Sunday, May 24, 2015

मेरी डायरी का एक पन्ना : उम्र, उत्साह व जज़्बा

मई का महीना हो, पारा पचास डिग्री को छूने जा रहा हो और आप ट्रेन में बैठ कर जयपुर से अलवर के बीच यात्रा कर रहे हों। आपका गला सूख रहा हो, बोतल का पानी ख़त्म हो जाए। ऐसे में गाड़ी के प्लेटफॉर्म पर रुकने पर आप अपनी खली बोतल बहार निकालें और पल भर में आपकी बोतल ठण्डे पानी से भर जाए तो इसे कोई चमत्कार नहीं समझें।
यह आजकल जयपुर से अलवर तक के सभी स्टेशनों पर आम दृश्य है। जैसे प्लेटफार्म पर ट्रेन आने की उद्घोषणा होती हैं पंद्रह-बीस लोग पानी से भरे ड्रमों को पहिए वाली ट्रॉली पर खींचते नज़र आ जाएंगे। कुछ लोग उन ड्रमों में बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े काट कर डालने लगते हैं। जैसे ही ट्रेन प्लेटफार्म पर मंथर गति से आकर रूकती है। कई जोड़ी झुर्रियोंदार हाथ मुस्तैदी से पानी का जग व कीप थामे डिब्बे की खिड़कियों की और लपकते हैं। ये हाथ दो मिनट के अल्प समय में ही खिड़कियों से झांकती खाली बोतलों को ठन्डे पानी से लबालब भर देते हैं। एकदम निशुल्क। कई बार आधी बोतल होने पर ट्रेन गति बढ़ा देती है तो इन झुर्रीदार हाथों का साथ पैर भी देने लगते हैं। लगभग एक दौड़ लगती है, बोतल के भरने पर्यन्त! इस सारी कवायद के बीच कई बोतल-ब्रांड - बिसलेरी, एक्वाफिना, बैली, किनले और रेलनीर ठेलों के फ्रीजरों में शरमा कर दुबके बैठे रहते है। या वातानुकूलित कोच का रुख इख़्तियार करते हैं।
यह कवायद सुबह ड्रमों की सफाई व बर्फ की सिल्लियों को सँभालने से शुरू होती है और दिन छिपने के बाद तक भी चलती रहती है। इस पूरे निजाम को चलाते हैं नौकरियों से विश्राम पा चुके साठ की उम्र पार कर चुके लोग। ये वो लोग हैं जिन्हें अपने घरों में लगभग बेकार व अयाचित व्यक्ति समझ लिया जाता है। मैंने कई बार इन्हीं लोगों को टिकट की खिड़की पर बाबू द्वारा सीनियर सिटीजन का सबूत देने की झिड़की सुनते देखा है। ये लोग इस व्यवस्था को कैसे चलते हैं, मैंने इसमें झाँकने की कोशिश नहीं की। मैं तो इस व्यवस्था पर ही अभिभूत हूँ। यह कैसे किया जाता है निसंदेह ही यह किसी मानव संसाधन के अध्येता के लिए शोध का विषय हो सकता है कि ऐसा क्या मोटिवेशन है कि जिन लोगों को जरुरी मानव संसाधन न मानकर रिटायरमेंट दे दिया जाता है, वे लोग इतनी बड़ी व्यवस्था को कैसे बिना थके बनाते हैं। पता नहीं यह आई आई एम के कोर्स में पढ़ाया जाता है या नहीं।
जो भी हो मैंने इस व्यवस्था से एक दो सिद्दांत व सीख निकलने की कोशिश की है जो इस प्रकार हैं-
  • उम्र कोई बाधा नहीं होती है। यदि आपमें दृढ विश्वास है कि यह काम करने योग्य है और मानवता के हित में है। कार्य का प्रेरण भीतर से ही आता है न कि बाह्य उपक्रमों से।
  • दूसरे, इन लोगों ने इस मान्यता को पुष्ट किया है कि पानी इंसान की मूलभूत अवश्यताओं में सबसे ऊपर है। हर हाल में, हर इंसान को साफ व शीतल पानी निशुल्क मिलना चाहिए। यह समाज का दायित्व है।
  • आज भले ही मूलभूत आवश्यकताओं की चीजों को बाज़ार ने अपनी गिरफ़्त में लेकर गरीबों की पहुँच से बाहर कर दिया हो। इस उदहारण ने सिद्ध कर दिया कि चाहे एक सीमित जगह या सीमित समय के लिए ही सही, पूरी निष्ठा से किया गया ईमानदार प्रयास बाज़ार को चुनौती दे सकता है।
  • हमारे यहाँ परम्परा रही है रास्तों व बाज़ारों में प्याऊ लगाकर पानी पिलाने की। उन स्वस्थ परम्पराओं को पुनर्जीवित किया जा सकता है।नयी पीढ़ी में यह सन्देश जाना चाहिए।
  • आखिर में यही कहना है कि हमारे बुज़ुर्ग कभी भी गैर जरुरी व निरे आश्रित नहीं होते हैं। उनमे भी बहुत कुछ करने का जज़्बा व ऊर्जा होती है बशर्ते हम उनको सुनें।



