Monday, March 30, 2015

थिएटर एक्सर्साइज़ ( Theatre Exercise) : Mime and movement - 1

ये गतिविधियां शारीरिक अभिव्यक्ति का विकास करती हैं। अपने शरीर के द्वारा अपने सम्प्रेषण को प्रभावी बनाना इसका प्रमुख उद्देश्य है। यह अभिनेता में विभिन्न गतियों का विकास करती हैं जो किसी अभिनेता के लिए बहुत जरूरी होती हैं।  
1.   हाथ का अनुसरण
जोड़े में से एक व्यक्ति A अपनी हथेली को सामने वाले B के चेहरे से कुछ इंच दूरी पर रखेगा। अब वह अपने हाथ को धीरे-धीरे घुमाएगा। B अपने शरीर को उसी के अनुसार घूमते हुए अपने चेहरे को को समान दूरी पर बनाए रखे। कुछ समय के बाद आपस मे बदल कर करें । तीन के साथ भी कर सकते हैं जिसमे बारी-बारी से लीड कर सकते हैं।
2.   नाक का अनुसरण
यह पूरे समूह के लिए एक मूवमेंट एक्सर्साइज है। पूरे हॉल में घूमें, स्पेस का इस्तेमाल करें, गति को बदलते हुए, दूसरों को छूने से बचते हुए। अब अपने नाक पर ध्यान दें। आप चलने में नाक का अनुसरण कर रहे है। जहां नाक ले जा रही है वहीं आप जा रहे हैं। शरीर के अन्य अंगों पर फोकस करते हुए इस गतिविधि को आगे बढ़ाएँ। यह गतिविधि डांस और फ़िजिकल थियेटर के लिए बहुत उपयोगी है। विभिन्न चरित्रों के अनुसार उनकी गति के आइडिया कैसे लेने हैं। इसमे यह गतिविधि मदद करती है। अब कोशिश करें पेट, पैर की चिटकी उंगली, घुटना और पीठ इत्यादि का अनुसरण करें

Sunday, March 29, 2015

विश्व रंगमंच दिवस : समस्याओं से जूझता अलवर का रंगमंच

27 मार्च 2015 को अलवर में विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। अभावों से जूझ रहे अलवर रंगमंच में यह विस्मित कर देने वाली बात थी कि इस दिन दो स्थानों पर, दो संस्थाओं पर अलग-अलग विचार गोष्टियां आयोजित हुई। अरावली आर्टिस्ट अकादमी द्वारा कलाभारती रंगमंच व इप्टा, अलवर द्वारा राज गुप्ता सभागार में आयोजन किया। दो-दो गोष्ठियां होना अलवर रंगकर्म की सक्रियता की निशानी कतई नहीं है। बल्कि इस बात की सूचक है कि अलवर के मुट्ठी भर रंगकर्मी विभाजित हैं। यूँ तो दो आयोजन होना किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं। लेकिन इससे जहाँ रंगकर्मी बंटता है उसके साथ दर्शक भी।
लिहाज़ा मुझे इप्टा की ओर से आमंत्रण मिला तथा उसी में शिरकत कर पाया। यहाँ इस गोष्ठी में हुई प्रमुख बातों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। मेरे लिए प्रमुख बात यह थी कि लगभग 10 सालों बाद जीवन सिंह मानवी जी को सुनने का मौका मिला। जब मैं कॉलेज में पढ़ रहा था तब मानवी जी हमारे प्राचार्य हुआ करते थे, और उन्ही दिनों वे सेवा निवृत्त हुए थे। यह उनका एक परिचय है, साहित्य जगत में वे एक प्रगतिशील चिंतक के रूप में जाने जाते है। उनके शरीर पर तो वृद्धावस्था का असर साफ देखा जा सकता है लेकिन उनकी वाणी में उम्र का बिलकुल भी असर दिखाई नहीं देता। उनका एक और रूप है जिससे बहुत से लोग इस गोष्ठी में परिचित हुए कि वे 30-35 वर्षों से हर साल अपने गांव की रामलीला में शामिल होने जाते रहे हैं। यही नहीं इसके साथ ही वे अपने गांव की रामलीला में रावण का किरदार निभाते रहे हैं। युवा रंगकर्मियों की ज़िद पर उन्होंने रावण शरूपनखा का प्रसंग अभिनीत करके भी दिखाया। उनके रंगकर्म के लिए समर्पण से नयी पीढ़ी के रंगकर्मी अवश्य प्रेरणा ले सकते है।
मानवी जी ने बताया नाटक लोकशिक्षण का बड़ा मज़बूत माध्यम है। उन्होंने बताया कि किस चतुराई से उनके गाँव की रामलीला मंचन में समसामयिक सन्दर्भों को जोड़ दिया जाता था। उन्होंने बताया कि कब रावण का दरबार सरकार की आर्थिक नीतियों की समीक्षा का मंच बन जाता था। कैसे रावण का मंत्री मंडल आधुनिक मंत्रिमंडल का रूपक बन जाता था।
उन्होंने बताया कि रंगमंच की सबसे बड़ी समस्या है कि रंगकर्मी दर्शकों को रसानुभूति करवाने में विफल रहे हैं। भरत मुनि ने नाटक में रस को प्रधान बताया है। उन्होंने कहा कि अभिनेता दर्शक के दिल के स्थायी भाव को जगाकर उसे रसानुभूति करवाने में विफल रहा है। उन्होंने कहा सच्चा नाटक तभी होता है जब नाटककार, अभिनेता व दर्शक का हृदय एक हो जाता है। उन्होंने साधारणीकरण पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनके गांव की रामलीला हज़ारों लोगों को इसी वजह से जोड़ पाती थी। नाटक के एक दूसरे पहलु पर रौशनी डालते हुए उन्होंने कहा कि उनकी रामलीला को देखने मुस्लिम औरते भी आती हैं। एक बार सांप्रदायिक माहौल बिगड़ा जिसकी वजह से गांव में कर्फ्यू लगा। उन्होंने बताया कर्फ्यू के बावजूद मुस्लिम महिलाऐं रामलीला देखने आईं। जिससे सशक्त सन्देश गया कि नाटक सांप्रदायिक दूरियां पाटने में बड़ी भूमिका निभाता है।
गोष्ठी का विषय था - समस्याओं से जूझता अलवर का रंगमंच। वरिष्ठ साहित्यकार रेवती रमण शर्मा ने विषय प्रवेश कराया। इसके पश्चात् विभिन्न वक्ताओं ने अपने-अपने विचार रखे। प्रो. नंदकिशोर नीलम, प्रो.रमेश बैरवा, प्रो. नीलाभ पंडित, दलीप वैरागी, गणेश जोशी, राज गुप्ता व मनीष जैन ने वक्ता के रूप में भाग लिया। सभी के वक्तव्यों से जो बात निकल कर आई कि जिन्हें हम अलवर रंगकर्म की समस्याएं कह रहे हैं वे दरअसल सार्वभौमिक समस्याएं हैं।  आज भी रंगकर्म को सम्मानजनक प्रोफेशन के रूप में स्वीकार नहीं किया जा रहा है। इस कारण से नयी पीढ़ी रंगमंच से नहीं जुड़ रही है। नयी पीढ़ी सिनेमा व रंगमंच की और आकृष्ट हो रही है, कुछ वक्ताओं के द्वारा यह चिंता भी व्यक्त की गई। नव निर्मित ऑडिटोरियम की कीमतों के रंगकर्मियों की पहुँच से बाहर होने के मुद्दे पर विचार रखते हुए वक्ताओं ने कहा कि उसकी कीमत कम होने के इंतज़ार में बैठे नहीं रहना चाहिए, बल्कि जहाँ भी जगह मिले वहीं सीमित साधनों में भी नाटक करने चाहिए और निरंतरता से करने चाहिए तभी रंगकर्म आगे बढ़ेगा।
गोष्टी के आखिर में इप्टा, अलवर के अध्यक्ष श्री कान्ति जैन ने सबका आभार व्यक्त किया। मेरे नज़रिये से अपने उद्देश्य में यह विचार गोष्टी सफल रही। 

