस्पताल के कार्मिक। हम अंदर की व्यवस्थाओं से बहुत प्रभावित हुए।
अब घूमते हुए थोड़ा भीतर की ओर आ गए। गाइड ने कहा कि इस भाग में सभी भारतीय नस्ल की गाय हैं। उन्होंने हमें तमाम देशी नस्लों के नाम व पहचान बताईं जो अब विस्मृत हो चुकी हैं। अभी तक हममे पूरी गौशाला देखने का उत्साह कायम था।
अब हम गौशाला के केंद्र के पास आ गए। गाइड ने हमें वहाँ रोक कर कहा, "अब हम गौशाला के मुख्य भाग में प्रवेश कर रहे हैं। यहाँ जो गाय हैं वे सब उस गाय की संतति हैं जिसे बरसों पहले इस गौशाला के संस्थापक लेकर आए थे।" यह भाग चारदीवारी के भीतर था। गाइड ने कहना जारी रखा, "इस हिस्से में मुस्लमान को प्रवेश की इजाजत नहीं!" यह सुन कर हमारी नींद खुली। हमें पहली बार अहसास हुआ कि हमारे प्रशिक्षण टीम में सलमा भी हमारे साथ है जो अब तक भ्रमण को उतना ही एन्जॉय कर रही थी जितना कि सब। पहली बार टीम दो हिस्सों में तकसीम होती दिखी। हम सन्निपात की स्थिति में थे। अचानक हमारे एक साथी ने सलमा को सुनीता संबोधित करते हुए कहा, "सुनीता तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है, गाड़ी में आराम कर लो..."
आगे जाने का उत्साह अब नहीं था केवल जिज्ञासा भर थी कि अंदर का गौधन बहार से कितना भिन्न है जिसे प्राचीर में रखा है। गाइड के निर्देशानुसार जूते बहार खोल कर हम अंदर दाखिल हुए। अंदर भी केवल गाय ही थीं बिलकुल गाय जैसीं। वैसी ही जैसी चौथी क्लास के निबंध में होती थी - वही गाय, जिसकेे चार पैर और दो सींग होते थे... गाय घास खाती है और दूध देती है।" मुझे तो कोई भेद नज़र नहीं आया बाहर और भीतर की गायों में। भेद सिर्फ यहाँ के निज़ाम की सोच में ही नज़र आ रहा था। यह यात्रा दिमाग में कई सवाल छोड़ गई। इंसानों ने जो संकीर्ण दायरे खुद के लिए बना रखे हैं, उनके प्रतिबिम्ब वह इन बेजुबानों में क्यों देखना चाहता है? अपनी समाज व्यवस्था जानवरों पर क्यों आरोपित करना चाहता हैं?
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दलीप वैरागी 
09928986983 

