Friday, June 26, 2015

भारतीय रेल का जनरल डिब्बा

ऐसी कौनसी जगह है जहाँ से पूरा हिंदुस्तान दिखाई देता है? मैं इसके जवाब में कहूँगा भारतीय रेल में पूरा हिंदुस्तान नज़र आता है। बक़ौल गुलज़ार साहब के, "एक हिंदुस्तान में दो-दो हिंदुस्तान नज़र आते हैं।" ऐसी ही नज़र हमें भी एक दिन मिली जब रिजर्वेशन के डब्बे से टीटीई ने हमें अनारक्षित टिकट के साथ पाया। हमेशा की तरह हमने भी जुगाड़ लगाने की कोशिश की। पता नहीं टीटीई जुगाड़ी नहीं था या हम अभी तक अनाड़ी थे। हमें जनरल बोगी का  रास्ता दिखा दिया गया। कसम से ऐसा महसूस हुआ जैसे बहिश्त से हमारी बेदखली हुई हो।
हम जनरल बोगी के सामने खड़े थे। बाहर से ही अंदर का दृश्य देख कर हमने यात्रा रद्द करने या फिर जीप-जोंगा या बस का विकल्प देखने का मन बना लिया। फिर भी हम दरवाज़े के आगे देख रहे थे जनरल डिब्बा किसी अनाज की बोरी जैसा लग रहा था। अब यदि इसमें सेर भर और डाला तो बोरी छलकेगी या फट जाएगी। लेकिन हम इस बात को लेकर भी दंग रह गए कि प्लेटफॉर्म पर मौज़ूद आधी से ज्यादा आबादी इसी डिब्बे की और लपक रही थी। डिब्बा हमें किसी ब्लैक होल सा नज़र आया। भीड़ की तत्परता में यह पूरा यकीन झलक रहा था कि इस डब्बे में अनंत जगह है। या फिर यह फंतासी है कि अंदर कोई है जो बेतरतीब बैठे लोगों इस्तरी करके तह लगता जाएगा और सब के लिए जगह बन जाएगी।
यात्रा कैंसिल करने का मन बनाने बावजूद निर्णय हमारे हाथ से निकल चुका था। हम ऐसी जगह खड़े थे जहाँ से वापस लौटना संभव न था। मुख्य धारा का बहाव डिब्बे के द्वार की ओर था। मुख्य धारा के वेग ने एक ही झटके से हमें उठाकर अंदर धर दिया। इस अद्भुत लिफ्ट का लुत्फ़ हमने पहली बार उठाया। और हमें पहली बार अपनी वंचितता का अहसास हुआ। आरक्षित डिब्बों में इस तकनीक से सदा महरूम रहे। हमेशा यह सोचते रहे कि बीमार, विकलांग व वृद्ध लोगों के लिए रैम्प होने चाहिए या व्हील चेयर का इंतज़ाम होना चाहिए। आज यह ज्ञान हुआ कि सुविधाएं दिमाग को बंद करती हैं और आभाव अविष्कारों के जनक हैं। जनरल बोगी में लोगों के दाखिल होने के लिए यह कन्वेयर बैल्ट जैसी सुविधा प्रारम्भ से ही विद्यमान है। एक बार फिर भारत के प्राचीन ज्ञान पर गर्व हो आया। जय हो विश्व गुरु की!
लिहाज़ा अंदर आना हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं था लेकिन अंदर पैर टिकाने का फैसला हमे खुद करना था। अंदर हमारा पहला कदम रखना बिलकुल वैसे ही अनिश्चित था जैसा किशोरावस्था की मुहोब्बत में रखा पहला कदम। जैसे ही हमने गैलरी में पहला कदम रखना चाहा तो लय के साथ चलते हुए खर्राटे अचानक रुक गए,उनका स्थान एक गुर्राहट ने ले लिया और हमने अपना बढ़ाया हुआ कदम वापस ले लिया। गुर्राहट अब फिर सुर बदल कर खर्राटों में तब्दील हो गई। गैलरी में सोये व्यक्ति ने पहले की बनिस्पत अपने आयतन-क्षेत्रफल को विस्तार देते हुए खुद को गैलरी में और फैला दिया। एक पांव पर खड़े होकर हठयोग ठानने का इरादा हमारा नहीं था। हालांकि अगले ही दिन विश्व योग दिवस था। और हमारे इनबॉक्स में सरकार की तरफ से भेजे संदेशों की पूरी शृंखला थी, जिसमे 21 जून को योग करने सन्देश थे। हमने सरकार के दोहरे रवैये के बारे में भी एक पल सोचा कि सरकार योग करने की परिस्थितियां तो आज और यहीं पैदा कर रही है और योग कल करने को कह रही है। हमने सरकार की बात को अक्षरशः माना। योग को कल के लिए मुल्तवी किया। इसलिए हमने अपने पैर को अलग दिशा में रखना चाहा। जैसे ही हमने पैर नीचे रखा तो किसी झोले में सामान के चरमराने की आवाज आई। इससे पहले कोई और आवाज इस आवाज को उठाए हमने फिर अपना कदम वापस उठा लिया। कर भी क्या सकते थे, बगुले की तरह एक टांग पर टंगे हुए थे। शायद खड़े शब्द का इस्तेमाल यहाँ प्रासंगिक न होगा।
हम जो कर सकते थे वही किया। लोगों को देख सकते थे सो देखने लगे। और देखने में हमने वो देख लिया जिसे धरती पर देखने के लिए नासा के वैज्ञानिक बरसों से दिन-रात एक किए हुए हैं। जी हाँ, ज़ीरो ग्रैविटी ! भार हीनता। मैंने देखा कि लोग ऊपर उठ रहे हैं। जैसे कोई अदृश्य चुम्बक उन्हें खींच रही है। नहीं तो बिना किसी सीढ़ी की मदद से इतनी ऊँची जगह  पर लगाई बर्थ पर चढ़ना कैसे मुमकिन हो सकता है। मैं कन्फ्यूज़ हूँ कि ये बर्थ हैं या सामान रखने की ताक। लेकिन लोग ऊपर की और खिंच रहे थे और उन ताकों पर लद रहे थे...नाटे, लंबे, मोटे, बूढ़े, बच्चे व अधेड़ सब के सब। सीटों के ऊपर की बर्थ,माफ़ करें ताक, लोगों से भर गईं। गैलरी के ऊपर सामान रखने की परछत्ती पर सामान रखा हुआ था। सामान व्यर्थ का जंजाल है। इंसान अपने स्वार्थ के लिए सामानों का संग्रह करता जाता है। बाद में वही सामान मानव सभ्यता के लिए मुसीबत बन जाता है। इसी दार्शनिक विचार प्रक्रिया से प्रेरित होकर ही शायद एक नौजवान ताक की और ऊपर खिंच गया, जीरो ग्रैविटी की वजह से। यह सोच कर कि इस कायनात में प्रकृति ने इंसान के लिए जगह बनाई है अगर वहां सामान रहें यह मानवता के विरुद्ध बात है। मानवता के विचार से प्रेरित होकर युवक ने सामान को सरकाना शुरू किया और अपने लेटने के लिए जगह बना ली। ताक युवक के आकार से सकड़ी थी युवक ने अपना आकार भी सिकोड़ लिया। थोड़ी देर में ही खर्राटों में एक स्वर उसका भी शामिल हो गया।