Monday, May 11, 2015

इनके नाम क्या केवल कोड नंबर हैं

कल कैफ़ी आज़मी की याद में इप्टा अलवर द्वारा आईएमए, सभागार में आयोजित संगीत प्रतियोगिता का कार्यक्रम देखने का अवसर मिला। इप्टा अलवर के अध्यक्ष श्री कान्ति जैन, महासचिव श्री प्रदीप माथुर व पूरी टीम का बहुत आभार जो उन्होंने अलवर शहर की संगीत की प्रतिभाओं को छोटे से स्टेज पर इकट्ठा कर दिया। न केवल नवोदित कलाकार बल्कि संगीत के उस्ताद लोग भी दर्शक दीर्घा में बड़ी तादाद में मौजूद थे। पूरा संगीतमय माहौल था। पूरा हॉल दर्शकों से भरा था। भौतिक व्यवस्थाएँ भी अच्छी थीं। दर्शकों के जलपान की व्यवस्था भी की गई।  इप्टा हर वर्ष इस कार्यक्रम को बड़ी शिद्दत के साथ आयोजित करती है।
इस बार का कार्यक्रम मेरे लिए इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने मुझे एक ऐसे मुद्दे पर सोचने के लिए प्रेरित किया, जिस पर मैंने पहले कभी नहीं सोचा था। इस लेख में जिस मुद्दे पर मैं अपने विचार रख रहा हूँ उसमें केवल सन्दर्भ ही इप्टा के कार्यक्रम का है, लेकिन यह मुद्दा वैश्विक-सा ही है। अत: आगे का विचार हम इप्टा के सन्दर्भ से अलग होकर करेंगे और इसे जनरलाइज़ करके देखेंगे। आम तौर पर यह दृश्य किसी भी सांस्कृतिक प्रतियोगिता का हो सकता है।
एक लड़की स्टेज पर आती है। बड़े ही सधे हाथों से माइक पकड़ती है। पीछे ताल मिलाने के लिए बैठे आर्केस्ट्रा वालों से मशविरा करती है कि किस सुर में गाने जा रही है। इतने में ही उद्घोषिका का मधुर स्वर सुनाई देता है, "प्रतियोगिता की पहली प्रस्तुति लेकर आपके सामने आ रही हैं कोड नंबर वन जीरो वन..." जैसे ही वह श्रेया घोषाल के अंदाज़ में सुर उठाती है, " मेरे ढोलना सुन..." तो फिर सुनने वाले को लगता है कि इस लड़की का नाम कोड नंबर वन ज़ीरो वन से कुछ ज्यादा होना चाहिए।
दूसरी प्रस्तुति के लिए उद्घोषणा होती है, "... और अब आ रहे हैं कोड नंबर वन जीरो टू... "
वन ज़ीरो टू मंच पर आता है। वन ज़ीरो टू की ऊंचाई है, सवा चार फुट, वन ज़ीरो टू की उम्र 10-11 साल है, रंग गोरा और आँखों में चमक वाले वन ज़ीरो टू गाना शुरू करता है। गाने के बोल हैं, "झुकी झुकी सी सी नज़र... सुनकर लगता है कि इसकी पहचान कोड नंबर, कोड नंबर वन ज़ीरो टू इसके साथ न्याय नहीं कर पा रही है। "...  अगली प्रस्तुति के लिए फिर उद्घोषणा होती है, “अब मैं कोड नंबर वन ज़ीरो थ्री को बुलाना चाह रही हूँ।" कोड नंबर वन ज़ीरो थ्री मंच पर आता है सरापा बिजली। हाथों-पैरों में बिजली सी तेज़ी...घुंघराले बाल... छरहरी काया... आते ही अपनी उम्र से भी ऊँचा सूफ़ी कलाम उठाया, "कागा सब तन खाइयो, मेरा चुन चुन खैओ मास
दो नैना मत खाइओ, मोहे पिया मिलन की आस।" इसके बाद ऐसा सुर चढ़ा, " छाप तिलक सब छीनी..."  आवाज़ और साज़ की इस कलाकार ने ऐसे संगति बिठाई कि पूरे हॉल में एक वायब्रेशन हो गया। लगा कि इस कलाकार का नाम भी कोड नंबर वन ज़ीरो थ्री या फॉर से कहीं ज्यादा होना चाहिए। वैसे ही जैसे अमीर खुसरो का एक नाम है। वैसे ही जैसे कैलाश खेर का एक नाम हैं।
क्या इन बच्चों के माँ-बाप ने इनके नाम फ़क़त कोड नंबर... रखे हैं? यदि नहीं तो इन प्रतियोगिताओं में किस विवशता के तहत उनके नाम पर हम एक कोड नंबर चस्पा कर देते हैं।
बहुत सोचने पर मैं इस नतीजे पर पहुँच पाया कि इसके पीछे निम्नलिखित मान्यताएं हो सकती हैं-  
  • चूँकि परम्परा से ऐसा चला आ रहा है।
  • बराबरी की अवधारणा
  • निष्पक्षता के आग्रह की वजह से
कोई और वजह भी हो सकती है। अब सिलसिलेवार उपरोक्त मान्यताओं का विश्लेषण करते हैं।
यदि बराबरी के आग्रह के कारण इन बच्चों को कोड नंबर दिए जाते हैं, तो उस लक्ष्य को तो हम प्रतियोगिता में सामान अवसर प्रदान करके प्राप्त कर लेते हैं। जब हम बिना किसी,जाति, धर्म व जेंडर का विचार किए इन बच्चों को मंच प्रदान करते हैं तो फिर बराबरी की बात तो हो गई। वैसे हमेशा यूनिवर्सल बराबरी से काम नहीं चलता।इन प्रतियोगीतों में भी जूनीयर व सीनियर वर्ग में प्रतियोगिता करके हम एक तरह का भेदभाव ही करते हैं लेकिन वह एक सकारात्मक भेदभाव है। इस लिए मेरा मानना है की विविधता को वैल्यू करना चाहिए। और बराबरी का यही मतलब होना चाहिए कि बच्चा जिस भी सामाजिक व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आ रहा है, उसे अपने में अन्तर्निहित संभावनाओं को निखारने का मौका मिले। जब वह यह सब कर रहा होता है, तो उसकी एक पहचान बन रही होती है। अब सोचो जब उस धुँधली उजली पहचान के शुरू में ही उस पर कोड का लेबल लगा देंगे तो बच्चे का किरदार कैसे खड़ा हो पाएगा। तो प्रतियोगिताएँ बराबरी की अवधारणा के एकदम उलट बैठती हैं। इसमें मौका तो सबको देते हैं लेकिन प्रतिष्ठित किसी एक को करते हैं। हम आगे उसे ही जाने देते हैं जो विजय की हमारी इंटरप्रिटेशन पर फिट बैठता है। जबकि इन प्रतियोगीतों में आने वाला प्रत्येक बच्चा अद्वितीय होता है। उसकी अपनी रूचि व रुझान होता है। अभिव्यक्ति का अपना अंदाज़ व आयाम होता है। क्या जो निर्णायक होते हैं वे इस तरह के वैविध्य से पेश आने के लिए तैयार होते हैं?
यदि इस कोड सिस्टम के पीछे निष्पक्ष निर्णय का आग्रह है तो फिर हमें इन बच्चों की पहचान से छेड़छाड़ करने की बजाए निर्णायकों की क्षमतवर्द्धन पर ध्यान देना चाहिए। स्कूली परीक्षाओं में ऐसा होता है कि परीक्षाओं में धांधली नहीं हो इसलिए कॉपियों पर नाम की बजाए रोल नंबर डाले जाते हैं। होने को वहां भी ठीक नहीं। लेकिन यहाँ तो प्रतियोगिता संगीत की है, लाइव संगीत की। यहाँ प्रतियोगी व जज के आलावा तीसरा दर्शक और भी है। जिसकी उपस्थिति प्रभावित करती है। कलाकार अपनी कला से दर्शक को प्रभावित करता है और दर्शक अपनी प्रशंसा से। दर्शक जज से इतर भी सोचता है। इसी सब के दौरान सभी कलाकारों की छवि दर्शक के मन में बनती है। अब दर्शक की विवशता है कि वह उस बनती मिटटी छवि को कोड नंबर से सम्बद्ध करने में मुश्किल मुश्किल महसूस करता है।
मुझे लगता है कि बच्चों को उनके वास्तविक नाम के साथ मंच पर बुलाना चाहिए। हमारे यहाँ विडम्बना यही है कि हर तरह की उपलब्धि को हम गणित में रूपांतरित करके ही देखते हैं। चलो जब तक उपलब्धि को आंकने के लिए गणित का कोई विकल्प नहीं मिलता तब तक हम बच्चों के नामों को तो गणितीय भाषा से निकाल सकते हैं।
मुझे लगता है कि बिना सोचे ही परम्परा का निर्वहन हो रहा है। इप्टा जैसी संस्था को इस पर सोचना चाहिए। इप्टा ही है जो परम्पराओं को चुनौती देकर नया सौंदर्यशास्त्र रचती आयी है। यहाँ भी बच्चों की अपनी पहचान की खातिर उसे उन्हें अपने नाम से पुकारा जाना चाहिए। कलाकार होने के नाते मैं तो अपने स्तर पर यही महसूस करता हूँ कि किसी प्रतियोगिता या किसी और मंच पर मुझे यदि नाम कि बजाए किसी और संज्ञा या कोड से बुलाया जाएगा तो बहुत बुरा लगेगा। मेरे साथ ऐसा बहुत बार हुआ है जब मैं किसी प्रतियोगिता जीता नहीं मगर एक पहचान को अर्जित करके लोटा हूँ। जो मेरे नाम के साथ सम्बद्ध होती थी न कि कोड से।  


Friday, May 8, 2015

सूचना का अधिकार : क्या कोई और रास्ता भी है ?