Saturday, March 28, 2015

नाटक संभावनाओं का मंच ( भाग 5 ) : भरत वाक्य

भरत वाक्य: शिक्षक विद्यालय में क्या करें
कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय में किस तरह के नाटक किए जा सकते हैं? इसका जवाब यह हो सकता है कि बस आपको लड़कियों के साथ नाटक की शुरुआत करनी है। यह शुरुआत कहीं से भी कर सकते हैं, कभी भी कर सकते हैं। आप इस पर्चे को पढ़ने के अगले चंद घंटों में शुरु कर सकते हैं, जिस दिन आपका
स्कूल का सत्र शुरु हो उस दिन कर सकते हैं या सत्र के किसी भी दिन कर सकते हैं, कक्षा में कर सकते हैं, विद्यालय के मैदान में  कर सकते हैं, पुस्तकालय में कर सकते हैं या हॉस्टल  में कर सकते हैं।
सवाल शुरुआत का है। उसके बाद प्रक्रिया में तौर-तरीके आपकी रोज़मर्रा की पाठ्यचर्या वाले ही हैं। नाट्य प्रक्रिया में हमें  सबसे पहले अपनी पाठ्यचर्या के लक्ष्य को अपने ज़हन में रखना है। उसके हिसाब से नाटक की विषयवस्तु व प्रक्रिया चुन सकते हैं। और, इसी प्रक्रिया में आपको नाट्य-निर्देशक के साथ एक शिक्षक की पारखी नज़र भी रखनी है। साथ-साथ यह आकलन भी करते जाना है कि प्रक्रिया के दौरान या उसके पश्चात् क्या शिक्षा के उन उद्देश्यों के सूचक दिखाई दे रहे हैं या नहीं, जिनका जि़क्र हम प्रस्तावना में कर चुके हैं। यहाँ नाटक शुरू करने से पहले देखना पडे़गा कि लड़कियों की ताकत क्या है, वे इस उम्र में क्या महसूस करती हैं, उन्हें क्या करना अच्छा लगता है? इसी के आधार पर नाटक की गतिविधियाँ व विषय-चयन में मदद मिल सकती है।
अजमेर व बीकानेर जि़ले के केजीबीवी में जो कार्यशालाएँ हमने लड़कियों के साथ की हैं, उन अनुभवों से जो सैद्धांतिक समझ उभर कर आई है, उसे यहाँ संक्षेप में आपकी सुविधा के लिए दिया जा रहा है। इन कार्यशालाओं में प्रमुख नाट्य रुपों - क्रिएटिव ड्रामा फॉर्मल थियेटर को मिलेजुले रूप से करने की कोशिश की गई है। इसे शिक्षिका या वे जो लड़कियों के साथ काम करने को उत्साहित हों, कर सकते हैं। शिक्षिकाएँ चाहें तो इन दोनों विधाओं को सतत  अपने शिक्षण का हिस्सा बनाएँ। या फिर इसे सप्ताह भर या उससे ज़्यादा दिन की कार्यशाला के रूप में कर सकती हैं। अगर इसे कार्यशाला के रूप में किया जाता है, तो सप्ताह भर में जो लड़कियाँ मिलकर काम करेंगी और इस सप्ताह भर की रचनाशीलता में जो ऊर्जा व आनंद उभर कर आएगा, वह किसी उत्सव या शैक्षणिक मेले-सा अहसास करवायेगा। यह ध्यान देने की बात है कि नाटक केजीबीवी में वन-टाइम यानी एक बार होने वाली गतिविधि बन कर नही रहनी चाहिए। अपनी सततता में ही यह विधा असरदार है। निरंतरता के अभ्यास ही पकी हुई आदतों को तोड़ सकते हैं।
1. रचनात्मक नाटक (क्लासरूम ड्रामा)
रचनात्मक नाटक की शुरुआत हमारे छुटपन मेंघर-घर खेलने से हो जाती है। रचनात्मक नाटक के आधार में बचपन के नाटकीय खेल हैं। बच्चों के मुक्त नाटकीय खेलों में उन्हें दुनिया जैसी दिखाई देती है, जैसा वे उसे समझते हैं व जो चरित्र उनके इर्द-गिर्द हैं, वे उनकी नकल करने की कोशिश करते हैं। इसे बच्चे बिना किसी बाहरी दखल के स्वतः व स्वाभाविक रूप से सहजतापूर्वक कर लेते हैं। यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, खास तौर से छुटपन में। नाटक के लिए जिस आवेग व उत्साह की ज़रूरत होती है, उसकी बुनियाद है इंसान के अनुभव, जो एजुकेशनल ड्रामा यानी शिक्षा प्रदान करने वाली नाट्य गतिविधि के लिए बेहद आवश्यक हैं। इसकी प्रकृति में ही कन्स्ट्रक्टिविस्ट अप्रोच यानी ज्ञान के सृजन की पहल है। बच्चों के नाटकीय खेल उन्हें अवसर प्रदान करते हैं कि वे दुनिया को अपने नज़रिये से देखें व समझें। बच्चों की नाटक करने की यह अद्भुत क्षमता तब अपने चरम पर होती है, जब वे अपने घर-परिवेश में होते हैं। लेकिन, विडम्बना यह है कि विद्यालय में आने पर इस नैसर्गिक-क्षमता को प्रायः विद्यालय जाने -अनजाने में नज़रअंदाज़ करना शुरू कर देते हैं। किशोरावस्था आते-आते लगभग यह स्वाभाविक स्रोत लुप्तप्रायः हो जाता है। बच्चे दुनिया को अपने तरीके से देखने-समझने के बजाए एक कृत्रिम तरीके से देखना शुरू कर देते हैं। अभिव्यक्ति का सोता सूख जाता है। और उसके स्थान पर एक झिझक आ बैठती है, जबकि यह आयु ऐसी है जब किशोरों के पास अनुभवों का एक समृद्ध संसार है, अपना नज़रिया विकसित हो चुका है, सोचने समझने का जज़्बा भी है। ऐसी स्थिति में उस अभिनय कौशल का ज़बर्दस्त इस्तेमाल किया जा सकता हैं, जो स्वाभाविक रूप से उसमें बचपन से ही विद्यमान है।
नाटक को कक्षा में ले जाने के पीछे जो महत्त्वपूर्ण विचार है, वह यह है कि इससे रचनाशीलता व कल्पनाशीलता इत्यादि क्षमताओं को विकसित किया जा सकता है, जिनकी शुरूआत बचपन के स्वाभाविक नाटकों में हुई थी। आज के समाज में ये बेहद ज़रूरी कौशल के रूप में देखे जा रहे हैं, न केवल कलाकार के लिए बल्कि एक आम इंसान के जीवन में भी। लेकिन, इनके अभ्यास कक्षा में दिखाई नहीं पड़ते हैं। इन्हें उभारने के परिप्रेक्ष्य में नाट्यकला एक आईने का काम करती है, जिससे बच्चों में समीकक्षात्मक रूप से समाज व मानव के अनुभवों का विश्लेषण करते हुए मानवता व दुनिया की गहरी समझ पैदा होती है।