लोग लगातार अपनी-अपनी जगह तलाश रहे थे डिब्बे में उम्मीद के साथ, और उन्हें मिल भी रही थी। मैंने देखा डिब्बे में लोग आ जा रहे थे। कोई कोई बाथरूम जा रहा था, कोई बाथरूम से बीड़ी पीकर लौट रहा था, कोई मुंह में लगभग छलकने के स्तर पर पहुंची खैनी की पीक को थूकने को लपक रहा था। लेकिन लोग गैलरी में नहीं चल रहे थे। ऐसा लगा कि गैलरी में कोई रोप-वे लगा हुआ है लोग उसी का इस्तेमाल करते हैं। हमने भी एक पल को अपने अंदर भारहीनता को महसूस किया और खुद को डिब्बे के मध्य वाले कंपार्टमेंट में खड़े पाया। बाकायदा दोनों पावों की जगह को हमने अपने ऊपर ईश्वर की बड़ी कृपा माना। सीट मिलने की कल्पना ही हिमाकत थी। फिर भी हमने सीटों का मुआयना करना शुरू कर दिया। रिजर्वेशन के डब्बे में इतनी ही लंबी-चौड़ी सीट पर तीन तक की गिनती लिखी होती है। मतलब कि यहाँ तीन व्यक्ति बैठ सकते हैं। इस डिब्बे में में तो चार तक की संख्या लिखी है। लिखा चार है और पांच-पांच बैठे हुए हैं। इसके पीछे सरकार की क्या मान्यता है। शायद यही कि जनरल डिब्बे में सफ़र करने वालों का आयतन-क्षेत्रफल रिजर्वेशन वालों की तुलना में कम होता है। इस तथ्य की पड़ताल करने के लिए एक बार फिर हम लोगों की और देखने लगे।
ऊपर बैठे सफ़ेद दाढ़ी वाले चचा जान ने काफी देर से अपना भारी बैग लिए खड़ी युवती से कहा, लाओ बिटिया बैग मुझे दे दो, थक जाओगी।" चचा जी ने बैग लेकर अपनी गोदी में रख लिया और निचे बैठे लोगों को थोडा अधिकार पूर्वक बोला, " थोड़ा-थोडा सरक जाओ भाई। लड़की को बैठने दो।" चचा जी ने कहा और लोगों में जुम्बिश हुई लोगों ने लड़की के बैठने के लिए बाकायदा जगह पैदा कर दी। उसी सीट पर जिस पर चार की संख्या लिखी है। यह हमारे लिए कोई चमत्कार से कम न था। चचा जी हमें जादूगर जान पड़े। हमें यक़ीन हो चला कि अगर चचा जी चाहें तो तो इसी चार की संख्या वाली सीट पर सातवें को भी सवार कर सकते हैं। मैंने आशा भरी दृष्टि से चचा जी की तरफ देखा। चाचा ने इस बार सामने वाली सीट की तरफ इशारा किया और हमने बिना जगह के एक सिरे पर बैठने का उपक्रम किया और सचमुच ही बैठ गए! मुझे यक़ीन हो गया कि इंसान में एक अद्भुत कौशल है, आकार बदलने का। रंग बदलना तो इंसान गिरगिट से सीख चुका है। क्या आकार बदलना जोंक से सीखा होगा? एक बात तो पक्की है कि इंसान जनरल डिब्बे में आकर ही अपने इस अद्भुत कौशल को एक्सप्लोर कर सकता है। शायद यही सोचकर ही सरकार ने जनरल डिब्बे की बैठक व्यवस्था का नियोजन किया है।
इस तरह पूरे डिब्बे में  अपने आकार को संकुचित व पल्लवित करने के इंसानी कौशल की मिसालें नज़र आने लगीं। हर स्टेशन पर यही मुजाहिरा होता। चार - चार वाली सीट पर सात-आठ तक बैठ रहे थे। बैठना क्रिया इस स्थिति में न्याय संगत भाषाई प्रयोग नहीं होगा। ऐसा लग रहा था कि हम टंगे हुए हैं। डिब्बे में सीटें नहीं बल्कि खुंटिया लगी हुई हैं। हर खूंटी पर एक इंसान टंगा है। मैं तो सरकार से अनुरोध करूँगा कि वह हर ट्रेन में एक जनरल डिब्बे की व्यवस्था जरूर करे। चाहे शताब्दी हो, राजधानी हो या दुरंतो सभी में जनरल डब्बे की व्यवस्था होनी ही चाहिए। बुलेट ट्रेन में भी एक जनरल डिब्बे की मैं शिफारिश करूँगा। यदि सरकार चाहती है कि इंसान की कल्पनाशीलता, सृजनशीलता निखर कर आए। उसकी अंदर की संभावनाएं निकल कर आएं तो जनरल डिब्बे की व्यवस्था हर ट्रेन में होनी चाहिए। यह काम पूरी ट्रेन को जनरल करने से नहीं होगा। एक ही डिब्बा होना चाहिए। यदि किसी ट्रेन में दो डिब्बे हैं तो उन्हे तुरंत प्रभाव से एक कर देना चाहिए। बस एक डिब्बा हो। सुविधाओं की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। वैसे भी इस डिब्बे के यात्री सुविधाओं का प्रोपर इस्तेमाल कहा करते हैं। वे इन सुविधाओं को अपनी कल्पनाशीलता को विकसित करने में करते है। टॉयलेट का इस्तेमाल  स्मोकिंग ज़ोन के रूप में करते है। गैलरी का सोने के लिए करते हैं। लगेज कैरियर का इस्तेमाल स्लीपर बर्थ के लिए करते हैं। रेलवे ने डस्टबिन नहीं लगाया तो क्या हुआ इस डिब्बे के यात्री किसी भी जगह डस्टबिन की कल्पना कर लेते हैं। इसलिए इस डिब्बे में जितनी सुविधाएं होंगी कल्पनाशीलता कम होगी। सरकार को डिब्बे में तमाम सुविधाओं को बढ़ाने की चिंता नहीं करनी चाहिए। लोग असुविधाओं में भी अपना सुख खोज लेते है। पूरा डिब्बा अपने हाल में अब मगन है। बर्थ पर बैठे व्यक्ति ने ताश निकाल ली है। उसने गैलरी में खड़े व्यक्ति को ताश की गड्डी पकड़ाई। उसने ताश को फेंटा औए खिड़की के पास बैठे व्यक्ति को ताश बाँटने लगा। सब अपनी गति से चलने लगा। चाचा दूसरे यात्री से कह रहे हैं कि बेटी को बी एड करवा दिया है अगले साल शादी कर दूंगा। एक बुजुर्ग दूसरे को कह रहे हैं कि भाई स्वर्ग - नर्क सब यहीं हैं। डिब्बे में जिंदगी ने भी रेल के साथ रफ़्तार पकड़ ली है।
मैं तो कहता हूँ कि बस हर ट्रेन में एक जनरल डिब्बा सृजित करना चाहिए। भले ही जनरल डिब्बे की जगह खाली स्थान ही छोड़ दे तो लोग अपनी अद्भुत कल्पनाशीलता व सृजनशीलता से उसके नायाब उपयोग रेलवे को सुझा सकते हैं। बस दरकार है एक जनरल डब्बे की।