यह अर्जी इग्नू में लगाने से पहले मैं इसे ब्लॉग पर इस लिए डाल रहा हूँ, ताकि जो लोग इस कानून के विरोध में है वे मुझे सुझाएँ कि क्या कोई और रास्ता भी है। जो लोग इस कानून में विश्वास रखते है में मार्गदर्शन करें कि इस अर्जी को और धारदार कैसे बनाया जा सकता है।


सेवा में,
पब्लिक इन्फोर्मेशन ऑफिसर,
स्कूल ऑफ परफोरमिंग आर्ट्स,
इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU)
नई दिल्ली।
विषय : सूचना का अधिकार अधिनियम – 2005 के तहत सूचनाएँ लेने हेतु।

महोदय,
विनम्र निवेदन है कि इग्नू से जो सूचनाएँ मुझे चाहिए उनका जिक्र करने से पहले मुझे उसकी भूमिका के रूप में कुछ कहना है।

आरटीआई की अर्जी की जरूरत क्यों पड़ी
महोदय, जो सूचना मुझे चाहिए वे किसी भी इंसान के लिए सहज सुलभ होनी चाहिए। लेकिन मैं पिछले दो महीने से  उन्हें प्रोपर  चैनल से प्राप्त करने की कोशिश कर रहा हूँ। बात दरअसल यह है कि मैंने विश्वविद्यालय की वेब साइट से पता किया कि यहाँ से  प्रदर्शनपरक कला में सर्टिफिकेट-नाट्य कला (सीपीएटीएचए) करवाया जाता है। जब मैंने इस कोर्स के लिए रीजनल केंद्र, जयपुर से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि इस कोर्स के अध्ययन की सुविधा यहाँ नहीं है, इसलिए आप विश्वविद्यालय के दिल्ली कार्यालय में संपर्क करें। तब, मैंने वेब साइट पर दिये नंबरों पर बारी-बारी से फोन मिलाया मुझे कोई मदद नहीं मिली। फोन लाइनों का रेस्पोंस निम्न प्रकार आया –
·     अधिकतर बार तो फोन कनेक्ट ही नहीं हुआ।  
·     कुछ नंबरों पर, “यह नंबर स्थायी रूप से सेवा में नहीं” की ध्वनि आई।
·     यदि दो चार बार कनेक्ट हुआ तो लंबी घंटी के बाद अपने आप कट गया यानि किसी ने उठाया नहीं।  
·     किस्मत से एक बार किसी ने फोन उठाया पर यहाँ भी बदकिस्मती देखो, उधर से आवाज़ आई, “आपका फोन पुस्तकालय में लग गया है, मैं आपको सही नंबर देता हूँ।” सही नंबर पर फोन लगाया तो किसी ने चोंगा ही नहीं उठाया।
हो सकता है यह यंत्रणा मेरे अकेले की ही न हो। अब आप ही बताइये आप एक दूरस्थ शिक्षा माध्यम वाले विश्वविद्यालय हैं। देश-दुनिया में हजारों मील दूर बैठा व्यक्ति कैसे आप से संवाद कायम कर पाएगा? वेब साइट पर सूचना पूरी नहीं है और फोन से डायलॉग हो नहीं पा रहा है। यह एक दूरस्थ शिक्षा वाले विश्वविद्यालय के लिए बहुत ही सोचनीय बात है।  यह तब और भी विचारणीय हो जाती है जब विश्वविद्यालय की आत्मछ्वि वैश्विक स्तर की हो।
महोदय, मेरी मजबूरी है कि फ़ोन पर बात हो नहीं रही है और दिल्ली आने की मेरे पास अभी फुर्सत व सामर्थ्य नहीं है। इसलिए आरटीआई के अलावा कोई विकल्प नहीं। अत:

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत निम्नलिखित सूचनाएँ प्रदान करें
  •      प्रदर्शनपरक कला में सर्टिफिकेट-नाट्य कला (सीपीएटीएचए)  का कोर्स क्या आपके विश्वविद्यालय से करवाया जाता है? यदि कभी-कभी नहीं करवाया जाता है तो उसका तर्कसंगत आधार क्या है?
  •  क्या अलवर या जयपुर, राजस्थान का निवासी, जिसकी थियेटर में रूचि है व रंगमंच से जुड़ा हुआ है, तथा आपकी वेब साइट पर इस कोर्स के लिए अपेक्षित सभी योग्यताओं को पूरा करता है, क्या वह इस कोर्स में प्रवेश पा सकता है ? यदि हाँ तो क्यों, नहीं तो क्यों?
  •   कृपया इस कोर्स की प्रवेश प्रक्रिया बताएं तथा अध्ययन के क्या चरण होंगे? 
  •    रीज़नल सेंटर पर यह कोर्स अनुपलब्ध है और आपकी वेब साइट पर यह उपलब्ध है। इस अद्भुत विरोधाभास का दस्तावेजी प्रमाण दें। यदि यह कोर्स राजस्थान के लिए उपलब्ध नहीं तो देश के किस कोने के खुशकिस्मत लोगों के लिए आपने यह सुविधा उपलब्ध करवा रखी है। यदि इसका जवाब दिल्ली है तो फिर क्यों न इसकी दूरस्थ शिक्षा की अवधारणा पर शक किया जाए? कृपया तर्कसंगत जवाब दस्तावेजी प्रमाणों के आधार पर दें।
  •    कम से कम कितने विद्यार्थी  होने पर आप एक कोर्स उस सत्र में करवाते है। आपको कैसे पता चलता है कि अमुक संख्या में विद्यार्थी उपलब्ध है? कोई नियम हो तो उसका प्रमाण दें।  
  •   आपकी फ़ोन लाइनों पर लोगों के फ़ोन को सुनना सुनिश्चित करने के लिए क्या कोई पॉलिसी या नियम बना हुआ है।
  •   क्या इस तरह का निरीक्षण किया जाता है कि फोन सुनने वाले अपने  उत्तरदायित्व का निर्वाह कर रहे हैं? कृपया दस्तावेजी प्रमाण दें।
  •   क्या रेस्पोंडेड व अनरेस्पोंडेड कॉल का ब्योरा रखा जाता है?

महोदय, मैं ये सभी सूचनाएँ सद्भावना पूर्वक मांग रहा हूँ, इस उम्मीद के साथ कि उपरोक्त संदर्भित कोर्स के प्रति पात्रता के बारे में जान सकूँ तथा इग्नू के सूचना सिस्टम के प्रति मेरे मन में जो विभ्रम पैदा हुआ है उसकी सफाई कर सकूँ।
धन्यवाद सहित
दलीप वैरागी