क्लासरूम ड्रामा के संदर्भ में उल्लेखनीय है कि क्रिएटिव ड्रामा यानी रचनात्मक नाटक व फॉर्मल थियेटर यानी औपचारिक रंगमंच में थोड़ा फ़र्क है। रचनात्मक नाटक में इंप्रोवाइज़ेशन के साथ प्रक्रिया प्रधान होती है, नाटक का प्रदर्शन पक्ष इसमें महत्त्वपूर्ण नहीं होता। इसमें अभिनेता-छात्राएँ, शिक्षक के सहयोग से अभिनय प्रक्रिया में शामिल होकर मनुष्य के अनुभवों का विश्लेषण करते हुए अभिनय करते हैं। रचनात्मक नाटक, चाहे कक्षा में हो या इसके अतिरिक्त, यह सुनिश्चित है कि इसमें हमेशा इम्प्रोवाइज़ेशन यानी कुछ न कुछ तब्दीली बेहतर प्रस्तुति के लिए होगी। इसमें अभिनेता जो भी संवाद करते हैं वह दर्शकों के उद्देश्य से नहीं होता है। इसमें अभिनेता एक कुशल शिक्षक द्वारा निर्देशित होते हैं न कि किसी पेशेवर नाट्य-निर्देशक द्वारा। इसके विपरीत फॉर्मल थिएटर एक फॉर्मल प्रोडक्शन होता है जहाँ केंद्र में दर्शकों का मनोरंजन ही होता है। यहाँ बहुधा संवाद रटे या याद किए जाते हैं। ज़्यादातर निर्देशक प्रोडक्शन यानी प्रस्तुति के बारे में निर्देश देता है।
रचनात्मक नाटक पूरी तरह से प्रक्रिया आधारित है। इसका ज़ोर विद्यार्थी में कौशल-निर्माण पर रहता है कि बच्चे में खुद के बारे में व अपने परिवेश के बारे में नई समझ बने। अपने शरीर व आवाज़ को वह नए तरीके से सम्प्रेषण का ज़रिया बनाए। एक जटिल नाट्यलेख से गुज़रना, भूमिका निर्धारित करना, एक फिनिश्ड प्राॅडक्ट यानी एक तैयार की जाने वाली प्रस्तुति के लिए काम करना इत्यादि से रचनात्मक नाटक विद्यार्थियों को छूट देता है कि वे सृजनशीलता के खूब मौके हासिल करें और उनकी समझ को पुख्ता करें। यह औपचारिक नाटक की बुनियाद है। बच्चों को किसी प्रस्तुति की चुनौती देने से पहले यह ज़रूरी है कि वे पहले रंगमंच की बुनियादी अवधारणाओं को जानें। वे यह थिएट्रिकल स्किल और ज्ञान अपने अनुभवों से सृजित करें जो रचनात्मक नाटक देता है। रचनात्मक नाटकों को कक्षा में सृजित करने में कुछ नाट्य तकनीकें मददगार हो सकती हैं। ये नाट्य तकनीकें चरित्र की परतों की पड़ताल करने, घटनाओं व स्थितियों का विश्लेषण करने व समस्या समाधान में सहायक होती हैं।
2. औपचारिक नाटक (फॉर्मल थिएटर)
यह रंगमंच का वह रूप है जो परंपरागत रूप से हमारे सामने आता है। इस प्रकार के रंगमंच में प्रस्तुति प्रधान होती है। प्रस्तुति दर्शकों को ध्यान में रख कर तैयार की जाती है। अनवरत अभ्यास से उसे तैयार कर दर्शकों के सामने पेश किया जाता है। वर्तमान में विद्यालयों में इस तरह का रंगमंच देखने को मिलता है। विद्यालय के उत्सवों पर बच्चों की मंडली बनाकर उत्सव वाले दिन इसे सबके सामने दिखाया जाता है। अक्सर, इसे जैसे-तैसे अपनी भूमिका की पंक्तियाँ याद कर प्रस्तुति देने तक सीमित कर दिया जाता है। अगर इस रंगमंच की संभावनाओं पर ध्यान दिया जाए तो इससे स्कूल में बेहतर शैक्षणिक प्रयोग हो सकते हैं। प्रायः नाटक जहाँ विद्यार्थियों में सोचने, समझने व विश्लेषण करने का कौशल विकसित करता है, वहीं औपचारिक नाटक में एंड प्राॅडक्ट यानी जो दर्शाई जाने वाली प्रस्तुति है पर जो आग्रह रहता है, वह विद्यार्थियों में एक्सिलेन्स यानी श्रेष्ठता की ओर जाने के मूल्य का बीजारोपण करता है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा में कला के उद्देश्यों में एस्थेटिक अप्रिसिएशन यानी सौंदर्य बोध के मूल्य, जिन्हें विद्यार्थियों में विकसित करने की अपेक्षा की जाती है, वह इसी उत्कृष्टता के प्रति आग्रह से ही आती है। प्रस्तुतिन को उत्कृष्टता की ओर ले जाने का जो साधन अभिनेता के पास होता है वह है- उसका मन व शरीर। मन व शरीर को साधने के यहाँ बहुत बारीक व सतत अभ्यास हैं। ये अभ्यास हमारी धँसी हुई आदतों को तोड़ने का काम करते हैं।
पहले से निर्धारित आलेख पर काम करते हुए आगे बढ़ना एक ज़बर्दस्त अनुशासन है, जो एक मानक भाषा तक विद्यार्थियों को लाने में सहायक है। यह इतने अभ्यास देता है कि जब तक चरित्र व भावानुकूल अभिव्यक्ति नहीं होती, तब तक चैन से नहीं बैठो। यही सतत अभ्यास उच्चारण व सम्प्रेषण के घपलों को दूर करता है। उदाहरण के तौर पर देखें तो राजस्थान के पाली व सिरोही जि़लों में ध्वनि को को बोलते हैं जैसे चम्मच को सम्मस। इसी तरह जोधपुर जि़ले में को बोलने का चलन है। अगर पूरे राजस्थान के संदर्भ में देखा जाए तो का आपस में बहुत घपला है।
ये जो पकी हुई आदतें हैं, ये किसी कक्षा में महज़ बता देने या चेता देने भर से नहीं टूटेंगी। इनके बहुत सचेत व अनुशासित अभ्यास होने चाहिए। क्योंकि, ये आदतें ज़िंदगी के रास्ते पर चलते हुए भाषा में आती हैं। इसलिए इन आदतों को तोड़ने का ज़रिया भी ज़िंदगी की तरह ही हो। यह अभ्यास व मौका औपचारिक नाटक में एक निर्धारित आलेख देता है, जहाँ संवादों के देखे-परखे अभ्यास होते हैं। कहाँ बोलना है, कहाँ रुकना है, कहाँ ज़ोर देना है, यह बारीकी से देखा जाता है। इन अभ्यासों पर काम करने के बाद जब कलाकार प्रस्तुति तक पहुँचता है तो वह एक प्रवाहमायी भाषा के साथ होता है। वही भाषा जिसे स्कूल में सिखाना हमारा पहला ध्येय है। अगर केजीबीवी के संदर्भ में देखें तो इसमें आने वाली लड़कियों के लिए हिन्दी दूसरी भाषा ही होती है। केवल नाटक ही एक ऐसा माध्यम है जो इन लड़कियों को शीघ्रता से मानक हिन्दी भाषा से सहजता से परिचित करवा सकता है, वह भी कौशल के स्तर पर।