Monday, June 15, 2015

स्वच्छ भारत अभियान : कुछ दृश्य

दृश्य 1
स्थान - जयपुर - चंडीगढ़ एक्सप्रेस, द्वितीय श्रेणी का डिब्बा 
मुख्य पात्र - 25 साल का युवक।
नाम - कोई भी रख लो।
कोरस - कंपार्टमेंट के 10 अन्य यात्री।
युवक : देखने में विद्यार्थी लगता है। उसने अपने बैग से चिप्स का पैकेट निकाल  लिया है। उसे खोलने के लिए प्लास्टिक की कन्नी को काटा और उसे सीट के नीचे फैंका। खाना शुरू किया... और पूरा पैकेट ख़त्म भी किया...  पैकेट ख़त्म करने के बाद  खाली रेपर को उतने मोड़ में फोल्ड किया जितना किया जा सकता था, गोली बनाई और उसे भी सीट के नीचे वहीं भेजा जहाँ कन्नी भेजी थी। चेहरे पर तृप्ति के भाव हैं। रिंगटोन बजता है, "सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा..." जेब से टच स्क्रीन का मोबाइल बहार आ गया है। युवक अब उस में तल्लीन है। शायद फेसबुक पर अपडेट डाला...
कोरस  - सह कलाकारों का जबरदस्त अभिनय.. ब्रेख्त की अलगाववाद थ्योरी को अप्लाई करते हुए पूरे दृश्य से अपने आप को काटे रखा। चहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया। समूहिक निर्लिप्त खामोशी ...
दृश्य निर्विघ्न समाप्त।
दृश्य - 2
स्थान - गांव बम्बोरा, ज़िला अलवर राजस्थान
मुख्य पात्र : 25 साल का युवक
नाम : अंकित या दीपक  
भूमिका: शिक्षक
कोरस : स्कूल के बच्चे
(गाँव की गलियों में एक टोली निकलती है। सबके हाथों में दस्ताने व चेहरे पर सर्जिकल मास्क हैं। सभी रास्ते को साफ करते हुए नीचे लिखे संवाद बोलते हैं।)