Sunday, May 3, 2015

कविता शिक्षण : एक अनुभव

यह सबसे कठिन समय नहीं है
यह उस पाठ का नाम है जो अगले दिन कक्षा आठ में पढ़ाया जाना था। मैंने शिक्षिका से कहा, “कल हम इसी पाठ पर मिल कर काम करेंगे।आठवीं कक्षा की हिन्दी की किताब साथ लेकर केजीबीवी से बाहर आ गया। अपने कमरे में आकर देर तक जया जादवानी की इस कविता के बारे में सोचता रहा। कविता की पहली लाइन कहती है नहीं, यह सबसे कठिन समय नहीं ...क्या सचमुच यह कठिन समय नहीं जबकि मेरा यह कविता शिक्षण का पहला मौका है। कहानियाँ सुनाई भी बहुत और सिखाई भी ... और कविता? सुनाने का अनुभव तो है लेकिन क्या सुनाना भर काफी रहेगा? इस समय को कठिन जान अब फिर कविता को देखता हूँ तो वह अब और भी कठिन जान पड़ती है। कविता को पढ़ जाता हूँ पूरा एक बार... दुबारा फिर पढ़ता हूँ तो मन में अर्थ तैरने लगते हैं और धीरे से भावनाओं की उंगली थामने लगते हैं। बावजूद इसके रह जाते हैं कुछ धुंधलके भी। जो अर्थ मैंने पकड़ा है क्या लड़कियों का भी वही अर्थ होगा। अर्थों का कुहासा अभी भी मेरे मन में है जो मुझे बर्दाश्त नहीं हो रहा, क्या लड़कियां भी उसे बर्दाश्त कर पाएँगी? जो मैं समझ रहा हूँ क्या वही कवयित्री का अभीष्ट है? खैर, कल देखा जाएगा। एक आश्वस्ति मन में थी कि पहली बॉल तो टीचर को ही डालनी है। शायद इसी आश्वस्ति की वजह से नींद भी आ गई।
यह सबसे कठिन समय नहीं है
नहीं, यह सबसे कठिन समय नहीं!
अभी भी दबा है चिड़िया की चोंच में तिनका
वह उड़ने की तैयारी में है !
अभी भी झरती हुई पत्ती
थामने को बैठा है हाथ एक
अभी भी भीड़ है स्टेशन पर
अभी भी एक रेलगाड़ी जाती है
गंतव्य तक
जहां कोई कर रहा होगा प्रतीक्षा
अभी भी कहता है कोई किसी को
जल्दी आ जाओ कि अब
सूरज डूबने का वक़्त हो गया
अभी कहा जाता है
उस कथा का आखिरी हिस्सा
जो बूढ़ी नानी सुना रही सदियों से
दुनिया के तमाम बच्चों को
अभी आती है एक बस
अन्तरिक्ष के पार की दुनिया से
लाएगी बचे हुए लोगों की खबर!
नहीं, यह सबसे कठिन समय है।
कविता जया जादवानी
कक्षा 8 (एनसीईआरटी)
इस बार दिल में बहुत चाह थी, केजीबीवी की उन लड़कियों के साथ काम करने की जिनके साथ उनकी कक्षा की द्क्षताओं पर कार्य किया जाना है। अभी तक उन लड़कियों के साथ ही काम किया जा रहा था जो अभी पढ़ने लिखने की बुनियादी दक्षताओं पर है। पिछले साल भर से हम बीकानेर के कस्तूरबा विद्यालयों के साथ कार्य कर रहे हैं। मन में कहीं उन लड़कियों के उपेक्षित रह जाने का मलाल रह जाता था जो पढ़ना लिखना सीख चुकी हैं और उनके साथ उच्चतर दक्षताओं पर काम किया जा सकता है।
बहरहाल हम अगले दिन केजीबीवी की आठवीं कक्षा में थे। लड़कियां फर्श पर चार कतारों में बैठी थीं। पहले एक फिर दूसरी, तीसरी व उसके पीछे चौथी कतार... इधर हमारे लिए दो कुर्सियाँ व दीवार के सहारे टेबल पर रखा हुआ ब्लैक बोर्ड था। मन में बैठक व्यवस्था को बदलने का ख्याल आया लेकिन अभी के लिए निकाल दिया। ज़रूरत पड़ने पर बदल देंगे। शिक्षिका ने शुरू किया, “आज हम पाठ – ये सबसे कठिन समय नहीं है पढ़ेंगे... पाठ का वाचन शुरू किया... अगले तीन मिनट में वाचन समाप्त हो गया। फिर टीचर ने अर्थ बताना शुरू किया, “इस कविता में कवयित्री ने यह संदेश दिया है कि...।अगले पाँच - सात मिनट में टीचर ने अपना अर्थ लड़कियों की तरफ उछाल दिया। सामने लड़कियां बैठी थीं एकदम चुप! खुली हुई आँखें, खुली हुई किताबें लगभग शून्य की ओर ...
मेरा मन दखल देने को हुआ। क्या यह महज एक पाठ है? जिसका वाचन हो और उसके बाद बच्चों के हाथ में एक व्याख्या टीचर द्वारा पकड़ा दी जाए। नहीं यह तो एक कविता है। इसका इस्तकबाल कविता की तरह ही होना चाहिए। इस्तकबाल तभी कर पाएंगे जब हम समझेंगे कि कोई कविता दरअसल चाहती क्या है?
कविता जब लिखी जाती है तो उसकी प्रत्येक लाइन के पीछे कवि का एक अटूट विश्वास होता है कि जब इसे कोई पढ़ेगा या सुनेगा तो उसके अपने मतलब भी निकलेंगे। चाहे पाठक कोई भी हो। और जब पाठक कोई 15 – 16 साल की किशोर उम्र का हो तो मतलबों में कल्पनाओं के और गाढ़े उजले रंगों की उम्मीद की जा सकती है। फिर जब हम किसी कक्षा में कविता के साथ पेश आते हैं तो क्यों कवि के उस भरोसे को तोड़ देते हैं। मुझे अब समझ में आ गया कि करना क्या है। जो भी हो मुझे कवि के भरोसे को अंत तक कायम रखना है कि अर्थ निर्माण की प्रक्रिया आखिर लड़कियों के स्तर पर ही होनी है। फिर हमारी क्या भूमिका है ? शायद हम माहौल कायम कर सकते हैं, स्वाधीनता, संवाद, परस्परता व सहयोग का।
मैंने लड़कियों से बात शुरू की
आपने कहानी व निबंध पढे हैं?”
हाँ
अच्छा ये बताओ कि इनमे व कविता में आपको क्या फर्क लगता है? ”
थोड़ी देर के लिए सन्नाटा रहा फिर एक लड़की ने बताया
कहानी सरल होती है। सुनते ही सीधे समझ आती है लेकिन कविता को समझने में दिमाग पर ज़ोर पड़ता है।
मुझे लगता है कि कविता में जो कठिनाई लड़कियों की है वह कहीं टीचर की व्याख्या व लड़कियों की खुद की समझ में टकराव तो नहीं। मैंने लड़कियों से कहा, “क्या आपने कबीर का यह दोहा सुन रखा है?”
माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंदे मोए।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूंगी तोए॥
सभी लड़कियों ने हाँ में जवाब दिया। मैंने कहा, “क्या इस दोहे का मतलब यही है कि मिट्टी कुम्हार से बातें कर रही है?”
नहीं सर, इसका मतलब यह नहीं बल्कि कुछ और है।
आपके अनुसार क्या मतलब है?”
इसमे कमजोर व्यक्ति यह कह रहा है कि उसका भी एक दिन वक़्त आएगा।
मैंने बात को पकड़ते हुए लड़कियों से कहा कि जिस प्रकार इस दोहे में लिखी हुई लाइनों के अलावा एक मतलब निकल रहा है वैसे ही जो कविता हम आज पढ़ने जा रहे हैं उसके भी अलग मतलब निकल सकते हैं जो हमें खुद को ही समझ आएंगे।
मैंने जया जदवानीकी इस कविता के शीर्षक को रखा
यह सबसे कठिन समय नहीं है
मुझे अचानक एक बात सूझी कि एक बार लड़कियों से बात करके यह तो पता किया जाए कि ये कठिन समय को किस रूप में समझती हैं? कठिन समय की क्या अवधारणा है? लड़कियों को थोड़ी देर आंखे बंद कर के बैठने के लिए कहा कि वे अपनी ज़िंदगी में किस वक़्त को बहुत मुश्किल समय मानती हैं? लड़कियों ने आँखें बंद की और दो तीन मिनट तक सोचती रहीं फिर आंखे खोल कर अपनी कॉपी में लिखना शुरू कर दिया। लिख लेने के बाद बारी थी सबके साथ शेयर करने की। लड़कियों ने बताना शुरू किया
कॉपी का काम पूरा नहीं है।
आँखें कमजोर है।
गणित की कॉपी गुम हो गई।
इस तरह से शुरुआत हुई। धीरे धीरे बात गहरी व गंभीर होती चली गई।
एक लड़की ने कहा, “मेरी दो बहने ससुराल चली गई हैं और मेरी भाभी बीमार रहती है। मेरी मम्मी को ही घर के सारे काम करने पड़ते हैं। मुझे लगता है यह बहुत कठिन समय है।
प्रियंका – “मुझे यह कविता थोड़ी सी कम समझ में आई, ये मेरा कठिन समय है।
सुनीता - कुछ दिन से मेरी तबीयत खराब है। मैं बहुत कठिन समय महसूस कर रही हूँ।
भाग्यश्री – “मेरी नज़र कमजोर है। मुझे कम दिखाई देता है। मेरे लिए यह बहुत कठिन समय है।
जैसे ही हस्तु बोलने के लिए खड़ी हुई उसने बोलते ही माहौल को गमगीन कर दिया, “मेरा एक बीस वर्ष का भाई था जिसकी कुछ समय पहले मौत हो गई। यह मेरे लिए बहुत ही कठिन समय है।यह कहते ही हस्तु रोने लग गई। उसके रोने का असर यह हुआ कि उसके आसपास की चार पाँच लड़कियां भी उसके साथ रोने लग गईं। जो नहीं रो रही थीं वो उन्हे चुप कराने में लग गईं। 5-7 मिनट तक यूँ ही गमगीन माहौल बना रहा।
लड़कियों को रुलाना बिलकुल उद्देश्य नहीं था। फिर भी इस गतिविधि से दो महत्वपूर्ण बाते हुईं। पहली यह कि इससे हम व शिक्षिका लड़कियों की वास्तविकता से परिचित हो रहे थे। दूसरा यह हुआ कि आगे जिस कविता पर काम किया जाना है उसकी भावभूमि तैयार लग रही थी। बिना देरी किए फिर से कविता का वाचन किया। वाचन के बाद मतलब पर बात नहीं की गई। इसे यह सोच कर छोड़ दिया कि अर्थ निर्माण का काम लड़कियों के स्तर पे हो। कविता के वाचन के पश्चात लड़कियों के चार समूह बनाकर कविता को पढ़ने व उस पर चर्चा करने को कहा गया। प्रत्येक समूह में एक एक सवाल भी दिया गया।
समूहों के काम के प्रस्तुतीकरण की बानगी इस प्रकार है -