 औपचारिक नाटक की जो एक और खूबी है, वह है इसका कथोपकथन विधान। कथोपकथन के लिए ज़रूरी है कि पहले पूर्व के कलाकार की लाइनों को सुना जाए, उसको सुनने के बाद ही अपनी लाइनें बोली जाएँ। नाटक में आप दूसरे को सुने बगैर खुद नहीं बोल सकते हैं। नाटक में शुरू से आखिर तक यह ज़बर्दस्त अनुशासन है। नाटक निर्माण-प्रक्रिया में जब हम इस अनुशासन से गुज़रते हैं, तब अवचेतन में सम्प्रेषण के मूल्य अंकित हो रहे होते हैं, जो बाद में सामाजिक जीवन में परिलक्षित होते हैं। यही सम्प्रेषण के मूल्य हमें वह नागरिक देते हैं जो सामने वाले का एक वक्ता के तौर पर, उससे बढ़ कर एक इंसान के तौर पर सम्मान करता है, उसे सुनता है, उसके बोलने की आज़ादी को तवज्जो देता है और उसे सुनने के पश्चात् अपना मत रखता है।

Wednesday, March 25, 2015

थियेटर एक्सर्साइज़ (Theatre exercise-2) : स्थायी पता


यह एक पुरानी गतिविधि ही है जिसे ग्रुप में सहजता लाने के लिए किया जाता है। मैंने इसके प्रयोजन के अनुसार नामकरण करने की कोशिश की है। किसी भी कार्यशाला या प्रशिक्षण में जब नए समभागी हमारे पास आते हैं तो वे अलग गाँव, जाति, धर्म, उम्र, जेंडर व आर्थिक स्थिति से आते हैं। प्रशिक्षण के दौरान भी वे अपने सामाजिक समूहों में ही सीमित होकर रह जाते हैं। परिचय की गतिविधियों से हालांकि वे अपने दरों को बढ़ाते हैं फिर भी वे जब बड़े समूह में बैठते हैं तो अपने सामाजिक संदर्भों वाले समूहों में ही सहजता महसूस करते हैं। वे इस स्थिति को तोड़ कर वे दूसरे लोगों से घुलें-मिलें इसके लिए यह गतिविधि उपयोगी हो सकती है।
संभागियों को हॉल के अंदर संगीत की धुन पर चहलकादमी करने के लिए कहें। संभागी निर्देशक के निर्देशों को सुनकर वैसा करें –
·     उम्र की वरीयता के अनुसार कतार में खड़े होना
·     भाई-बहनों की संख्या के क्रम में खड़े होना
·     वर्णमाला के क्रम में नाम के प्रथमाक्षर के अनुसार खड़े होना

अंतत: जब लगे कि निर्देशक को मनवांछित बैठक व्यवस्था मिल गई है तो वह संभागियों को कहे कि वे अपने अगल बगल वाले व्यक्ति को पहचान ले कि कौन दायीं और है कौन बाईं और है।  उन्हें आपस में हल्का सा परिचय को भी कहें। अब फिर से संभागियों को संगीत पर घूमने के लिए कहें । पुन: पहले वाली स्थिति में आने के लिए कहें। अगर थोड़ी चूक हाओटी है तो एक बार और कर के देख लें। अब संबगियों को इसी क्रम में घेरे में बैठने के लिए कहें। यह भी उन्हे कह दे कि यह इस कार्यशाला में आपका स्थायी पता है। जब जरूरत पड़े तो बादल भी सकते हैं। 

रंगमंचीय गतिविधियां एवं अभ्यास (Theatre exercises) -1 : (Image) इमेज


इसका  प्रवर्तन ब्राज़ील के नाट्य निर्देशक अगस्टो बोल ने किया था। उन्होने इस रंगमंचीय तकनीक को समाज के वंचित दलित लोगों की आवाज को उठाने के लिए किया, जिस रंगमंच को उन्होने “थियेटर ऑफ ओप्रेस्ड ” (Theatre of the oppressed) का नाम दिया। मेरा इस विधा से परिचय फ्रांस के निर्देशक जोम्पियर बेसनार्ड ने लगभग 15 साल पहले एक कार्य शाला में करवाया था।
इस exercise में अभिनेताओं या बच्चों को 7-10 के समूह में किसी सामाजिक स्थिति पर एक फ्रीज़ इमेज यानि झांकी बनाकर लाने के लिए कहें। इस झांकी में उन्हे चुनौती दें कि स्थिति को इस प्रकार प्रदर्शित करें कि कि उसमें समाज में विद्यमान गैर बराबरी साफ दिखाई दे। प्रदर्शन के वक्त दर्शकों से पूछा जाए कि आपको इस झांकी में किस तरह का पवार समीकरण, समस्या या शोषण दिखाई दे रहा है। जब यह स्पष्ट हो जाए तो दर्शकों से उस इमेज को बादल कर आदर्श इमेज में परिवर्तित करने के लिए कहें। याद रहे कि जा भी समाधान दर्शक द्वारा बताए जाएँ वो यथार्थ हों व उनके पीछे कोई तार्किक आधार हो। कोशिश यह रहनी चाहिए कि एक अच्छी ख़ासी चर्चा शुरू हो सके।
यह गतिविधि समाज के यथार्थ को तटस्थता से समझने में विद्यार्थियों की मदद कर सकती है। उन्हे समस्या समाधान के अभ्यास देती है।  
इस गतिविधि से पूर्व यदि वार्म अप के लिए स्टेचू वाली गतिविधि करवाएँगे तो बेहतर रहेगा।


Tuesday, March 24, 2015

नाटक संभावनाओं का मंच ( भाग 4 )

शुरूआतः एक खुशनुमा इत्तेफ़ाक

कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय,
किराप, अजमेर नाट्य कार्यशाला27 से 29 मार्च 2014
 