युवक : ये देश हमारे आप का
कोरस : नहीं किसी के बाप का

युवक : अपनी झाडू अपना हाथ
कोरस : कर दो अलवर पूरा साफ़

युवक : आओ बहनों आओ भाई
कोरस : सब मिल जुल कर करें सफाई

युवक :  डस्टबिन कितने का आता
कोरस : चालीस का आता चालीस का आता
युवक : फिर तू क्यों ये नहीं लगवाता
कोरस : पैसे बचाता पैसे बचाता
दृश्य - 3
स्थान: शहर की पॉश कॉलोनी का एक चौराहा।
समय: दोपहर
मुख्य पात्र: 25 साल का युवक
भूमिका: बताने की जरुरत नहीं।
नाम: आपके जेहन में एक नाम होगा। वही दे देना।
कोरस : कोरस में शामिल हैं, चायवाला, ऑफिस का बाबू, किराने के व्यापारी, राहगीर इत्यादि)
मुख्यपात्र: सड़क के बीच में आता है। रुकता है। नीचे देखता है। चप्पल खोलता है। शर्ट उतरता है। पतलून उतरता है। बनियान भी उतार कर एक तरफ रख देता है। अब वह केवल जांघिए में खड़ा है। अब वह सड़क के नीचे बने गंदे नाले के गोल ढक्कन खोलता है। तीव्र सड़ांध का झोका वातावरण में फ़ैल जाता है। कोरस नाक पकड़ लेता है।
युवक होल के अंदर झांकता है। फिर पैर लटकाकर उसमें :उत र जाता है, पूरा आदमकद नंग धड़ंग! अब युवक दिखाई देना बंद। थोड़ी देर बाद गर्दन बहार आती है। दो हाथ भी बाहर आते हैं। हाथों के साथ कुछ चीजें बहार आने लगती है। वही आपकी जानी पहचानी चीजें। शैंपू की खाली पाउच, तेल की डब्बी, पुरानी चप्पल, कंघी, साइकिल का ट्यूब, डिस्पोज़ल कप इत्यादि ... खूब सारा काला कीचड़...
कौरस : कोरस समवेत स्वर में बोल रहा, “अच्छे दिन आ गए ... अच्छे दिन आ गए...”

ये तीनों  दृश्य जिंदगी से हूबहू उठाए गए हैं। इस नाटक का कोई भी पात्र काल्पनिक नहीं है। लेकिन मैं बेहद अनाड़ी नाटककर हूँ। ये तीनों दृश्य मैंने बेतरतीबी से रख दिये हैं। मैं इन तीनों दृश्यों में रिश्ता देखने की कोशिश कर रहा हूँ।
क्या इनमें क्रमबद्धता है?
कौनसा दृश्य पहला है, कौनसा अंत ?
कौनसा पूर्वरंग है कौनसा मंगलाचरण ?  आप अपने हिसाब से रख लें
चलो नाटककार न सही हम दर्शक की तरह नुक्ताचीनी तो कर ही सकते हैं। एक सवाल –
यदि आपको मौका दिया जाए तो किस  दृश्य में क्या–क्या बदलाव करना चाहेंगे?
पहले सीन में ?
“अजी यूं”
दूसरे सीन में ?
“अजी चुटकी में ”
तीसरे में ?
“ बहुत आसान है साहब।”  
ठहरिए जी, थोड़ा मुश्किल किए देते हैं, अब ऐसा है, बाहर से नहीं सीन में घुस के ज़रा कुछ बदल कर दिखाइए....
पहला सीन .... दूसरा सीन... तीसरा ... एँ ... पड़ गए न मुसीबत में... आप चिंतित मत होइए... मोदी जी बदल देंगे सीन को !
कैसे बदलेंगे ?
मुझे लगता है किसी भी बदलाव को लाने के तीन रास्ते हैं –
·     कानून बनाओ
·     अभियान चलाओ या
·     शिक्षा के रास्ते से
कानून तो कोई बना नहीं। बना हो तो चल नहीं रहा... कोई कहीं भी थूके, कोई कहीं भी मूते, कोई कहीं भी कुछ भी फेंके कोई रुकावट नहीं है।
अब बात अभियान की करते हैं। मोदी जी द्वारा शुरू किए गए 'स्वच्छ भारत अभियान' से कितना फर्क पड़ा है यह बात अलग है लेकिन एक बात स्पष्ट है कि स्वच्छता के मुद्दे का शुमार राष्ट्रीय चिंताओं में हुआ है। जब प्रधानमंत्री जी ने इस अभियान की औपचारिक शुरुआत की थी तो उसके बाद कुछ जुम्बिश हुई। अगले दिन से अख़बारों में छोटे बड़े नेताओं की तस्वीरें लंबे हत्थे के झाड़ू के साथ छपने लगी। कई नेताओं को झाड़ू भी मिल गया, माहौल भी, लेकिन कूड़ा नसीब नहीं हुआ तो उन्होंने बाकायदा कूड़ा आयात करवा के फैला लिया ताकि कूड़े के साथ एक सेल्फ़ी हो सके।
खैर, इस तस्वीर का एक सुखद पहलु भी है। इस अभियान ने कुछ उत्साही नवयुवकों सक्रिय कर दिया जो ऊपर तीसरे सीन के नायक हैं। ये वास्तव में भारत की एक स्वच्छ तस्वीर देखना चाहते है। जो सेल्फ़ी भी लेना चाहते हैं लेकिन कूड़े की नहीं बल्कि साफ स्वच्छ व बदली हुई फ़िज़ा के साथ।
दूसरे सीन के  नवयुवकों का समूह जिसका नाम है 'हेल्पिंग हैंड्स' पिछले दिनों उल्लेखनीय रूप से सक्रिय हुआ है। ये लोग बिना किसी सरकारी व गैर सरकारी फंड के अपने जज़्बे के साथ शहर को साफ करने में जुटे हुए हैं। मैं हर वीकेंड पर शहर जाता हूँ तो हर शनिवार के अखबार को उठाकर देखता हूँ तो उसमें हेल्पिंग हैंड्स की न्यूज़ होती है कि आज शहर के फलां मोहल्ले को साफ किया जाएगा। संयोग से हमारे बहुत परम मित्र दीपक चंदवानी जी समूह से जुड़े हुए है। दीपक जी ने समूह से जुड़ने का आमंत्रण दिया। मैंने सहर्ष स्वीकार भी कर लिया। निसंदेह इस तरह के ईमानदार प्रयास से जुड़ना चाहिए। लेकिन इनकी मुश्किल यह है कि जिस गली को ये लोग साफ करते हैं वह अगले दिन फिर गंदी हो जाती है? अगले दिन फिर हेलपिंग हैंड चाहिए।
हेल्पिंग हैंड्स के नौजवानों के साहस को सैल्यूट। उनको बहुत वाहवाही मिल रही है, और मिलेगी, मिलनी भी चाहिए। लोग भरोसा भी करेंगे। आप को अगुआ भी बनाएँगे। लेकिन आपके वहाँ से हटते ही तस्वीर पहले जैसी हो जाएगी। मैं यह नहीं कह रहा कि इन नौजवानों को यह काम रोक देना चाहिए। लेकिन अपने काम के इर्दगिर्द कुछ चीज़ें और भी सोचनी व करनी चाहिए। कही ऐसा तो नहीं हम अपने एक्शन के तहत किसी ऐसी बात को जाने अनजाने में प्रतिष्ठित कर रहे हों जिसे नहीं होना चाहिए। गंदगी कोई और करे और सफाई कोई करे यह विद्ध्वंसक संस्कृति है। इसको सदियों से भारत ने भुगता है। इसे हमें और प्रतिष्ठित नहीं करना है। इस संस्कृति ने तीसरे दृश्य वाले नायक को पैदा  किया है।
मुझे लगता है इन साथियों को मुद्दे के तह में जाना चाहिए। हर सप्ताह सफाई पर निकलते हैं तो उन्हे उस मौहल्ले की सफाई का एक ऑडिट भी करना चाहिए ।
मौहल्ले की सफाई व्यवस्था के लिए जो इन्फ्रास्ट्रक्चर है उसकी क्या स्थिति है? क्या वह दुरुस्त है? क्या जिनकी ज़िम्मेदारी है वे उसका निर्वहन कर रहे हैं? और आखिर में यह पता करना कि ऐसे क्या कारक हैं जो गंदगी फैलाने पर मजबूर करते है। इस बात की पड़ताल हो, क्यों सफाई के मामले मे हमारे किरदार के दो पहलू क्यों है – व्यक्तिगत रूप में उजला तथा सामाजिक किरदार मैला।  
साफ-सफाई एक मूल्य है लेकिन यह आदत का भी मसला है। लोगों की आदतों पर बात करनी होगी। चाहे किसी मौहल्ले के चार घर ही लें और उनसे पूछ कर उनके घर पर सफाई का ऑडिट करे कि उनके घर में किन वजहों से गंदगी बाहर आती है। वो क्या कारण हैं जो हमें लाख सफाई पसंद होने के बावजूद गंदगी फ़ैलाने से नहीं रोकते हैं। यह समझना जरुरी है कि सफाई अंतत: व्यक्तिगत मसला है। लोगों की आदतों में बदलाव के लिए बहुत कोशिश करनी होगी यह गतिविधि शैक्षिक गतिविधि बने बिना स्थायी बदलाव नहीं आ सकता।
अभी हेल्पिंग हेंड की पहचान गली में बनी है। वहाँ से आँखों में उंगली अभी डाल के दिखाया जा रहा है। उन्हे धीरे – धीरे उन्हे चूल्हे तक पहुँच बनानी पड़ेगी।