समूह 1 – यह कठिन समय नहीं है यह बताने के लिए कविता में कौन- कौनसे तर्क प्रस्तुत किए गए हैं?
लड़कियों के उत्तर इस प्रकार थे
यह कठिन समय नहीं है यह बताने के लिए कविता में निम्नलिखित तर्क दिये हैं-
1. चिड़िया अपनी चोंच में तिनका दबाए उड़ने को तैयार है। क्योंकि वह नीड़ का निर्माण करना चाहती है।
2. डाली से गिरती पत्ती को थामने के लिए एक हाथ तैयार है जो उसे सहारा देना चाहता है।
3. एक रेलगाड़ी अब भी गंतव्य अर्थात पहुँचने के स्थान तक जाती है
4. अभी भी घर पर कोई किसी की प्रतीक्षा कर रहा है।
5. अभी भी नानी की कहानी का अंतिम महत्वपूर्ण हिस्सा बाकी है।
6. अभी भी एक बस अन्तरिक्ष के पार की दुनिया में जाने वाले लोगों में से बचे हुए लोगों की खबर लेकर आएगी।
इन सभी तर्कों से कवयित्री जया जादवानी यही कहना चाहती है कि अभी कठिन समय है लेकिन सबसे कठिन समय नहीं है, आगे पढ़ो और बढ़ो।
हो सकता है लड़कियां इन तर्कों को धारदार तरीके से न रख पा रही हों लेकिन इतना पक्का है कि वे कविता को पढ़ कर समझने की जद्दोजहद में लगी हैं।
समूह 2 – चिड़िया चोंच मे तिनका दबाकर उड़ने की तैयारी में क्यों है? वह तिनकों का क्या करती होगी?
यह सवाल जरूरत से ज्यादा साधारण है लेकिन लड़कियों ने जिस तरह से इसका जवाब रखा उस से यही समझ आता है कि लड़कियों ने कविता को समझा जरूर है।
लड़कियों का जवाब इस तरह से था
चिड़िया चोंच में तिनका दबाकर पेड़ व घरों तक ले जाती है और अपना घोंसला बनाती है। उसका घोंसला हवा व बरसात के साथ बह जाता है। वह फिर से तिनके तिनके लाकर बना लेती है। यह कठिन समय नहीं है कवयित्री हमें यह संदेश देती है कि हारना नहीं चाहिए, संघर्ष करना चाहिए।
समूह 3 - कविता में कई बार अभी भी का प्रयोग करके बात की गई है। अभी भी का प्रयोग करते हुए तीन वाक्य बनाइये और देखिए उसमे लगातार, निरंतर, बिना रुके चलनेवाले किसी कार्य का भाव निकलता है या नहीं ?
1. हमारे विद्यालय में सर अभी भी हैं।
2. अभी भी कक्षा आठ को सर हिन्दी के शब्द सिखा रहे हैं।
3. हम अभी भी कविता के बारे में लिख रहे हैं
इसमें प्रक्रिया यह रखी थी कि लड़कियों ने जो वाक्य बनाए उनमे कुछ अनगढ़ता थी। शिक्षिका लड़कियों के बोलने के बाद वाक्यों को ठीक करवाकर बोर्ड पर लिख देती।
समूह 4 – नहीं  अभी नहीं” को एक साथ करके तीन वाक्य लिखिए और देखिए इनके पीछे क्या भाव छुपे हैं?
लड़कियों की प्रतिक्रियाएँ इस प्रकार थीं
1. मेरी मम्मी कह रही है कि तुझे पढ़ाई छोड़नी है। नहीं, मुझे अभी पढ़ाई नहीं छोड़नी है।
2. मेरे पापा जी कह रहे हैं कि मुझे खेत का काम करना है। नहीं, मुझे अभी खेत का काम नहीं करना है।
3. मेरी बहन कह रही है कि देखो टीवी में कितनी अच्छी फिल्म चल रही है। नहीं, मुझे अभी फिल्म नहीं देखनी है।
इस सवाल में रोचक बात यह रही कि लड़कियों को नहींअभी भीके साथ वाक्य बनाने थे लेकिन वे इतनी जल्दबाज़ी में थी कि अभी भीकी जगह अभी नहींका प्रयोग कर गईं।
कविता पर काम करते हुए यह समझ आया कि इस कार्यवाही में ज़्यादातर समय लड़कियां ही सक्रिय दिखाई दे रही थी। टीचर की व्यस्तता इतनी ही थी कि जहां उसे लगता था कि यहाँ दखल की जरूरत है वहीं दखल दिया ।
अब लड़कियों को होम वर्क देने का वक़्त था। होम वर्क स्कूली व्यवस्था का जरूरी हिस्सा है। हम सोच रहे थे कि यह किस तरह का हो? लड़कियां कविता के अर्थ की और गहरी परतों को समझें, कविता की समझ को पाठ से आगे ले जाकर कल्पनाशीलता का प्रयोग करते हुए कुछ नया सृजन करें इस हेतु लड़कियों को समूह में ही काम दिया गया। यह काम उन्हें आवासीय समय में करना था। इस बार नए सिरे से चार समूह बनाए गए। तीन समूह ऐसे थे जिनमें ऐसी लड़कियां थी जो अच्छे से लिख सकती थीं। इन लड़कियों को कहा गया कि आप घर के बड़ों द्वारा सुनाई, पढ़ी हुई या स्वरचित कहानी लिखें जिसमें कवयित्री द्वारा दिया हुआ संदेश हो। एक समूह को कहा गया कि इस कविता में कहीं आया है, “अभी भी आती है एक बस अन्तरिक्ष की पार की दुनिया सेकल्पना से चित्र बनाइये कि वह बस कैसी दिखती होगी?
कहानी 1
दामोलाई नामक गाँव में एक लड़की रहती थी। वह बहुत सुंदर थी व उसके लंबे - लंबे बाल थे। वह पढ़ना चाहती थी लेकिन उसके मम्मी पापा उसको पढ़ाना नहीं चाहते थे। वह पाँच भाई- बहन थे। उसके चारों भाई स्कूल जाते थे। वह अपने मम्मी पापा से रोज कहती कि मुझे स्कूल भेज दो लेकिन उसके मम्मी पापा नहीं माने। लड़की के चारों भाई उसे स्कूल ले जाना चाहते थे, उन्होने भी अपने मम्मी पापा को खूब समझाया लेकिन वे नहीं माने। उन्होने सारी बात अपनी टीचर को बताई। टीचर ने उसे सलाह दी हम तुम्हारी बहन का दाखिला करा लेंगे तुम अपनी बहन को घर पर ही पढ़ा लेना। पेपर के वक़्त यहाँ ले आना। उसके भाइयों ने यह बात मान ली। उन्होने यह खुशखबरी अपनी बहन को बताई। इससे वह बहुत खुश हुई। उसने घर पर बहुत पढ़ाई की और सहेली के घर जाने के बहाने से पेपर दिये। वह अपनी कक्षा में प्रथम स्थान पर आई। टीचरों ने खुश होकर पार्टी की तो वहाँ पर मुख्यमंत्री ने उस लड़की को इनाम में लैपटाप दिया। उसके मम्मी पापा ने मिलकर अपने बच्चों को आशीर्वाद दिया।
कहानी 2
एक बार शूरसेन नाम का एक राजा था। उसके तीन बेटियाँ थी। उनका नाम चारुलता, चंद्रलता और स्वर्णलता था। एक बार तीनों बहने जंगल में घूमने निकलीं तभी अचानक तूफान आ गया। तीनों बहने जंगल में भटक गई। हिम्मत से आगे बढ़ीं उनको सामने एक महल दिखाई दिया। वे उस महल में चली गईं। तीनों ने रात उसी महल में बिताई। सुबह तीनों बाग में घूमने चली गईं। चारुलता ने उस बाग से एक फूल तोड़ लिया। फूल तोड़ते ही एक राक्षस प्रकट हुआ। राक्षस ने कहा, “मैं तीनों को मार डालूँगा तुमने मेरा फूल तोड़कर अच्छा नहीं किया।चारु राक्षस से माफी मांगने लगी लेकिन राक्षस नहीं माना। राक्षस ने कहा तुम्हें मेरी एक शर्त माननी होगी। राक्षस ने कहा तुमको यहीं रुकना होगा। चारु मान गई और दोनों बहनों को वापस भेज दिया। कई दिन बीतने पर चारु एक दिन पिता की याद में रोने लगी। राक्षस को दया आ गई। चारुलता को पिता के पास वापस भेज दिया। वह अपने पिता के पास प्रसन्न होकर रहने लगी। एक दिन चारुलता को सपना आया कि राक्षस बहुत बीमार है। चारु ने पिता से कहा कि मुझे राक्षस के पास छोड़ दो। उसके पिताजी मान गए। चारु राक्षस के पास गई और चारु ने देखा राक्षस वास्तव में बीमार है। चारु ने कहा उठो मैं आपको बहुत चाहती हूँ और आपके साथ शादी करना चाहती हूँ। इतना कहते ही राक्षस एक राजकुमार बन गया। राजकुमार ने कहा कि मैं भी एक दिन जंगल में भटक गया था। मैंने एक जादूगरनी का कहना नहीं माना तो उसने मुझे शाप दे दिया कि तुम्हें जब भी चाहने वाली लड़की मिलेगी तभी तुम असली रूप में आओगे। चारु उस राजकुमार को अपने राज्य में ले गई। चारु के पिताजी ने दोनों की शादी कर दी। वे दोनों सुखपूर्वक रहने लगे।
थैंक यू , गमले में मिट्टी हो तो साफ करना, लिखने में गलती हो तो माफ करना।
कहानी 3
एक बार मीना नाम की लड़की थी। उसके माता पिता उसको पढ़ना नहीं चाहते थे। वह जंगल से लकड़ियों का गट्ठर लेकर आती तो बीच में स्कूल पड़ता था। वह लकड़ियों का गट्ठर रखकर स्कूल चली गई। उसने देखा बहन जी कक्षा में पढ़ा रही थी। वह खड़ी होकर सुनने लगी। बहन जी दो का पहाड़ा सुना रही थी। दो एकम दो, दो दूनी चार, दो तिया छ: । मीना और मिट्ठू ने ध्यान से सुना। पहाड़ा खत्म होने पर जल्दी जल्दी घर के लिए रवाना हो गए। घर जाने पर वह हर चीज़ को गिनती रहती। वह अपने पापा से पढ़ाने को कहती तो उसकी मम्मी पहले ही कह देती कि लड़कियां पढ़ती नहीं हैं, घर का काम करती हैं। एक दिन वह मिट्ठू से बोली कि तुम पहले स्कूल जाओगे बाद में मुझे पढ़ाओगे। मिट्ठू स्कूल गया। वह पढ़ कर मीना को सिखाता। एक दिन मीना पढ़ रही थी तभी एक चोर दबे पाँव आया और एक मुर्गी को लेकर भाग गया। मीना ने मुर्गियों को गिना तो एक मुर्गी नहीं मिली। उसने नज़र इधर उधर दौड़ाई तभी उसने आदमी को देखा। उसने शोर मचाया। गाँव के लोग इकट्ठा हो गए। उस चोर को पकड़ कर खूब धुनाई की। सभी गाँव वालों ने मीना के पापा से कहा कि आपकी बेटी बहुत होशियार है, आप उसे पढ़ाते हैं? तभी उसके पापा ने पूछा कि किससे सीखा? उसने कहा मिट्ठू से। अब वह भी स्कूल जाने लगी।