जब किराप में इस नाट्य कार्यशाला की तारीख निर्धारित की तब यह सोचा नहीं था कि इसकी शुरूआत विश्व रंगमंच दिवससे होगी। बहरहाल, 27 मार्च को केजीबीवी में जाकर हमने लड़कियों से इस दिन के ऐतिहासिक महत्त्व पर मुख्तसर बात की कि इन तीन दिनों में हम लोग मिलकर जो काम करने जा रहे हैं, उसका कितना महत्त्व है। यह उस काम से किसी भी मायने में कम नहीं है, जिसे आज के दिन संसार के रंगकर्मी अपने-अपने तरीके से करेंगे।
अब तक की कार्यशालाओं में हम सभी लड़कियों को शामिल नहीं कर पाए थे। लगभग, तीस-पंैतीस लड़कियों के साथ ही काम हो पाता था, जिसकी वजह से मंचन के वक्त उन लड़कियों की नाराज़गी सामने आती थी, जो नाटक में भाग नहीं ले पाती थीं। ‘‘हमें नाटक क्यों नहीं सिखाया गया, सिर्फ़ इन्हीं लड़कियों के साथ क्यों काम किया गया ?‘‘ जवाब में हमारे पास कोई दलील नहीं होती, जो लड़कियों को संतुष्ट कर सके। सही भी है, अगर हम यह मानते हैं कि नाटक व्यक्ति में छिपी हुई प्रतिभा व संभावनाओं को उजागर करता है तो यह भी सर्वमान्य है कि ये संभावनाएँ सब में हैं। इसका मौका सभी को मिलना ही चाहिए। अतः, सभी सौ लड़कियों के साथ काम करने की योजना बनाई गई। तय यह हुआ कि तीन बड़े समूह बनेंगे व प्रत्येक समूह में एक नाटक तैयार किया जाएगा। तीनों समूहों को अपने नाटक की थीम तय करने के लिए कहा गया। समूह एक ने पानी विषय चुना, समूह दो ने दंगा तथा समूह तीन ने चुनाव। उस के बाद उनसे कहा गया कि आप अपने-अपने विषय पर जम कर चर्चा करें। उससे जो भी समझ बने उसी के आधार पर अपने समूह में कहानी, गीत, नारे, चार्ट व पोस्टर जो भी चाहें, बनाकर लाएँ। समूह अलग-अलग कमरों में चले गए। थोड़ी देर तक तो समूह बना रहा, बाद में वह पाँच-छः की छोटी-छोटी टोलियों में बँटने लगा, स्वतः ही। किसी के पास किताब-कॉपी, किसी के पास स्केच-कलर, किसी के पास पेंट-ब्रश, किसी के हाथ में पुस्तकालय की किताबें थीं। सरपट दौड़ शुरू हो गई, कमरे दर कमरे, समूह दर समूह। हमारी किसी को कोई परवाह नहीं। थोड़ी देर के लिए हम व शिक्षिकाएँ मुक्त थे, आगे की व्यूह रचना के लिए या फिर इस सक्रियता के दृश्य को आँखों में कैद करने के लिए- काम होता दिखाई दे रहा है, सर्वत्र-चर्चाएँ हो रही हैं। बातें हो रही हैं। बातों से बातें निकल रही हैं जिनसे ख्याल बुने जा रहे हैं, इन्हीं ख्यालों पर कथा का ताना तना जा रहा है। कल्पना के रंग चढ़ाए जा रहे हैं। नारे गढे़ जा रहे हैं, तुकबंदियाँ की जा रहीं हैं, काफि़ये मिलाए जा रहे हैं, गीत रचे जा रहे हैं। कलम चल रही है, कूची चल रही है, कागज़, कॉपी व चार्टों पर इबारतें नुमाया हो रही हैं। ऐसा लग रहा है जैसे हर चीज़ में पंख लगे हैं। चंद घंटों में ही नाटकों के मजमून तैयार होकर सामने आ गए हैं और इन सब से लैस, सारा समूह एक बार बड़े हाॅल में उपस्थित है और साथ में है बहुत सारी सहायता सामग्री। इन कहानियों के साथ आगे बढ़ा जाना है।
तय यह हुआ कि दंगा चुनाव दोनों विषयों पर दो नाटक किए जाएँगे। जब दो नाटक किए जाने हैं तो मौजूदा तीन समूहों के साथ कैसे काम हो पाएगा? शायद, मुख्तलिफ़ तरीके से समूह बनाने होंगे। समूह कुछ इस तरह से बने-लड़कियों से कहा गया कि जो लड़कियाँ नाटक में अभिनय की इच्छुक हैं, वे एक तरफ़ आ जाएँ। लगभग आधी लड़कियाँ आ र्गइं। चयन की छूट दी गई कि आप खुद तय करें कि किस नाटक में रहना है। अब हमारे सामने तीन समूह थे। शेष तीसरे समूह को बहुत महत्त्वपूर्ण जि़म्मेदारी मिली कि आप लोग तय करें कि इन दोनों नाटकों में नेपथ्य से किस प्रकार सहयोग कर इन्हें प्रभावी बनाया जा सकता है। इसमें काम काफ़ी विविधता भरा था। सेट डिज़ाइन, मंचसज्जा, रूपसज्जा, वेशभूषा, संगीत, मंच-प्रबंध इत्यादि। लेकिन, हमें इस बड़े समूह में लड़कियों को क्या-क्या स्पेसिफि़क यानी खास जि़म्मेदारियाँ देनी हैं, इसको ज़्यादा स्ट्रक्चर्ड यानी ढाँचागत रूप से तैयार नहीं किया। वे अपनी समझ, सामथ्र्य व रुचि के हिसाब से अपनी भूमिकाएँ खुद तय करें। इस समूह से यह विशेष रूप से कहा गया कि वे अभिनय वाले समूह से लगातार संवाद कायम रखेंगे। तीनों समूह अपने-अपने काम में फिर जुट गए। अथक । वे मंचन तक रुकने वाले नहीं थे।