Sunday, May 31, 2015

गोरेपन के मिथक और बाज़ार

आज सुबह की अख़बार देख रहा था तो दो ख़बरें थीं जो महत्वपूर्ण थीं। पहली खबर यह थी मैगी को लेकर उठे हुए विवाद के बारे में थी। मेरा सात साल का बेटा भी अख़बार की सुर्ख़ियों को मेरे साथ दोहरा रहा था।अचानक मैगी व दूसरे  फ़ूड प्रोडक्ट की जाँच व खतरों से सम्बंधित हैडलाइन आई तो उसने भी पढ़ी, उसे कितनी समझ आई यह तो पता नहीं लेकिन उसे यह जरूर पता चल गया कि उसका पसंदीदा खाद्य पदार्थ किन्हीं कारणों से सुर्ख़ियों व संदेह में है। उसे यह भी समझ आ गया कि माँ इस अख़बार के टुकड़े का संग्रह करके रखेगी और उसकी फेवरेट डिश पे इसी आधार पर पाबंदियां आयद करेगी।
दूसरी तरफ इस सदी का महानायक भारतीय बच्चों के सामने रोज मैगी पर लार टपकाता दिखाई देता है। संभव है महानायक जी अपनी लाड़ली पौती के लिए भी उसकी माँ से दो मिनट वाली डिश बनाकर लाने के लिए कहते होंगे।
दरअसल ऐसा नहीं होता। ये तथाकथित महानायक केवल बाजार की संस्कृति के वाहक हैं, शायद शिकार नहीं बनतेहैं। ये पूरे तंत्र के एक पुर्ज़ा भर है। ये उस पुर्ज़े की बात है जो सिस्टम में बिलकुल फिट बैठ रहा है।
आज की दूसरी खबर एक ऐसे पुर्जे की है जिसने सिस्टम का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया। नवोदित अभिनेत्री कंगना रानौत ने गोरा बनाने वाले सौंदर्य प्रसाधन का विज्ञापन करने से इंकार करके सबको चौंका दिया है। उनके इंकार की वजह न केवल स्वास्थ्य का मुद्दा है बल्कि वे गोरेपन की अवधारणा पर बुनियादी सवाल खड़ा भी करती हैं, जो ऐसे अंधेयुग में एक रौशनी को किरण सरीखा है।
अंधायुग संज्ञा इसलिए प्रयोग की गई है क्योंकि लगभग चौथाई सदी से शर्तिया गोरा करने के दावों के साथ क्रीम बेचीं जा रही हैं वो भी केवल दो सप्ताह मेगोरापन! मगर दो दशक गुजर जाने पर कोई 'अंग्रेज़' नहीं बना। जिसने पहली बार क्रीम लगाई उनकी घिसते-घिसते जवानी हाथ से फिसल गई लेकिन गोरी रंगत पकड़ में नहीं आई। क्रीम घिसना फिर भी जारी है। पहले खुद पच रहे थे अब गोरेपन का सपना अपनी संतानों पर चस्पा कर दिया है। पहले गोरे होने पर केवल लड़कियों का ही अधिकार था। अब इन संस्कृति के वाहकों ने इस क्षेत्र में भी बराबरी लाने का महत्वपूर्ण कार्य करते हुए मर्दों वाली क्रीम भी इज़ाद की है।
एक झूठ बड़ी खूबसूरती से प्रसारित व  प्रतिष्ठित किया जा रहा है बल्कि बेचा भी जा रहा है। हम भी कमाल के लोग हैं, यदि पंखा, मिक्सी या बल्ब दो साल की वारंटी में ख़राब होता है तो आप अपने रिटेलर या मैकेनिक की जान खा जाते हैं कि आपने धोखा किया है हमारे साथ। सब्जी के थैले में से दो बैंगन सड़े निकल जाएं तो आप पूरा थैला ले जाकर सब्जीवाले के दे मारते हैं। ताज्जुब तब होता है जब आपसे कोई दो सप्ताह में गोरा करने का वादा करता है और आप दो दशक तक चूँ तक नहीं करते। कोई इन सौंदर्य प्रसाधनो की खाली शीशी इनको वापस नहीं दे मरता। अजब देश है, गजब लोग हैं।
गोरेपन की अवधारणा इंसानियत के खिलाफ सोच है। एक ऐसा वक्त जब रंगभेद को पूरी दुनिया में अमानवीय, अवैधानिक व शर्मनाक घोषित किया जा चुका हो, ऐसे समय में यह रंगभेद का एक नया संस्करण हमारे सामने है जिसे हमारे वक़्त के महानायक व नायिकाएं स्थापित करने में लगे हुए हैं।
दरअसल बाजार भी हमारे सांस्कृतिक मिथकों को पकड़ता है और उन्हें अतृप्त अभिलाषाओं से सींच कर सपने दिखता है तथा उन्हीं सपनों की चाबी अपने प्रोडक्ट में रख देता है। इसमें दोराय नहीं कि औपनिवेशिक दौर में योरोपीय सुंदरता के मानक अवश्य प्रतिष्टित हुए हैं लेकिन गोरेपन की चाहत  की जड़ें हमारे सुदूर अतीत में भी हैं। बिहारी के इस दोहे में आप श्वेत रंग की पराकाष्ठा देखिए  -
"पत्रा ही तिथि पाइए वा घर के चहुँ पास,
नित प्रति पून्यो ही रहे आनन ओप उजास।"
बिहारी कहते हैं कि नायिका के पड़ौस में तिथि पता करने के लिए पंचांग की जरुरत पड़ती है। क्योंकि उसका मुख चन्द्रमा है इसलिए मोहल्ले में हमेशा पूनम ही रहती है। मुख चंद्रमा है, कमल के सामान है, दूधिया रंगत है इस तरह की उपमाओं से हमारा साहित्य भरा पड़ा है। ये उपमान महिलाओं के लिए थे। देवियों का रंग गोरा ही है और देवताओं का सांवला। हाँ लेकिन माँ काली का उदहारण है लेकिन काली रूप की प्रतिष्ठा तभी होती है जब वह असुरों का संहार करती है जो कि परम्परा में पुरूषोचित कार्य है। इसका मिलाजुला असर यह है कि भारतीय लड़की में भले ही दूसरे तमाम गुण हो लेकिन  यदि सही वर प्राप्त करना है तो गोरा होना ही पड़ेगा।
बाजार केवल प्राचीन मिथकों का इस्तेमाल ही नहीं करता बल्कि नए मिथक गढ़ता भी रहता है क्योंकि बाजार की दौड़ में बने रहना है। इसी का सटीक उदहारण है - मर्दों वाली क्रीम। हज़ार बार दोहरा कर उसे क्रीम बेच ही दी। यहाँ भी बाजार ने पुरुष की दुखती रग पे हाथ रखा। कि "अरे मर्द बनो, शर्म आनी चाहिए तुम्हें औरतों वाली क्रीम इस्तेमाल कर रहे हो।" जो बरसों से उसी डिब्बी से क्रीम निकाल कर लगा रहा था जिसमे से स्त्री लगा रही थी, अचानक पुरुष को अहसास हुआ कि किसी ने उनके पेंट-पतलून छीन कर घाघरा चोली पहना दिए हों। आनन फानन में वह दौड़ पड़ा अपने रिटेलर की तरफ,"भाई वो मर्दों वाली क्रीम कहाँ है..." इस तरह भारतीय पुरुष यह क्रीम गोरेपन के लिए लगा रहा है या नहीं पर एक बात पक्की है कि वह इस क्रीम से मर्दानगी के अहसास व दंभ को कायम रखने की कोशिश तो कर रहा है। इस तरह से बाजार नए मिथक खड़े कर देता है पुराने की बुनियाद पर।
बाजार के दूसरे हथकंडे है उन लोगों के लिए जो तरक्की पसंद है व साइंस में यकीन रखते हैं। इसके लिए वैज्ञानिक रिसर्चों का हवाला देकर कहना कि अमुक उत्पाद सारे किटाणु धो डालता है, दूसरा कहेगा धोता ही नहीं मार डालता है, कोई दावा करता है कि हमारा फ़ूड सप्लीमेंट पीने से इतने बच्चे लंबे हो गए... इत्यादि... इत्यादि...
तीसरा हथकंडा है प्रतिस्पर्द्धा का। सभी कंपनियां अपने उत्पादों को लेकर प्रतियोगिता रचती हैं जो केवल विज्ञापन के स्तर पर ही होती है, न कि गुणवत्ता की। गुणवत्ता में सब बराबर ही ठहरती हैं। किसी का कोल्ड ड्रिंक काला है, किसी का ऑरेन्ज और किसी का पीला, किसी का नीबू वाला है और किसी का आम वाला, फर्क रंग और खुशबू काहै। लेकिन इस बाजार सिस्टम की मज़बूरी है प्रतियोगिता करना। कोई और नहीं तो ये खुद अपने उत्पाद से ही प्रतियोगिता रच देते हैं। आप किसी कंपनी का टूथब्रश इस्तेमाल कर रहे है और अचानक उसी कंपनी का विज्ञापन आपको साबित कर देता है कि आप कितने पिछड़े व अज्ञानी है। आपका ब्रश सीधा है भीतर तक सफाई नहीं करता है। जब आप उस ब्रश को अपना लेते हैं तो कुछ दिन बाद एक विज्ञापन आपको आकर चेता देता है कि आपका ब्रश तो एक तरफ से ही सफाई करता है और आपको तो दोनों तरफ से सफाई करने वाला ब्रश चाहिए। आप इस ब्रुश से दो चार हो ही रहे होते हैं अचानक फिर एक विज्ञापन आपका दिमाग खराब कर देता है कि आपके ब्रुश की जो डंडी है वह ठीक नहीं, पकड़ सही नहीं बन सकती... पकड़ सही न होगी तो सफाई क्या खाक होगी! आपको मुर्ख बनाने की तैयारी में पूरा बाजार लगा हुआ है। और आप बाकायदा बन भी रहे हैं। तमाम शिक्षा व प्रगतिशीलता से लैस होने के बावजूद भी। सहर्ष बन रहे हैं। इस सिस्टम में जो जितना बनता है उसकी प्रतिष्ठा उतनी ही बढ़ती जाती है ।  
ऐसे में कंगना रनौत जैसे प्रभावशाली लोग जब बाजार की मानसिकता पर सवाल उठाकर चुनौती देते हैं तो एक उम्मीद जागती है। कंगना की तारीफ इस लिए भी की जानी चाहिए क्योंकि उन्होंने अपने करियर के शिखर पर इन विज्ञापनों को ना कहा है। आज से दस साल पहले बैडमिंटन स्टार फुलला गोपीचंद ने भी शीतल पेय का विज्ञापन को ना कह कर यह परिचय दिया कि प्रतिभा, तार्किकता और मानवीयता एक ही शरीर में निवास कर सकते हैं।
बाज़ार ने हमें इस तरह अपनी जकड़बंदी में लिया है कि सोचने समझने को कुंद कर दिया है और  सवाल उठाना बंद कर दिया है। सुंदरता का यह आलम है कि हमारे शारीर के जितने अंग हैं उनको धोने, पोंछने व चमकाने के उतने ही तरीके के साबुन, शैम्पू लोशन, तेल व लेपन मौजूद हैं। एक पूरा भ्रम बना दिया गया है कि आपको सुन्दर बनना है तो ये सारे बाहरी उपक्रम करने पड़ेंगे। संतरा, एलोविरा, बेसन, मलाई, दूध, दही, आवला, शहद सब बाहर से ही लेपन करने हैं यदि आपने इन्हें खुराक में लिया तो फिर ज़ीरो फिगर का क्या होगा। हनीसिंह ज़ीरो फिगर की नेशनल एंथम बना दी है - लाक ट्वेंटी एट कुड़ी डा, फोर्टी सेवन वेट कुड़ी डा.... युवा पीढ़ी इसे अक्षरशः पालन करते दिखाई दे रही है।