लड़कियों ने जो कहानियाँ लिखी हैं और जो जो चित्र बनाए हैं वह अभी एक शुरुआत है जो लेखन की उस जड़ता को तोड़ती है जिसे हमने एक दिन पहले लड़कियों की कॉपी में देखा था। जब हम लड़कियों की कॉपी देख रहे थे तो एक बात सामने आई कि सभी लड़कियों के कॉपी में लिखे जवाब अक्षरश: एक जैसे थे। गणित, विज्ञान, सामाजिक या भाषा विषय कोई भी हो कोई फर्क नहीं पड़ता। जब सबके जवाब ऐसे हूबहू ही होने हैं तो फिर जाँचने व न जाँचने में क्या फर्क पड़ता है। ऐसा इसलिए हो रहा था क्योंकि सभी लड़कियां जवाब पास बुक्स में से कॉपी करके लिख रहीं थी या फिर टीचर द्वारा जवाब बोर्ड पर लिख दिये जाते थे जिन्हें लड़कियां अपनी कॉपी में उतार लेती थीं। पूरी प्रक्रिया में लड़कियों की मौलिक उद्भावनाओं के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। आज लड़कियों के साथ जो काम हुआ उससे चाहे शुरुआत ही हुई लेकिन लड़कियों की मौलिक सोच को स्थान मिला है। भले ही आखिर की दो कहानियाँ उन्होने खुद नहीं रची हैं लेकिन उनके प्रस्तुतीकरण का सोच मौलिक है इससे उनमे एक भरोसे की भी उम्मीद जागी है कि वे खुद सोच सकती हैं, कर सकती हैं।


Wednesday, April 29, 2015

सुलभ संगीत कितना सुगम ?