भाषा की पाठशाला

साजिद अली -‘‘भाइयो और बहनो, मैं घर-घर में फरी (फ्री) बीजली (बिजली) पहुँचाऊँगा।” साजिद अली की भूमिका में गायत्री हिन्दी में लिखे संवाद को ठेठ मारवाड़ी लहज़े में बोल रही थी। गायत्री को दुबारा इसी संवाद को बोलने के लिए कहा गया। फिर पूछा ‘‘आपको लगता है संवाद में कुछ गड़बड़ है?‘‘ लड़की ने संवाद फिर बोला -
 “भाइयो और बहनो, मैं घर-घर में फरी बीजली पहुँचाऊँगा।
हमारे नाटक में तो हमें लगता है कि साजिद अली को
हिन्दी बोलनी चाहिए।
थोड़ा सोचने के बाद लड़की ने फिर अपना संवाद बोला-
“भाइयो और बहनो, मैं घर-घर में फरी बीजली पहुँचाऊँगा।
इस बार बदलाव महज़ इतना था कि मारवाड़ी लहज़े को थोड़ा अपदस्थ करने की कोशिश की गई। इसी कोशिश पर ही हमें भाषा सीखने की बुनियाद रखनी थी। हमें पता चल गया था, धूल कहाँ से हटानी है। हिन्दी भाषा की कक्षा का साजो-सामान जुटना शुरू हो गया। अब गायत्री के लिए मारवाड़ी और हिन्दी में उच्चारण भेद को सचेत रूप से देखने की ज़रूरत है। उसकी संवाद अदायगी में फरी और बीजली शब्दों में कील गड़े हुए हैं, इन्हें एक-एक करके खींच कर देखने की ज़रूरत है। यह एक शुरूआत होगी, सचेत रूप से अपनी भाषा को देखने की। अभिनेता के लिए तो यह निहायत ज़रूरी है। अब फिर गायत्री से कहा गया कि अब जब आप अपना संवाद बोलें तो खुद की आवाज़ को गौर से सुनें, और जहाँ उचित लगे बदलाव करने की कोशिश करें। गायत्री ने फिर तीन-चार बार संवाद दोहराया। पता नहीं, उसने खुद को सुना या नहीं। हमने उसके काम को थोड़ा आसान करने की कोशिश की। हमने कहा, ‘’अब ऐसा करते हैं, एक बार आप संवाद बोलेंगी, उसके पश्चात हम बोलेंगे। आपको दोनों को ध्यान से सुनना है, फिर फ़र्क महसूस करिये।
साजिद अली- ‘‘भाइयो और बहनो, मैं घर-घर में फरी
बीजली पहुँचाऊँगा।”
हमने संवाद को सही करके बोला-‘‘भाइयो और बहनो, मैं
घर-घर में फ्ऱी बिजली पहुँचाऊँगा।
इस बार गायत्री ने सुना और थोड़ा समय लेने के बाद अपना
संवाद आंशिक बदलाव के साथ बोला-
...मैं घर-घर में मुफ़्त बीजली पहुँचाऊँगा।
संवाद में परिवर्तन कर बोलना इस बात का सूचक था कि उसने पहली बार हमारी व खुद की आवाज़ को सुनना शुरू किया था। जैसे ही सुनना शुरू हुआ, वैसे ही उसने सचेत प्रयास किया कि जिस शब्द में समस्या थी उसके स्थान पर समानार्थक विकल्प तलाश कर रख दिया। निस्संदेह, यहाँ गायत्री के लिए भाषाई कौशल का एक आयाम खुला था, किन्तु अभीष्ट यह नहीं था। यह समस्या से नज़रंदाज़ी होगी। गायत्री से कहा गया कि आप संवाद के शब्दों में किंचित भी हेर-फेर किए बिना संवाद अदायगी का बार-बार अभ्यास करें। शुरू में थोड़ा ज़बान लड़खड़ाई, लेकिन अंततः उसने सही संवाद बोला। अभी से गायत्री सही संवाद बोलेगी। वह सही संवाद बोलेगी नाटक के मंचनपर्यंत या शायद जीवनपर्यंत...। कुछ इसी तरह की समस्या नाटक में एक नेता मांगीलाल का किरदार निभा रही संजु जाट के साथ आ रही थी। स्थिति थी- नेता एक सभा को संबोधित कर रहे हैं और जनता से बड़े बडे़ वायदे कर रहे हंै। जनता उनकी पोल भी खोल रही है। नेता संजु कहती है-
भाइयो और बहनो, मैं आपके गाँव में घर-घर में पानी पहुँचाऊँगा।
जब दूसरी बार संवाद बोला तो कुछ इस तरह-
भाइयो और बहनो मेरी सरकार में आपके यहाँ घर-घर में पानी पहुँचाऊँगा।
तीसरी बार- भाइयो-बहनो, आपके गाँव में सबको घर-घर पानी
पहुँचाऊँगा।”
संजु के साथ समस्या यह थी कि संवाद छोटा होने के बावजूद भी वह अंततः तय नहीं कर पा रही थी कि उसे क्या लाइन बोलनी है। हर बार वाक्य विन्यास व शब्दावली बदल जाने से संवाद में आत्मविश्वास नहीं आ रहा था और आत्मविश्वास न होने से भाव-सृष्टि भी नहीं हो पा रही थी। वाक्य के उलटफेर में वह खुद ही फँसे जा रही थी, मानो वह अपने संवाद को ज़बर्दस्त बनाने के लिए अपनी शब्दावली को खंगाल देना चाहती थी। लेकिन, वे शब्द बेतरतीबी से आकर अर्थ पर कुहासा डाल देते थे। ऐसा लगता था, वह अपनी जेब से संवाद की शब्दावली निकालना चाहती है, लेकिन, जैसे ही हाथ बाहर निकालती है वैसे ही साथ में अनावश्यक शब्दों की रेज़गारी भी नीचे गिर जाती है।
नाटक के कथोपकथन विधान में यह ज़रूरी नहीं कि प्रत्येक वाक्य को बहुत सारे विशेषणों, सर्वनामों इत्यादि पर हर बार खड़ा किया जाए। नाटक के किसी भी संवाद के दोनों सिरों के हुक पूर्व और बाद के कथनों में लगे हुए होते हैं और उन्हीं की उंगली पकड़ कर नाटक में चलते हैं। नाटक में कई बार चंद शब्द या फिर एक अकेला शब्द भी पूरी बात कह जाता है। यहाँ तक कि सन्नाटों में भी अर्थ और भाव के वातायन खुलते हैं। ज़ाहिर है, लड़की को इस सत्य तक पहुँचने में वक्त लग सकता था, लेकिन यह नामुमकिन नहीं था। हमने कहा, आप नाटक के पहले व बाद के संवादों के साथ अपने संवाद को जोड़कर देखें, फिर आपको जो भी अनावश्यक शब्द लगें, उनकी छंगाई करते जाएँ। आखिर, लड़की ने अपनी जेब से करारे नोट सरीखा संवाद निकाल कर सबके सामने रख दिया- मैं घर-घर में पानी पहुँचाऊँगा।

कागज़ में शायद शब्दों के अतिरिक्त बोझ को उठाने की सामथ्र्य होती हो, लेकिन, ज़बान और कान तो मुख-सुख को ही समझते हैं। जो शब्द मुख-सुख नहीं देते वह फि़ज़ा में कहीं छितरा कर रह जाते हैं। सम्प्रेषण के ध्येय तक नहीं पहुँचते। कलम और ज़बान फितरतन जुदा-जुदा हैं। कलम तो कागज़ पर शब्दों को तहा-तहा कर छोड़ती जाती है और पुस्तक उन्हें इस्तरी करके रख देती है। किन्तु, ज़बान शब्दों को गढ़ती है और उनमें प्राण भी फूँकती है तथा सामने वाले को किसी शिशु की तरह पकड़ाती है। बच्चे को गोद में लेते वक्त हम वज़न को महसूस नहीं करते। इस तरह से हुआ सम्प्रेषण दुनिया के किसी भी कोने में बेहतरीन सम्प्रेषण ही कहा जाएगा। इसके छोटे-छोटे व अनुशासित अभ्यास सिर्फ़ नाटक की रिहर्सलों में ही मिल सकते हैं।
एक पाठ नागरिक शास्त्र का भी