Monday, October 5, 2015

हास्य नाट्य समारोह के ठहाकों की गूंज अलवर की फिज़ाओं में कई दिन तक रहेगी

कल 4 अक्तूबर 2015 का दिन अलवर रंगकर्म में काफी महत्त्व का था। वह इस लिए कि अलवर में नवनिर्मित प्रताप ऑडिटोरियम में पहली बार कोई नाट्य गतिविधि संपन्न हुई। यूँ तो यह ऑडिटोरियम बने हुए लगभग दो साल का वक़्त हो गया है लेकिन रंगकर्मियों के लिए यह आज भी मरीचिका बना हुआ है। इसको बुक करने का शुल्क इतना अतार्किक है कि रंगकर्मी इसको बुक करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। अंततः यह काम रंग संस्कार थियेटर ग्रुप के देशराज मीणा ने कर दिखाया। और उन्होंने "हास्य नाट्य महोत्सव" के रूप में एक खूबसूरत शाम का अनुभव अलवर के दर्शकों के लिए रच दिया।
कल शाम प्रताप ऑडिटोरियम पर तीन नाटकों का मंचन हुआ जिसका विवरण इस प्रकार है -
पहला नाटक – “निठल्ला”
हरिशंकर परसाई के व्यंग्य रचनाओं पर आधारित इस नाटक का निर्देशन देशराज मीणा ने किया। इस नाटक में दो अभिनेताओं दीपक पाल सिंह व अंकुश शर्मा ने अपने सधे हुए अभिनय से दर्शकों को आद्यंत जोड़े रखा। दोनों अभिनेताओं ने सादगी से मंच पर कथा का नैरेशन भी किया और विभिन्न चरित्रों को भी निभाकर दर्शकों को गुदगुदाया और  परसाई जी के व्यंग धार से कहीं दर्शकों के मानस पर नश्तर भी छोड़े। यह सधे हुए अभिनय की मिसाल ही है कि कोई अभिनेता बड़ी चतुराई से दर्शक दीर्घा में बेबाकी से फोन पर बात करते हुई दर्शक की भी खबर ले डाले, बिना अपनी भूमिका से विचलित हुए। इस व्यंग नाटक ने जहाँ इन अभिनेताओं ने नेता, नौकरशाह व संतों की पोल खोली वहीं आखिरी संवाद तक आकर दर्शक को भी नहीं छोड़ा और गिरेबां में झांकने के लिए मज़बूर कर दिया।
दूसरे नाटक " उसके इंतज़ार में" के लेखक निर्देशक प्रदीप प्रसन्न हैं । इन्होंने नाटक में अभिनय भी किया। प्रदीप इन दिनों अहमदाबाद में रहकर शोध कर रहे हैं तथा वहां रहते हुए उन्होंने वहां शौकिया रंगकर्मियों की एक अच्छी खासी टीम बना ली है, जो वास्तव में बहुत बड़ी बात हैं। अपनी टीम के साथ अलवर में मंचन के लिए आए थे। उसके इंतज़ार में एक पूर्णतया हास्य नाटक है।  इस नाटक में एक परिवार की कहानी है, जहाँ लड़की को देखने के लिए आए हैं। विभिन्न परिस्थितियों के माध्यम से प्रदीप हास्य रचते हैं। पारिवारिक नोकझोक है, नौकरानी से इश्क है, बेरोजगारी है व मनुष्य की सहज दुर्बलताएँ हैं । इन छोटी-छोटी स्थितियों के माध्यम से प्रदीप जहाँ गुदगुदाते हैं वहीं गंभीर चोट भी कर जाते हैं और अगले ही पल हास्य की मसाज भी कर देते हैं। एक नाटककार के रूप में प्रदीप प्रसन्न विधा की नब्ज़ पकड़ चुके हैं। उनसे इसी तरह और लेखन की आगे भी उम्मीद है।
तीसरे नाटक के रूप में मोलियार की रचना "बिच्छू " का मंचन किया गया। इस नाटक का निर्देशन अंकुश शर्मा ने किया। अंकुश इस नाटक में भी प्रमुख भूमिका में थे। मोलियार की इस क्लासिक कृति के हिंदुस्तानी अनुवाद में दो परिवारों की कहानी है। जहाँ रूढ़िवादी कंजूस पिता भी हैं तो उनकी तथाकथित तरक्कीपसंद इश्कमिज़ाज़ सन्तानें भी।  इस पीढ़ी अंतराल और इस खाई को अपने अजीबोगरीब कौशल से सामंजस्य बनाने और उनकी खबर लेते हुए रहमत के किरदार को पूरी ऊंचाई पर लेकर जाते हैं अंकुश शर्मा। रहमत का किरदार सबको अपने इर्द-गिर्द मौज़ूद तुर्प के इक्के की याद दिलाता है जो किसी भी गाँव मौहल्ले के लिए उतना ही अपरिहार्य है जितना कि वह तिरस्कृत भी है। ये सारी परिस्थितिया गजब का हास्य रचती हैं। उर्दू ज़बान के शब्दों के साथ सभी कलाकारों ने उच्चारण की शुद्धता का ख्याल रखते हुए यह साबित किया कि वे प्रशिक्षित व पेशेवर अभिनेता हैं।
यह आयोजन एक दिन में कई बाते अलवर रंगकर्म को कह गया -
  • ऑडिटोरियम की शुल्क कम करने के लिए प्रशासन से मांग करना जरुरी तो है लेकिन उसके कम होने के इंतज़ार में बैठे रहना भी ठीक नहीं। जब तक उस जगह पर कोई गतिविधि नहीं होगी तो प्रशासन को उसकी जरुरत भी समझ नहीं आएगी।
  • यहाँ आयोजन होने से ही इसकी अंदर की खामी पता चली कि उसकी बनावट में बुनियादी चूक भी हुई हैं। साईक मंच के इतने पीछे चिपका कर लगाई गई है कि अभिनेता के मूवमेंट के लिए भी पर्याप्त स्थान नहीं। पंखे हैं नहीं, एसी लगे नहीं। दो घंटे की अवधि दर्शको को गर्मी में तलने के लिए काफी हैं।
  • नाटक को समय पर शुरू करना बहुत जरुरी है। लेकिन यह उतना ही दुर्लभ भी है। लेकिन कल का शो समय पर शुरू होने के पीछे निसंदेह देशराज की जिद को ही माना जा सकता है। इसके लिए देशराज साधुवाद के पात्र हैं। उन्होंने विशिष्ठ अतिथियों को भी आमंत्रित किया लेकिन उनके आदर सत्कार को बरक़रार रखते हुए उन्होंने दर्शको के समय व रसास्वादन को बाधित नहीं होने दिया।
  • इतनी महत्वपूर्ण गतिविधि की अगले दिन किसी अख़बार में कोई खबर नहीं मिलने पर अच्छा नहीं लगा। प्रिंट मिडिया की यह  दूरी समझ में नहीं आई।
  • इस रंग अनुभव को रचने में हालाँकि देशराज व प्रदीप अलवर के रंगकर्मी हैं लेकिन इनके अतिरिक्त पूरे अभिनेता दिल्ली जयपुर व  अहमदाबाद से थे। निःसंदेह इन अभिनेताओं ने अलवर के रंगकर्म को एक्सीलेंस के मापदंडों से परचित अवश्य करवाया। उम्मीद है भविष्य में अलवर के रंगकर्मी भी इस ऑडिटोरियम पर शिरकत करते दिखाई देंगे।
सारांशत: यह कहा जा सकता है कि रंग संस्कार थियेटर ग्रुप द्वारा आयोजित "हास्य नाट्य समारोह" के ठहाके की गूंज काफी समय तक अलवर रंगमंच की फिजा में गूँजेगी। अपनी तमाम मज़बूतियों के बावज़ूद यह कहे बिना बात ख़त्म नहीं की जा सकती कि यह हास्य का ओवरडोज़ भी था। काश! ये तीनो नाटक, तीन दिन क्रमिकता से मंचित होते तो माहौल और सघन बन सकता था। कुछ अधिक दर्शक जुटाए जा सकते थे। फिर भी आयोजकों बधाई , दर्शकों को बधाई !
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दलीप वैरागी 
09928986983 


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