 ट्रेन के सेकंड क्लास डब्बे में बैठा हूँ। पूरे कम्पार्टमेंट में हर तीसरे व्यक्ति ने कानों में हैडफोन लगा रखा है। बगल में बैठी युवती ने हैडफोन के साथ-साथ एक हल्की सी मुस्कुराहट को भी मेंटेन कर रखा है। एक सामने बैठे नवयुवक की उँगलियाँ स्क्रीन पर  ऐसे चल रही हैं जैसे किसी मजदूर की बलिष्ठ पैरों की पिंडलियाँ गारा तैयार करते हुए तेज़ी से चलती हैं। उसके चेहरे पर भाव आ जा रहे हैं। ऊपर की बर्थ पर अधलेटे अधेड़ भी हैडफोन लगाकर कुछ सुन रहा है। अचनाक उसके मुह से निकलता है, “वाह! क्या बात है...”
ट्रेन का डब्बा, बस, रेलवे स्टेशन या कहीं और हम एक दृश्य के गवाह ज़रूर बनते हैं। कानों में हैडफ़ोन लगाकर कोई कोई न कोई  बैठे हुए संगीत सुनने में मग्न ( ? ) हैं। अचानक उनमें कोई झूम उठता है या या अधिक तरन्नुन में आकर "वाह ! क्या बात है" कह कर दाद दे बैठता है। पास में बैठा हुआ व्यक्ति इस आनंद से बिलकुल निर्लिप्त रहता है। कैसी विडम्बना है कि कोई संगीत के झरने में नहा रहा है और पड़ौसी पर कोई बूँद नहीं गिरती है। यहाँ मेरी चिंता पड़ौसी की संगीत से वंचितता की नहीं बल्कि सुनने वाले की बेचारगी की है। पास खड़ा व्यक्ति उसकी वाह कि ध्वनि से इतना भी अंदाज़ा नहीं लगा पता कि यह दाद 'मुन्नी की बदनानामी', 'शीला की जवानी' को मिली है या भीमसेन या पंडित जसराज की क्लासिलकल गिरारियों को समर्पित है। आमतौर पर यह श्रीमान यो-यो की 'गीत वाचन' शैली के इस्तकबाल में होती है।
जो लोग सत्तर - अस्सी के दशक में या उससे पहले पैदा हुए उन्हें यह दृश्य जरूर फ्लैश बैक में ले जाता होगा जब संगीत का आनंद लेने के लिए इकलौता साधन रेडियो हुआ करता था। कुछ मायनों में मोहल्ले भर का इकलौता। यूँ तो प्रायः हर घर में रेडियो होता ही था। लेकिन बजता एक ही था। जब पड़ौसी के रेडियों से स्वर लहरी मद्धिम सी सुनाई पड़ती और हम अपना रेडियो सेट ओन करने की कोशिश करते तो माँ कहती, "क्यों फालतू में सेल फूंकते हो आवाज़ आ तो रही है।" बात में दम भी होता था। यदि यहाँ भी बजता तो वही रेडियो स्टेशन ही। दूसरी जगह खबरें और वार्ताएं सुनने में तब मन कहाँ लगता था।
एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि रेडियों के संगीत या मनोरंजन ने व्यक्ति की कार्यकुशलता व उत्पादकता को कभी कम नहीं किया। छुट्टियां लेकर या ऑफिस से गोता मारकर वर्ल्ड कप के क्रिकेट मैच देखने की कामचोर व निठल्लेपन की संस्कृति बहुत पुरानी नहीं है। यह टेलीविजन की देन है। जिसमें दृश्य तो हैं लेकिन 'विज़न' सिरे से गायब है। रेडियो में स्वर कान के रास्ते जरूर आते हैं लेकिन दृश्य आँखों के सामने नहीं बल्कि पीछे मन में बनते हैं बिलकुल आजकल की ऐचडी व थ्री डी तकनीक से भी गहरे, उजले, रंगीन व स्पष्ट। इस लेख का उद्देश्य आधुनिक तकनीक मोबाईल या टेलीविजन को कमतर बताना बिलकुल नहीं। इनकी ज़बरदस्त मज़बूतियाँ है। मैं चाहता हूँ कि कोई इनके बारे में भी लिखे।
एक बात पक्की है कि जब भी किसी नौजवान को हैडफ़ोन लगाकर भीड़ में भी अकेलापन खोजते देखता हूँ तो गांव का वह दृश्य जरूर आँखों के सामने जीवित हो जाता है। सर्दी का मौसम है। खेत में गेहूं की फसल की सिचाई हो रही है। हरी-हरी पत्तियों की नोक से चू कर पिंडलियों को स्पर्श करती सर्द ओस की बूँदें सुन्न करने का अहसास करवाती थीं। पृष्ठभूमि में ट्यूबवैल के इंजन का खटर-पटर का नाद होता था। क्यारी की मेड पर रखा रेडियो अचानक बोल उठता, " ये आकाशवाणी है और अब सुनिए आपकी फरमाइश के गाने..." और इस आवाज के सुनाई देने के बाद नुकीली पत्तियों की सरसराहट, ओस की बूंदों सर्द चुभन व इंजन की खड़खड़ाहट पृष्ठभूमि में विलीन हो जाती। बस ध्यान में एक ही स्वर रह जाता, " ...अब सुनिए मोहम्मद रफ़ी की आवाज में यह गाना, जिसे सुनने के लिए फरमाइश की है..." इतने में ही पास के खेत में से किसी दूसरे किसान का स्वर उभरता, " भई... रेडिया की आवाज ऊँची कर... मेरा लड़का भी रेडियो में चिट्ठी लिखता है। ज़रा सुने तो क्या फरमाइश की है..." यहीं से यह वैयक्तिक गतिविधि अनायास ही संगीत के आनंद व उसकी अभिव्यक्ति का  सामूहिक आयोजन बन जाती। आमतौर से बजने वाले गाने अनायास महत्वपूर्ण बन जाते। उनसे तादात्म्य स्थापित हो जाता। स्मृतियों में अमिट इबारत बन जाते। कला के आनंद की अनुभूति व्यक्ति के मन में स्थित भले ही हो लेकिन उसकी अभिव्यक्ति में एक सामाजिक साझा अनिवार्य होता है। न केवल साथ सुनना व गाना बल्कि एप्रिसिएशन में भी एक तरह से सामाजिक सौंदर्यबोध से संगति की दरकार रहती है। अगर ऐसा नहीं होता तो ये कहावत अस्तित्व में नहीं आती कि रोम जल रहा था और नीरो बांसुरी बजा रहा था। निसंदेह कहावत का सन्दर्भ अलग हो।
आज मोबाईल ने संगीत को बहुत सुलभ बना दिया है लेकिन सुगम नहीं। रिवर्स, फॉरवर्ड और पॉज बटन ने गीतों के प्राण निकल दिए हैं। गीत, संगीत, शब्दों व भावों की एक इकाई होते हैं। सुनने वाले के लिए एक पैकेज, लेकिन इन तीन बटनों ने इसे तहस नहस किया है। सुलभ संगीत सुगम नहीं हो पाया इसका यही प्रमाण है - संगीत के उस्ताद कहते रहे हैं कि अगर सुर पकड़ना है तो जितना हो सके उतना अच्छा संगीत सुनो। यहाँ हाल यह है कि हर तीसरे व्यक्ति के कानों में हैडफ़ोन की तार ठुंसी हुई है, ज्यादातर समय, लेकिन सुरीलों की संख्या में कोई उल्लेखनीय इज़ाफ़ा नहीं हुआ है। अगर मैं कहूँगा कि कमी हुई है तो अतिशयोक्ति हो सकती है। इसलिए मैं इस विवाद की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता। ये तो संगीत के उस्ताद बताएँ तो बेहतर है।
मुझे लगता है, इसका एक कारण है, गाना सीखने के लिए सुनने के साथ गुनगुनाना भी जरुरी होता है। मैं ऐसे कितनों को जनता हूँ जो रेडियो के साथ गुनगुना कर गायक बन गए। लेकिन ये जो यत्र-तंत्र हैडफ़ोन संस्कृति है, यह हमें साथ गाने की छूट नहीं देती। ऐसा क्यों? इसका कारण है। जब हैडफ़ोन लगाकर हमारे द्वारा दी हुई दाद हास्यास्पद लग सकती है तो  गायकी पास वाले के लिए कम मारक साबित नहीं होगी। रेडियो व् दूसरे माध्यमों के साथ गुनगुनाने में आपको छूट मिल जाती है। ओरिजनल गाने के संगीत की चासनी में लिपटी आपकी अप्रशिक्षित आवाज श्रोता के लिए काबिले बर्दाश्त हो जाती है, जो आपको भी होंसला देती है। लेकिन हैडफ़ोन लगाकर हम अपना ही सुर दागते हैं असली सुर तो तारों की जकदबंदी में फंस कर हमारे पास ही रह जाता है।  पड़ौसी के पास क्या जाता है अंदाज़ा लगाएं...  हैडफोन वाला संगीत-श्रवण एक पल को आनंद तो दे जाता है लेकिन गुनगुनाने का होंसला नहीं।
यह लेख अनुभव पर आधारित है। शास्त्र पढ़े हुए दोस्त माफ करेंगे व मार्गदर्शन भी।