कार्यशाला के अंतिम दिन ड्रेस रिहर्सल के वक़्त जब हम लड़कियों से मिले, सब के बीच तीन-चार लड़कियाँ टोपियाँ (स्कल कैप) पहन कर बैठी हुई थीं। ये मौलवी की भूमिकाएँ निभा रहीं थीं। हमारा स्वाभाविक सा सवाल था, ‘‘अरे वाह! ये कहाँ से लीं?‘‘ ‘‘हमने खुद सिली हैं। ‘‘किसने सिली हैं?” इसके जवाब में मुझे उम्मीद थी कि मेहरून, हसीना, हिना या शहनाज़ का नाम आएगा, लेकिन, लड़कियों ने समवेत स्वर में कहा, ‘‘सर, सुनीता ने सिली हैं, ये सारी टोपियाँ। अब हमारे लिए अटकलें लगाने के लिए बहुत कुछ था। क्या सुनीता टोपियाँ सिल सकती है, क्या सुनीता पहले से टोपियाँ सिलती रही है? या फिर नाटक बनाने की प्रक्रिया ने सुनीता को मजबूर कर दिया और उसने अपने आप उन्हें सिल दिया। दरअसल, इस दृश्य को इस तरह से भी होता हुआ देखा जा सकता है-सुनीता केजीबीवी में सीखे अपने सिलाई कौशल से उत्साहित होकर मेहरून, हसीना, शहनाज़ व हिना से मिली होगी। जिस चरित्र के लिए टोपी सिली गई, उस पर बात हुई होगी, उससे परे मज़हबों पर भी बात हुई होगी। और, टोपी सिलते-सिलते कितने मज़हबी फ़ासलों की इन लड़कियों ने तुरपाई की होगी। कितने ही रिश्तों को रफ़ू किया होगा ? कौन कह सकता है, हमेशा साक्ष्यों की तलाश बेजा बात है। कुछ मामलों में हमें संभावनाओं को ध्यान में रख कर प्रक्रियाओं को छेड़ना भर है। साक्ष्य हमेशा हों, यह ज़रूरी तो नहीं।
एक दृश्य में जब हसीना काठात अज़ान लगाती है तो उसकी सहपाठी दुर्गा मुसल्ला बिछा कर किसी मौलवी की तरह नमाज़ अदा करने लगती है। वही दुर्गा, जो एक दिन पहले नमाज़ के दृश्य में खुद को बहुत असहज महसूस कर रही थी ! आज के दृश्य और कल की स्थिति के दरम्यान ज़रूर एक पूर्वरंग विद्यालय के आवासीय समय में रचा गया होगा।
यही स्थिति गणेश की आरती वाले दृश्य में थी। एक लड़की कोरस से निकल कर आगे आकर गणेश बनती है। बाकी लड़कियों का समवेत स्वर में आरती-गायन। नाटक का उद्देश्य हिन्दू या मुस्लिम धर्मों की उपासना पद्धतियों को देखना-सीखना नहीं हो सकता। बल्कि, नाटक दूसरे की जगह खुद को रख कर दूसरे के नज़रिए को समझना शुरु करता है, ताकि अपने धर्म के साथ-साथ दूसरे के धर्म का अहतराम कर सकें। दरअसल, इन नाटक खेलती लड़कियों की शक्ल में हिंदुस्तान के सेक्यूलर यानी धर्मनिरपेक्ष मुस्तकबिल का ब्लू प्रिंट दिखाई दे रहा है।