Saturday, May 30, 2015

शो मस्ट गो ऑन

मैं आज सुबह थोड़ा जल्दी स्कूल पहुँच गया था। स्कूल प्रांगण में बने मंच की सीढ़ियों पर बैठ कर समर कैम्प में आते हुए बच्चों को देख रहा था। वे अपनी-अपनी  पसंद की कक्षाओं की तरफ जा रहे थे। मैं भी नाटक सीखने आने वाले बच्चों का इंतज़ार कर रहा था। इस बार नाटक के ग्रुप में मेरे पास 21 लड़कियां आ रही हैं जो चौथी से दसवीं कक्षा में पढ़ रही हैं। सहसा मेरे पास आकर 6-7 साल की लड़की आकर रुकी। प्यारी सी बच्ची अलीशा ने अपने हाथ में कुरकुरे जैसा कोई पैकेट पकडे हुए थी और उसमें से लगातार एक-एक लेकर कुतर रही थी। खाते हुए साफ लग रहा था कि उसके सामने के दो दांत गिर चुके है। मुझसे आकर बोली,"सर आप हमें भी थियेटर वाले ग्रुप में रख लीजिए न प्लीज।" मैंने उससे कहा, “पहले आप बताइये कि आपके दो दाँत कहाँ गए? वह बड़ी मासूमियत से बोली, “क्या है न, हमारे घर एक बाबा आए थे। उनके पास दांत नहीं थे। उन्होने कहा कि आप मुझे दाँत दे दो तो हमने दे दिये। मुझे दाँत वापस मिल जाएंगे।” उसने थियेटर के ग्रुप में लेने के लिए फिर अपनी बात दोहराई। मैंने उसे कहा, "कैम्प चलते हुए तो 11 दिन हो गए। आप पहले क्यों नहीं आए?" अलीशा बोली, " सर हम आए थे लेकिन डान्स वाले ग्रुप में चले गए थे।" मैंने कहा, "तो आप डांस सीखिए।" उसने तुरंत कहा,"नहीं सर डांस तो हम पहले से ही जानते हैं। हम तो नाटक करने के लिए ही आए थे, लेकिन लड़कियों ने बहका दिया और हम डांस में चले गए। आप तो बस हमें नाटक में रख लीजिए।"
लड़की का नाटक में आने के लिए इस तरह से नेगोसियेशन करना मुझे सुखद आश्चर्य लग रहा था। मुझे पिछले साल का समर कैम्प याद आ गया। जब बच्चों से गतिविधियों में भाग लेने के लिए फॉर्म में उनसे चॉइसेज़ पूछी गईं थी तो किसी बच्चे ने थियेटर को ऑप्शन के तौर पर नहीं चुना था। हमने खुद बच्चों से नेगोसियेशन किया था कि वे नाटक में हिस्सा लें। कोशिश करके 15-16 बच्चे आए थे। अगले ही दिन से ड्राप आउट की चुनौती शुरू हो गई थी। यह जयपुर शहर के एक मोहल्ले का सरकारी स्कूल है इस स्कूल में अल्पसंख्यक समुदाय की लगभग 300 बच्चियां पढ़ती हैं। पिछले साल जैसे ही लड़कियों ने अपने अभिभावकों को बताया कि वे नाटक में भाग ले रही हैं और उस नाटक का मंचन रवीन्द्र रंगमंच पर किया जाएगा, अभिभावकों ने एक-एक करके बच्चों को रोकना शुरू कर दिया। फिर शिक्षकों व हमारे द्वारा अभिभावको की समझाइश का दौर चला, लेकिन ड्राप आउट भी चलता रहा। लगभग आधा ग्रुप टूट चुका था। एन शो वाले दिन भी दो लड़कियों को रोक लिया गया।  
शो मस्ट गो ओन... नाटक हुआ। लोगोंने देखा। इनमें कुछ अभिभावक थे, अफसर थे, नेता थे व सामाजिक कार्यकर्त्ता थे। लड़कियों को खूब शाबाशी मिली और इनाम भी मिले। इस पूरी प्रक्रिया जो दिखाई दे रहा था वह था लड़कियों का आत्मविश्वास। आत्मविश्वास, तहजीब व संजीदगी से अपनी बात रखना व सवाल उठाने के सब साक्षी बने थे।
नाटक ने अपना असर शुरू कर दिया था। शायद पहले दिने से ही... इस साल मैं जब उस ग्रुप से मिला जो नाटक करना चाहता था तो मैं दंग रह गया। पूरा हॉल लड़कियों से भरा था। नौबत यह थी कि नाटक के लिए लड़कियों का चयन करना पड़ा। आज ड्राप आउट की समस्या नहीं है शुरू के दिन जितने बच्चे आए उनकी संख्या में इजाफा ही हुआ है। मैंने जब लड़कियों के सामने पिछले साल वाली आशंका रखी कि इस बार भी शो के वक़्त पर आपके अभिभावक रोक तो नहीं लेंगे? सब लड़कियों ने कहा कि उनसे पहले ही बात कर ली गई है।
क्या नाटक कुछ बदलाव लाया?
क्या नाटक सच में बदलाव लाता है?
क्या स्कूल में कुछ बदला?
क्या बच्चों में कुछ बदलाव आया?
क्या समुदाय की सोच में कुछ बदलाव आया?
जो भी हो, नाटक हो रहा है, फिर एक बार। बच्चे जम कर तैयारी कर रहे हैं और उनके हौंसले बुलंद है। बदलाव शायद अपनी गति से आता है, लेकिन मेरी उम्मीद है कि नाटक नहीं रुकेगा।


Sunday, May 24, 2015

मेरी डायरी का एक पन्ना : उम्र, उत्साह व जज़्बा

मई का महीना हो, पारा पचास डिग्री को छूने जा रहा हो और आप ट्रेन में बैठ कर जयपुर से अलवर के बीच यात्रा कर रहे हों। आपका गला सूख रहा हो, बोतल का पानी ख़त्म हो जाए। ऐसे में गाड़ी के प्लेटफॉर्म पर रुकने पर आप अपनी खली बोतल बहार निकालें और पल भर में आपकी बोतल ठण्डे पानी से भर जाए तो इसे कोई चमत्कार नहीं समझें।
यह आजकल जयपुर से अलवर तक के सभी स्टेशनों पर आम दृश्य है। जैसे प्लेटफार्म पर ट्रेन आने की उद्घोषणा होती हैं पंद्रह-बीस लोग पानी से भरे ड्रमों को पहिए वाली ट्रॉली पर खींचते नज़र आ जाएंगे। कुछ लोग उन ड्रमों में बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े काट कर डालने लगते हैं। जैसे ही ट्रेन प्लेटफार्म पर मंथर गति से आकर रूकती है। कई जोड़ी झुर्रियोंदार हाथ मुस्तैदी से पानी का जग व कीप थामे डिब्बे की खिड़कियों की और लपकते हैं। ये हाथ दो मिनट के अल्प समय में ही खिड़कियों से झांकती खाली बोतलों को ठन्डे पानी से लबालब भर देते हैं। एकदम निशुल्क। कई बार आधी बोतल होने पर ट्रेन गति बढ़ा देती है तो इन झुर्रीदार हाथों का साथ पैर भी देने लगते हैं। लगभग एक दौड़ लगती है, बोतल के भरने पर्यन्त! इस सारी कवायद के बीच कई बोतल-ब्रांड - बिसलेरी, एक्वाफिना, बैली, किनले और रेलनीर ठेलों के फ्रीजरों में शरमा कर दुबके बैठे रहते है। या वातानुकूलित कोच का रुख इख़्तियार करते हैं।
यह कवायद सुबह ड्रमों की सफाई व बर्फ की सिल्लियों को सँभालने से शुरू होती है और दिन छिपने के बाद तक भी चलती रहती है। इस पूरे निजाम को चलाते हैं नौकरियों से विश्राम पा चुके साठ की उम्र पार कर चुके लोग। ये वो लोग हैं जिन्हें अपने घरों में लगभग बेकार व अयाचित व्यक्ति समझ लिया जाता है। मैंने कई बार इन्हीं लोगों को टिकट की खिड़की पर बाबू द्वारा सीनियर सिटीजन का सबूत देने की झिड़की सुनते देखा है। ये लोग इस व्यवस्था को कैसे चलते हैं, मैंने इसमें झाँकने की कोशिश नहीं की। मैं तो इस व्यवस्था पर ही अभिभूत हूँ। यह कैसे किया जाता है निसंदेह ही यह किसी मानव संसाधन के अध्येता के लिए शोध का विषय हो सकता है कि ऐसा क्या मोटिवेशन है कि जिन लोगों को जरुरी मानव संसाधन न मानकर रिटायरमेंट दे दिया जाता है, वे लोग इतनी बड़ी व्यवस्था को कैसे बिना थके बनाते हैं। पता नहीं यह आई आई एम के कोर्स में पढ़ाया जाता है या नहीं।
जो भी हो मैंने इस व्यवस्था से एक दो सिद्दांत व सीख निकलने की कोशिश की है जो इस प्रकार हैं-
  • उम्र कोई बाधा नहीं होती है। यदि आपमें दृढ विश्वास है कि यह काम करने योग्य है और मानवता के हित में है। कार्य का प्रेरण भीतर से ही आता है न कि बाह्य उपक्रमों से।
  • दूसरे, इन लोगों ने इस मान्यता को पुष्ट किया है कि पानी इंसान की मूलभूत अवश्यताओं में सबसे ऊपर है। हर हाल में, हर इंसान को साफ व शीतल पानी निशुल्क मिलना चाहिए। यह समाज का दायित्व है।
  • आज भले ही मूलभूत आवश्यकताओं की चीजों को बाज़ार ने अपनी गिरफ़्त में लेकर गरीबों की पहुँच से बाहर कर दिया हो। इस उदहारण ने सिद्ध कर दिया कि चाहे एक सीमित जगह या सीमित समय के लिए ही सही, पूरी निष्ठा से किया गया ईमानदार प्रयास बाज़ार को चुनौती दे सकता है।
  • हमारे यहाँ परम्परा रही है रास्तों व बाज़ारों में प्याऊ लगाकर पानी पिलाने की। उन स्वस्थ परम्पराओं को पुनर्जीवित किया जा सकता है।नयी पीढ़ी में यह सन्देश जाना चाहिए।
  • आखिर में यही कहना है कि हमारे बुज़ुर्ग कभी भी गैर जरुरी व निरे आश्रित नहीं होते हैं। उनमे भी बहुत कुछ करने का जज़्बा व ऊर्जा होती है बशर्ते हम उनको सुनें।