Wednesday, April 22, 2015

Learning togather

An experience of teaching Science in KGBV Taswaria

January 15-16, 2015 
This was my first attempt at teaching science. It was a very hard decision for me because I have not received higher education in science. In fact I am a science drop out. Almost all the KGBV (Kasturba Gandhi Balika Vidyalay) teachers are facing the same situation. The teacher who is teaching science in KGBV Taswaria is not a trained science teacher.  All the teachers in this KGBV come from arts background. After all, if these teachers can teach science then why can’t I? This encouraged me. 
The girls wanted help on the topic of ‘Cell’ which is part of their curriculum. I accepted to take up this topic in the classroom. I saw the text book. There was some basic information about the Cell. I could transact this information to the girls easily. But it did not energize me. I refused to be just a pipeline between the subject and the students. I was seeking to know more around the topic which would give me conceptual understanding and clarity.
I accessed some knowledge from the existing materials in the office library and the Internet. The Cell was the entry point of my journey. Through this, suddenly I felt that I was pushed into an ocean of micro organisms where I saw the microbes come near each other and become the essential part of life which we see around us. Friendship and encounter with ‘bacteria’ and ‘cell’ changed the structure of cells. The Cells were getting shapes, and these cells were constructing our body. This journey taught me a lesson that co-existence was the core of the beginning of life on the earth. Why then today there is a big problem of co-existence in the world?
A new research reveals that bacteria are in the process of becoming Organelles.   This process has taken millions of years. From single-cell organism to unicellular organism, this journey of evolution was a fascinating story for me. Suddenly I remembered Giju Bhai. He taught all the subjects through stories. I thought that if I put this history of cell evolution in front of the girls, in the form of a story, they would be fascinated.
I eagerly reached the KGBV. The Teachers were equipped with all the materials which were required. There were three Microscopes. Two microscopes were recently provided by Save the Children and one was older. The teachers, girls of class 8th and I came to the courtyard. There was enough sunshine which was helpful to work with the microscope and to relieve us from cold. We put the microscopes on a table in the centre of the courtyard and got some readymade slides from the science kit. We tried to set the slides into the microscopes but we failed several times. But we didn’t stop making efforts. We cleaned the lenses. There was no change. What could be done... finally we exchanged the lens of microscopes and adjusted them. Suddenly someone shouted, “I can see, there is something appearing” It was a slide of a Red Blood Cell. One by one all the slides began to be seen in the microscope- Animal cell, plant cell unicellular, multi cellular, Amoeba, hydra and bacteria. The girls could see with the magical expansion of a million times. Rows of girls began to come behind the microscopes waiting for their turn. They had to draw whatever they had seen. So they observed every slide carefully and tried to see again and again. For the first time they saw such vivid and colourful images which they had never seen before with their naked eyes. It is noteworthy that all of us, that is the teachers, students and I, had touched the microscope for the first time. We were happy because we had succeeded.

After observation we assembled again to discuss. There was no need to disclose the subject. Girls had already heard about the Cell. I directly asked the girls, “What is a cell?” girls replied, “Kisi Jeev Ki Sukshmtam Jeevit Sanrachna ko Koshika Kahte Hain.” By this response of the girls I came to understand what was needed to be done. This answer came from the textbook and had been memorized without comprehension. The challenge for me was –
·     How would the girls understand the subject going beyond the text book?
·      would they be able to relate their existing knowledge on this topic and build upon it within their own context 
·     What could be the process of building a scientific temperament?
·     Finally how can they link the issue with the other branches of knowledge like History, Literature, language and arts?      
After a little discussion I narrated the story of human evolution and the development of the theory of the Cell. I told the girls how life evolved on the earth. It took millions of years. In the beginning, life was in the unicellular form; gradually it converted to multi cellular. It also took millions of years. Simultaneously we talked about development of microscope – how it developed from single lens to light based microscope to electronic microscope. We are able to see the hidden organelle in cytoplasm with the help of the electronic microscope.
After storytelling the girls were given the task to search more about the subject in a scientific manner. Three groups were made. Girls had to do their work as follows –
·     How did the theory of the Cell evolve?
·     What are the functions of a cell?
·     How have humans benefited by the discovery of the cell?
The girls had to present their work the next day. They could access knowledge from library books, text books, internet, and take help from the warden and teachers. We had kept a condition that the presentation shouldn’t be in prose only, it should be imaginary and in an artistic manner. It could be in whatever form they wanted.
I had to leave the school premise by 5 pm as male teachers cannot stay in the school in the evening.  
Next day as I entered the KGBV I saw the girls doing their work. Yesterday’s group work extended to the mini groups and individuals. Girls were working individually and after finishing they discussed in their group; then they went to the teacher for suggestions. Books were spread all over the floor in the classroom. Girls were bent over these books with curious eyes.
One group of girls was working as an editor board. They were compiling the project work with the help of the warden.  They had determined the order of the content. After compilation the girls showed the Project. It seemed aesthetically pleasant. Its cover was also very beautiful. They put the title on it and drew a picture of a plant cell in the background as a water mark.
The story inside was articulated differently. They used several literary forms to express their thoughts.

Comics :   

As we flip the first page we can see the girls opened the issue with comic characters. Through this comic strip, two girls were talking about their mother’s illness. In the conclusion they tried to convey that all kind of illnesses happen due to some mishappening in the cells. They also ended the project in comic book style. There were two sheep conversing with each other. One of them was ‘Dolly’ which was cloned in a laboratory with genetic modification. In the comic Dolly invited another lamb on her birthday. The girls told the entire story of Dolly’s life.      

 Poem :     

Girls created 4-5 poems related to the issue. Their manifestation was so effective. Have a look –
Koshika ka hua kamal
Charon aur kar diya dhamal
Robert huck ne kiya anokha kaam
Hua vigyan ka vishv me naam...
Koshikaen jab hoti hamse naraz
Chhodna padta hamko sukh-saaz...
********
Koshika hai paadap me
Koshika hai jantu mein...
Koshika ke teen ghatak
Kaam karte vah jhatak ....
Koshika hai apne sath
Har bimari mei uska haath
Koshika ka jab hue dimaag kharaab
Kar dete hamko bhi kharaab.....
Sabse badi koshika shaturmurg ka anda
Shareer mein yadi shanti ho to
Koshika ka dimag rahta hai thanda....

 Conversation :   

Comparing and contrasting are critical science skills. Usually in every chapter of science, there is an exercise for these skills. An exercise was also given in this lesson.
Comparison of Plant Cell and Animal Cell

Exercise which is given in the text book

S.No.
Part
Plant Cell
Animal Cell
1.    
Cell membrane
Present
Present
2.    
Cell wall
Present
Absent
3.    
Nucleus


4.    
Nuclear membrane


5.    
Cytoplasm


6.    
Plastids


7.    
Vacuole


The girls did this exercise in the form of a conversation -

Plant Cell : I’ve both, a ‘Cell membrane’ and a ‘Cell’ wall, what do you have?
Animal Cell : I also have a cell membrane. But what does your cell wall do?
Plant Cell : My cell wall protects my cell membrane.
Animal Cell : Good!
Plant Cell : I have a vacuole, do you also have it?
Animal Cell : I also have vacuoles.
Plant Cell : your vacuoles are so small but I’ve got a big one. I also have   chloroplasts.
Animal Cell : I don’t need it. Please tell me, what is the function of your chloroplasts?
Plant Cell : They provide green colour to the leaves. Chlorophyll in the chloroplasts of leaves is essential for photosynthesis.


We can see the difference between the two. Girls made that exercise alive using their imagination. This will help them to build sustainable knowledge in the future. 

Drawing and painting: 

Girls made lots of drawings. Images related to science are very hard to draw. But the girls made them very colourful. These pictures seemed closer to reality. Girls enjoyed the exercise of drawing and painting.    

 Cartoons and caricatures : 

They made many cartoons and caricatures to make their project attractive and learning joyful. They made cartoons of the teacher and girls showing them observing the slides in the microscope.   
Along with all these things they designed a crossword puzzle which was based on this topic. 
During the whole process, the teachers and I felt confident in teaching science even though none of us were actually trained to teach this subject. This made us realise that anybody can teach anything provided one has the will. Girls enjoyed learning because they got a free hand to try different innovative techniques. This whole demonstration was an example of learning together- of girls and facilitators. We taught only the chapter of the cell but girls touched other lessons which were prescribed in their text book- Micro Organism and reproduction. They had also broken the walls of just sticking to the subject of Science, and touched other subjects like Language and Social Science. Overall this demonstration excited the teachers as well as those wish to try this technique in teaching other subjects too.

                         & 



Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...