मिलजुल कर रचा विराट् सौन्दर्य

यह हमारा विशेष आग्रह था कि स्कूल की प्रत्येक लड़की नाट्य कार्यशाला की पूरी प्रक्रिया में हिस्सा ले। सिद्धान्त में यह विचार जितना खूबसूरत है, उसे अमली जामा पहनाना कम चुनौतीपूर्ण न था। केजीबीवी में एक सौ पाँच लड़कियाँ नामांकित हैं, और एक सौ दो आज उपस्थित। किसी भी गतिविधि में सौ लड़कियों का शामिल होना एक बडी़ ताकत हो सकता है, पर हमेशा ऐसा होता नहीं। इसे ताकत में तब्दील किया जा सकता है। यह सामूहिक ताकत कोरी निरंकुश कदमताल न बन जाए, इसलिए, इसे सौंदर्यबोधीय  संस्कार देना ज़रुरी होता है। यह संस्कार नाटक के द्वारा सहजता से दिये जा सकते हैं। एक दूसरा पहलू है, सक्रियता का। कई बार सक्रियता के नाम पर समूह में बस काम दे देना धोखा भी साबित हो सकता है। व्यक्तिगत रुप से सीखने में सक्रियता निर्विवाद है। लेकिन, एक बडे़ उद्देश्य के लिए जब समूहों में काम करते हैं, तो उसके लिए उस विराट् उद्देश्य का विजन यानी दृष्टि, प्रत्येक के चित्त-मानस में स्पष्ट होना लाज़मी है। इस तरह से सक्रियता का एक सीधा-सा सिद्धान्त यहाँ नज़र आता है कि प्रक्रिया की प्रत्येक कडी़ से जुड़ा व्यक्ति विराट् को अपने तसव्वुर में रखे, उसी के आधार से कल्पना की उडा़नें भी भरे और फिर अपने छोटे समूह के कार्य में लग जाए, समूह में अपनी छोटी – बडी़ भूमिका या जि़म्मेदारी की छोटी से छोटी अनंत बारीकियों तक जाने में लग जाए। इस तरह वह विराट् आकार कैनवास पर उभरने लगता है। उल्लेखनीय है कि कार्यशाला में लड़कियों की सक्रियता कुछ इस तरह दिखाई दे रही थी कि उनका काम आखिरकार समग्रता में उभर कर आता दिखाई दिया। काम करती हर लड़की की कोशिश में यह स्पष्ट पता चल रहा था कि तस्वीर सबकी निगाह में है और सबकी साझा की हुई है। अभिनय वाले समूह अपने अभिनय में निखार लाने के लिए भरसक कोशिश कर रहे हैं। बैकस्टेज वाले समूह की अपनी पैनी नज़र रहती है कि कैसे अपने कार्य से उनके अभिनय में और प्रभावोत्पादकता ला सकें। एक दृश्य में मंच से नेता अपनी-अपनी रैलियों को संबोधित कर रहे हैं। सीन ठीक ही चल रहा था अचानक दो लड़कियाँ ऊँची कूद के खेल में काम आने वाले दो स्टैंड र्ले आइं और नेताओं के सामने उन्हें माइक के रुप में खड़ा कर दिया गया। ये उन दो लड़कियों की परिकल्पना थी। इस परिकल्पना को अब दो-चार और लड़कियों ने लपक लिया। माइक को हॉल के साइड में ले जाकर उस पर रंगीन कागज़ लपेटना शुरु कर दिया। दो लड़कियों ने हार्ड-शीट को काट कर उस पर पेपर चिपका, एक फ़ुट लंबाई की दो पट्टियाँ काट लीं और उन पर बडे़ कलात्मक तरीके से लिख दिया, ‘सोनू साउण्ड सर्विस-मसूदा। अब तैयार हो गया नेता जी का मंच और मंच पर रखा माइक। नेता का साजो-सामान जुट गया, तो फिर, कुछ जनता के लिए भी होना चाहिए। चुनावी साल है, रैली सभाओं का दौर चल रहा है। लड़कियाँ सब देख रही हैं। दो-तीन लड़कियों ने फिर स्टोर रूम की तरफ रुख किया। स्टोर रूम के रूप में अब एक और महत्त्वपूर्ण किरदार जुड़ने वाला है। थोड़ी देर में वे दस-बारह तख्तियाँ लेकर आयीं जिनमें पकड़ने के लिए डंडियाँ लगी हुई थीं। उन पर पल्स पोलियो अभियान, ‘बाल विवाह अभिशाप है, ‘भ्रूण हत्या बंद करो, ‘एक बेटी पढे़गी सात पीढी़...इत्यादि इबारतें लिखी हुई थीं। हमने पूछा, ‘‘आप इन तख्तियों का क्या करेंगी? ये तो विषय से जुड़ी हुई नहीं है।’‘ लड़कियों ने कहा कि इन तख्तियों पर वे नारे लिख कर चिपका देंगी। कूचियाँ, कलम व रंग फिर सक्रिय हो गए और वहीं पास में ही एक टोली बैठ गई इन इबारतों को रचने। पास में ही नाटक के रिहर्सल में संवाद चल रहे हैं, लेकिन, उन आवाज़ों पर अब रंग छाने लगे हैं और संवादों की ध्वनियाँ नेपथ्य में चली जाती हैं। अब उन तख्तियों पर नारे उभरते हैं, ‘वोट फॉर मांगीलाल, ‘हमारा नेता कैसा हो, मांगीलाल जैसा हो,
वोट फ़ोर साजिद अली, ‘एक, दो, तीन, चार, साजिद अली अबकी बार।
अलग-अलग जगह पर अलग-अलग टोलियाँ बैठी हैं, अपना-अपना काम कर रही हैं। कोई किसी को सुपरवाइज़ नहीं कर रहा। एक टोली मुखौटे तैयार कर रही है। एक टोली उनमें अपनी कल्पना के रंग भर रही है। एक टोली इस मुद्दे पर बहस कर रही है कि हिंसा क्या होती है? किस-किस तरह की होती है? हिंसा के क्या-क्या साधन हैं, क्या-क्या प्रतीक हैं? इस टोली ने उन सब के चार्टों पर चित्र बनाए हैं। इस सारी भागदौड़ से परे तीन-चार लड़कियाँ बिल्कुल अनौपचारिक ढंग से घंटों से बैठी हैं व बातों में मशगूल हैं। इनके चेहरों के भाव से बिल्कुल नहीं लगता कि वे किसी अकादमिक डिस्कोर्स मे लगी हैं। बातचीत में एक ज़बर्दस्त ठहराव नज़र आ रहा है। देखने से लगता है कि इन्होंने सारे क्रिया-कलाप में अपनी निजी बातचीत के लिए खूब फुर्सत निकाल ली है। लेकिन, काफ़ी समय बाद जब यह समूह हमारे सामने आया और जब हमने इनके चार्ट देखे तो हमारी धारणा बदल गई। हाल में हुए चुनावों का सारा का सारा इतिवृत्त व विश्लेषण इनके पास था। किस-किसने चुनाव लड़ा, कौन जीता, कौन हारा। जातीय व धार्मिक समीकरण क्या थे, चुनाव के वक्त अंदर कौन था, बाहर कौन, चुनावों को लेकर क्या लड़ाइयाँ हुईं, क्या हथकंडे रहे-सब बातें इन लड़कियों ने लिखी थीं। आखिर मंचन का दिन आया। तय हुआ केजीबीवी के मध्य खुले प्रांगण में नाटक होगा। अब मंच-प्रबंधन व सज्जा के लिए लड़कियाँ एकजुट होने लगीं। स्टोर रुम आज फिर खुल कर सक्रिय भूमिका में आ गया। लड़कियाँ आज फिर वहाँ जातीं व वहाँ से कुछ न कुछ लेकर आती दिखाई दीं। जाने किस कोने से पुराना दस गुणा दस फ़ीट का बड़ा पर्दा निकाल र्लाइं। उसे बरामदे के दो बडे़ खंभों के मध्य कस कर बाँध दिया गया, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था - कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय, किराप। यह साइक्लोरामा यानी मंच के पीछे का परदा हो गया। एक समूह का काम है अब तक कार्यशाला के दौरान बनी सामग्री की प्रदर्शनी लगाने का। लड़कियों ने आँगन में सभी चार्ट्स को फैला दिया है, चयन हो रहा है, विषयवार वर्गीकरण हो रहा है। मैंने उनकी मदद हेतु सुझाव दिया कि इन चार्ट्स को रस्सी बाँध कर हम मंच के बाजू में लटका सकते हैं। मेरे सुझाव को हवा में उड़ा दिया गया, ‘‘सर, कितनी हवा चल रही है, सब हवा से हिलेंगे।
क्या किया जाए?’’
इन्हें साॅफ़्ट बोर्ड्स पे लगा देते हैं।
‘‘लेकिन, सॉफ्ट बोर्ड्स तो कमरों में लगे हैं। वहाँ?’’,
प्रदर्शनी तो मंच पे ही होनी चाहिए।”,
एक लड़की ने तुरंत कहा, ‘‘साॅफ़्ट बोर्ड्स दीवारों पर से हटा लेते हैं।
किसी लड़की का यह कहना भी साहसिक कदम ही माना जाएगा। आमतौर पर, साॅफ़्ट बोर्ड्स को लगाना ही मुश्किल होता है, उतारना तो बहुत बड़ी बात। लड़की की बात को वाॅर्डन सोमती सोनी ने मजबूती दी-
“सर, हम इन साॅफ़्ट बोर्ड्स को बड़ी आसानी से उतार व
लगा सकते हैं।

एक-एक कर आठ-दस साॅफ़्ट बोर्ड्स अगले ही पल ज़मीन पर थे। लड़कियाँ उन पर चार्ट्स पिनअप कर रहीं थीं। अब एक-एक कर ये बोर्ड्स मंच के पीछे व बगल में खड़े कर दिए गए। इनको खड़ा करने के लिए पीछे पलंग लाकर खड़े किए गए। मंच पर धूप होगी, इसलिए स्टोर से पुराना शामियाना लाकर टाँग दिया गया। स्टोर से ही पुरानी फ़र्रियाँ (बंदनवार) लाकर पूरे प्रेक्षागृह में सजा दी गईं। पृष्ठभूमि में लगे साॅफ़्ट बोर्ड्स को और उभारने के लिए बिल्कुल नई चादरें स्टाॅक में से लाकर टाँगी गईं। अभिनय स्थल और दर्शकों के बीच चूने से एक रेखा खींच दी गई। इस रेखा के किनारे-किनारे बाहर बरामदे से गमले लाकर कतार में रख दिए गए। कुछ और गमले भी मंच पर, जहाँ उन्हें मुनासिब लगा, सजा दिए। मंच पर जहाँ पर्दा बाँधा जाता है, वहाँ कसकर आर-पार एक रस्सी बाँधी गई और उस पर चार खूबसूरत मुखौटे लटका दिए गए। कोई भी लड़की अपनी कोशिश में कमी नहीं रखना चाहती थी। चारों तरफ़ ऊर्जा ही ऊर्जा, खूबसूरती ही खूबसूरती। जिस नाटक का पूर्वरंग इस कदर रचा गया हो, वह उत्कृष्ट कैसे नहीं होगा! मंचन देखने के लिए पास के माध्यमिक विद्यालय (रमसा) की लड़कियों व शिक्षिकाओं को आमंत्रित किया गया। उन्होंने नाटक देखे भी... सराहे भी... मौखिक तौर पर भी और लिखित में भी!
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