Monday, May 11, 2015

इनके नाम क्या केवल कोड नंबर हैं

कल कैफ़ी आज़मी की याद में इप्टा अलवर द्वारा आईएमए, सभागार में आयोजित संगीत प्रतियोगिता का कार्यक्रम देखने का अवसर मिला। इप्टा अलवर के अध्यक्ष श्री कान्ति जैन, महासचिव श्री प्रदीप माथुर व पूरी टीम का बहुत आभार जो उन्होंने अलवर शहर की संगीत की प्रतिभाओं को छोटे से स्टेज पर इकट्ठा कर दिया। न केवल नवोदित कलाकार बल्कि संगीत के उस्ताद लोग भी दर्शक दीर्घा में बड़ी तादाद में मौजूद थे। पूरा संगीतमय माहौल था। पूरा हॉल दर्शकों से भरा था। भौतिक व्यवस्थाएँ भी अच्छी थीं। दर्शकों के जलपान की व्यवस्था भी की गई।  इप्टा हर वर्ष इस कार्यक्रम को बड़ी शिद्दत के साथ आयोजित करती है।
इस बार का कार्यक्रम मेरे लिए इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने मुझे एक ऐसे मुद्दे पर सोचने के लिए प्रेरित किया, जिस पर मैंने पहले कभी नहीं सोचा था। इस लेख में जिस मुद्दे पर मैं अपने विचार रख रहा हूँ उसमें केवल सन्दर्भ ही इप्टा के कार्यक्रम का है, लेकिन यह मुद्दा वैश्विक-सा ही है। अत: आगे का विचार हम इप्टा के सन्दर्भ से अलग होकर करेंगे और इसे जनरलाइज़ करके देखेंगे। आम तौर पर यह दृश्य किसी भी सांस्कृतिक प्रतियोगिता का हो सकता है।
एक लड़की स्टेज पर आती है। बड़े ही सधे हाथों से माइक पकड़ती है। पीछे ताल मिलाने के लिए बैठे आर्केस्ट्रा वालों से मशविरा करती है कि किस सुर में गाने जा रही है। इतने में ही उद्घोषिका का मधुर स्वर सुनाई देता है, "प्रतियोगिता की पहली प्रस्तुति लेकर आपके सामने आ रही हैं कोड नंबर वन जीरो वन..." जैसे ही वह श्रेया घोषाल के अंदाज़ में सुर उठाती है, " मेरे ढोलना सुन..." तो फिर सुनने वाले को लगता है कि इस लड़की का नाम कोड नंबर वन ज़ीरो वन से कुछ ज्यादा होना चाहिए।
दूसरी प्रस्तुति के लिए उद्घोषणा होती है, "... और अब आ रहे हैं कोड नंबर वन जीरो टू... "
वन ज़ीरो टू मंच पर आता है। वन ज़ीरो टू की ऊंचाई है, सवा चार फुट, वन ज़ीरो टू की उम्र 10-11 साल है, रंग गोरा और आँखों में चमक वाले वन ज़ीरो टू गाना शुरू करता है। गाने के बोल हैं, "झुकी झुकी सी सी नज़र... सुनकर लगता है कि इसकी पहचान कोड नंबर, कोड नंबर वन ज़ीरो टू इसके साथ न्याय नहीं कर पा रही है। "...  अगली प्रस्तुति के लिए फिर उद्घोषणा होती है, “अब मैं कोड नंबर वन ज़ीरो थ्री को बुलाना चाह रही हूँ।" कोड नंबर वन ज़ीरो थ्री मंच पर आता है सरापा बिजली। हाथों-पैरों में बिजली सी तेज़ी...घुंघराले बाल... छरहरी काया... आते ही अपनी उम्र से भी ऊँचा सूफ़ी कलाम उठाया, "कागा सब तन खाइयो, मेरा चुन चुन खैओ मास
दो नैना मत खाइओ, मोहे पिया मिलन की आस।" इसके बाद ऐसा सुर चढ़ा, " छाप तिलक सब छीनी..."  आवाज़ और साज़ की इस कलाकार ने ऐसे संगति बिठाई कि पूरे हॉल में एक वायब्रेशन हो गया। लगा कि इस कलाकार का नाम भी कोड नंबर वन ज़ीरो थ्री या फॉर से कहीं ज्यादा होना चाहिए। वैसे ही जैसे अमीर खुसरो का एक नाम है। वैसे ही जैसे कैलाश खेर का एक नाम हैं।
क्या इन बच्चों के माँ-बाप ने इनके नाम फ़क़त कोड नंबर... रखे हैं? यदि नहीं तो इन प्रतियोगिताओं में किस विवशता के तहत उनके नाम पर हम एक कोड नंबर चस्पा कर देते हैं।
बहुत सोचने पर मैं इस नतीजे पर पहुँच पाया कि इसके पीछे निम्नलिखित मान्यताएं हो सकती हैं-  
  • चूँकि परम्परा से ऐसा चला आ रहा है।
  • बराबरी की अवधारणा
  • निष्पक्षता के आग्रह की वजह से
कोई और वजह भी हो सकती है। अब सिलसिलेवार उपरोक्त मान्यताओं का विश्लेषण करते हैं।
यदि बराबरी के आग्रह के कारण इन बच्चों को कोड नंबर दिए जाते हैं, तो उस लक्ष्य को तो हम प्रतियोगिता में सामान अवसर प्रदान करके प्राप्त कर लेते हैं। जब हम बिना किसी,जाति, धर्म व जेंडर का विचार किए इन बच्चों को मंच प्रदान करते हैं तो फिर बराबरी की बात तो हो गई। वैसे हमेशा यूनिवर्सल बराबरी से काम नहीं चलता।इन प्रतियोगीतों में भी जूनीयर व सीनियर वर्ग में प्रतियोगिता करके हम एक तरह का भेदभाव ही करते हैं लेकिन वह एक सकारात्मक भेदभाव है। इस लिए मेरा मानना है की विविधता को वैल्यू करना चाहिए। और बराबरी का यही मतलब होना चाहिए कि बच्चा जिस भी सामाजिक व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आ रहा है, उसे अपने में अन्तर्निहित संभावनाओं को निखारने का मौका मिले। जब वह यह सब कर रहा होता है, तो उसकी एक पहचान बन रही होती है। अब सोचो जब उस धुँधली उजली पहचान के शुरू में ही उस पर कोड का लेबल लगा देंगे तो बच्चे का किरदार कैसे खड़ा हो पाएगा। तो प्रतियोगिताएँ बराबरी की अवधारणा के एकदम उलट बैठती हैं। इसमें मौका तो सबको देते हैं लेकिन प्रतिष्ठित किसी एक को करते हैं। हम आगे उसे ही जाने देते हैं जो विजय की हमारी इंटरप्रिटेशन पर फिट बैठता है। जबकि इन प्रतियोगीतों में आने वाला प्रत्येक बच्चा अद्वितीय होता है। उसकी अपनी रूचि व रुझान होता है। अभिव्यक्ति का अपना अंदाज़ व आयाम होता है। क्या जो निर्णायक होते हैं वे इस तरह के वैविध्य से पेश आने के लिए तैयार होते हैं?
यदि इस कोड सिस्टम के पीछे निष्पक्ष निर्णय का आग्रह है तो फिर हमें इन बच्चों की पहचान से छेड़छाड़ करने की बजाए निर्णायकों की क्षमतवर्द्धन पर ध्यान देना चाहिए। स्कूली परीक्षाओं में ऐसा होता है कि परीक्षाओं में धांधली नहीं हो इसलिए कॉपियों पर नाम की बजाए रोल नंबर डाले जाते हैं। होने को वहां भी ठीक नहीं। लेकिन यहाँ तो प्रतियोगिता संगीत की है, लाइव संगीत की। यहाँ प्रतियोगी व जज के आलावा तीसरा दर्शक और भी है। जिसकी उपस्थिति प्रभावित करती है। कलाकार अपनी कला से दर्शक को प्रभावित करता है और दर्शक अपनी प्रशंसा से। दर्शक जज से इतर भी सोचता है। इसी सब के दौरान सभी कलाकारों की छवि दर्शक के मन में बनती है। अब दर्शक की विवशता है कि वह उस बनती मिटटी छवि को कोड नंबर से सम्बद्ध करने में मुश्किल मुश्किल महसूस करता है।
मुझे लगता है कि बच्चों को उनके वास्तविक नाम के साथ मंच पर बुलाना चाहिए। हमारे यहाँ विडम्बना यही है कि हर तरह की उपलब्धि को हम गणित में रूपांतरित करके ही देखते हैं। चलो जब तक उपलब्धि को आंकने के लिए गणित का कोई विकल्प नहीं मिलता तब तक हम बच्चों के नामों को तो गणितीय भाषा से निकाल सकते हैं।
मुझे लगता है कि बिना सोचे ही परम्परा का निर्वहन हो रहा है। इप्टा जैसी संस्था को इस पर सोचना चाहिए। इप्टा ही है जो परम्पराओं को चुनौती देकर नया सौंदर्यशास्त्र रचती आयी है। यहाँ भी बच्चों की अपनी पहचान की खातिर उसे उन्हें अपने नाम से पुकारा जाना चाहिए। कलाकार होने के नाते मैं तो अपने स्तर पर यही महसूस करता हूँ कि किसी प्रतियोगिता या किसी और मंच पर मुझे यदि नाम कि बजाए किसी और संज्ञा या कोड से बुलाया जाएगा तो बहुत बुरा लगेगा। मेरे साथ ऐसा बहुत बार हुआ है जब मैं किसी प्रतियोगिता जीता नहीं मगर एक पहचान को अर्जित करके लोटा हूँ। जो मेरे नाम के साथ सम्बद्ध होती थी न कि कोड से।  


Friday, May 8, 2015

सूचना का अधिकार : क्या कोई और रास्ता भी है ?

यह अर्जी इग्नू में लगाने से पहले मैं इसे ब्लॉग पर इस लिए डाल रहा हूँ, ताकि जो लोग इस कानून के विरोध में है वे मुझे सुझाएँ कि क्या कोई और रास्ता भी है। जो लोग इस कानून में विश्वास रखते है में मार्गदर्शन करें कि इस अर्जी को और धारदार कैसे बनाया जा सकता है।


सेवा में,
पब्लिक इन्फोर्मेशन ऑफिसर,
स्कूल ऑफ परफोरमिंग आर्ट्स,
इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU)
नई दिल्ली।
विषय : सूचना का अधिकार अधिनियम – 2005 के तहत सूचनाएँ लेने हेतु।

महोदय,
विनम्र निवेदन है कि इग्नू से जो सूचनाएँ मुझे चाहिए उनका जिक्र करने से पहले मुझे उसकी भूमिका के रूप में कुछ कहना है।

आरटीआई की अर्जी की जरूरत क्यों पड़ी
महोदय, जो सूचना मुझे चाहिए वे किसी भी इंसान के लिए सहज सुलभ होनी चाहिए। लेकिन मैं पिछले दो महीने से  उन्हें प्रोपर  चैनल से प्राप्त करने की कोशिश कर रहा हूँ। बात दरअसल यह है कि मैंने विश्वविद्यालय की वेब साइट से पता किया कि यहाँ से  प्रदर्शनपरक कला में सर्टिफिकेट-नाट्य कला (सीपीएटीएचए) करवाया जाता है। जब मैंने इस कोर्स के लिए रीजनल केंद्र, जयपुर से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि इस कोर्स के अध्ययन की सुविधा यहाँ नहीं है, इसलिए आप विश्वविद्यालय के दिल्ली कार्यालय में संपर्क करें। तब, मैंने वेब साइट पर दिये नंबरों पर बारी-बारी से फोन मिलाया मुझे कोई मदद नहीं मिली। फोन लाइनों का रेस्पोंस निम्न प्रकार आया –
·     अधिकतर बार तो फोन कनेक्ट ही नहीं हुआ।  
·     कुछ नंबरों पर, “यह नंबर स्थायी रूप से सेवा में नहीं” की ध्वनि आई।
·     यदि दो चार बार कनेक्ट हुआ तो लंबी घंटी के बाद अपने आप कट गया यानि किसी ने उठाया नहीं।  
·     किस्मत से एक बार किसी ने फोन उठाया पर यहाँ भी बदकिस्मती देखो, उधर से आवाज़ आई, “आपका फोन पुस्तकालय में लग गया है, मैं आपको सही नंबर देता हूँ।” सही नंबर पर फोन लगाया तो किसी ने चोंगा ही नहीं उठाया।
हो सकता है यह यंत्रणा मेरे अकेले की ही न हो। अब आप ही बताइये आप एक दूरस्थ शिक्षा माध्यम वाले विश्वविद्यालय हैं। देश-दुनिया में हजारों मील दूर बैठा व्यक्ति कैसे आप से संवाद कायम कर पाएगा? वेब साइट पर सूचना पूरी नहीं है और फोन से डायलॉग हो नहीं पा रहा है। यह एक दूरस्थ शिक्षा वाले विश्वविद्यालय के लिए बहुत ही सोचनीय बात है।  यह तब और भी विचारणीय हो जाती है जब विश्वविद्यालय की आत्मछ्वि वैश्विक स्तर की हो।
महोदय, मेरी मजबूरी है कि फ़ोन पर बात हो नहीं रही है और दिल्ली आने की मेरे पास अभी फुर्सत व सामर्थ्य नहीं है। इसलिए आरटीआई के अलावा कोई विकल्प नहीं। अत:

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत निम्नलिखित सूचनाएँ प्रदान करें
  •      प्रदर्शनपरक कला में सर्टिफिकेट-नाट्य कला (सीपीएटीएचए)  का कोर्स क्या आपके विश्वविद्यालय से करवाया जाता है? यदि कभी-कभी नहीं करवाया जाता है तो उसका तर्कसंगत आधार क्या है?
  •  क्या अलवर या जयपुर, राजस्थान का निवासी, जिसकी थियेटर में रूचि है व रंगमंच से जुड़ा हुआ है, तथा आपकी वेब साइट पर इस कोर्स के लिए अपेक्षित सभी योग्यताओं को पूरा करता है, क्या वह इस कोर्स में प्रवेश पा सकता है ? यदि हाँ तो क्यों, नहीं तो क्यों?
  •   कृपया इस कोर्स की प्रवेश प्रक्रिया बताएं तथा अध्ययन के क्या चरण होंगे? 
  •    रीज़नल सेंटर पर यह कोर्स अनुपलब्ध है और आपकी वेब साइट पर यह उपलब्ध है। इस अद्भुत विरोधाभास का दस्तावेजी प्रमाण दें। यदि यह कोर्स राजस्थान के लिए उपलब्ध नहीं तो देश के किस कोने के खुशकिस्मत लोगों के लिए आपने यह सुविधा उपलब्ध करवा रखी है। यदि इसका जवाब दिल्ली है तो फिर क्यों न इसकी दूरस्थ शिक्षा की अवधारणा पर शक किया जाए? कृपया तर्कसंगत जवाब दस्तावेजी प्रमाणों के आधार पर दें।
  •    कम से कम कितने विद्यार्थी  होने पर आप एक कोर्स उस सत्र में करवाते है। आपको कैसे पता चलता है कि अमुक संख्या में विद्यार्थी उपलब्ध है? कोई नियम हो तो उसका प्रमाण दें।  
  •   आपकी फ़ोन लाइनों पर लोगों के फ़ोन को सुनना सुनिश्चित करने के लिए क्या कोई पॉलिसी या नियम बना हुआ है।
  •   क्या इस तरह का निरीक्षण किया जाता है कि फोन सुनने वाले अपने  उत्तरदायित्व का निर्वाह कर रहे हैं? कृपया दस्तावेजी प्रमाण दें।
  •   क्या रेस्पोंडेड व अनरेस्पोंडेड कॉल का ब्योरा रखा जाता है?

महोदय, मैं ये सभी सूचनाएँ सद्भावना पूर्वक मांग रहा हूँ, इस उम्मीद के साथ कि उपरोक्त संदर्भित कोर्स के प्रति पात्रता के बारे में जान सकूँ तथा इग्नू के सूचना सिस्टम के प्रति मेरे मन में जो विभ्रम पैदा हुआ है उसकी सफाई कर सकूँ।
धन्यवाद सहित
दलीप वैरागी



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